दिग्विजय सिंह, इज्‍जत केवल डर और लोभ से नहीं मिलती

E-mail Print PDF

पंकजएक बुनियादी सवाल पर गौर करें. राजनीति या सामाजिक जीवन में सभ्यता एवं अहिंसक आचरण बनाए रखने की जिम्मेदारी पहले आखिर किसकी है? ज़ाहिर है समाज के जो ओपिनियन मेकर्स हैं,  जो नेता हैं उनपर ही तो यह दारोमदार है. कहा भी गया है कि 'क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात.' लेकिन हो उसका उलटा रहा है.

आज समाज का जो जितना ताकतवर व्यक्ति है वो उतना ही अहंकारी और हिंसक हो गया है. बिना यह सोचे कि अगर आम नागरिक उसे उसी की भाषा में जबाब देने लगे तो दो कौड़ी की हैसियत में नहीं रह जायेंगे ये लोग. ऐसे 'हस्तियों'  में आप सबसे ऊपर दिग्विजय जैसे अभागे मदान्धों को रख सकते हैं. हाल ही में तमाम लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तिलांजलि देकर अपने पारिवारिक संस्कार का परिचय देते हुए दिग्विजय ने न केवल बाबा रामदेव को ठग कहा बल्कि भाजपा जैसी एक मात्र प्रासंगिक विपक्ष को उसने नचनियों की पार्टी कहा. बड़ी हिकारत से उन्‍होंने लोकसभा में विपक्ष की नेत्री के लिए भी आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया.

तो ये तो हुई शालीनता को गटक लेने की बात. अब उसके हिंसक होने पर भी ध्यान दीजिए. हाल ही में अपना विरोध जताते हुए एक पत्रकार सुनील कुमार ने कांग्रेस कार्यालय में जनार्दन द्विवेदी को जूते दिखाया. जैसा कि विजुअल से स्पष्ट होता है कि अगर वह जनार्दन को जूते मारना चाहता तो इसके लिए उसके पास पर्याप्त समय था. लेकिन उसने केवल जूते दिखा कर ही अपना विरोध दर्ज कराया. लेकिन उसके बाद उपस्थित पत्रकार कहे जाने वाले लोगों से लेकर खुद दिग्विजय सिंह तक ने उसकी न केवल जी भर पिटाई की बल्कि एक चैनल की खबर के अनुसार दिग्विजय खुद उसके सीने पर जूते पटक-पटक कर उसे कुचलते रहे. अधमरा कर देने के बाद उस बहादुर पत्रकार को फिर पुलिस के हवाले कर दिया गया. अंततः वह अभी चौदह दिन की न्यायिक हिरासत में है.

तो ये फर्क है 'जनार्दन' और जनता में. शासन के इस दोगलापन को आप क्या कहेंगे जहां केवल जूते दिखाने वाला तो अधमरे होकर जेल चला गया, लेकिन जूते से फिरंगियों की तरह कुचलने वाले लोग सभ्य बने हुए हैं. पीटने वाले पत्रकार शायद विजुअल्स में अपनी उपस्थिति दिखा कर इनाम के फिराक में अकबर रोड के सामने लाइन लगाए खड़े होंगे. सवाल यह है कि इस तरह की हरकत करने वाले दिग्विजय सिंह जैसे लोगों को अगर उसी की भाषा में जबाब दिया जाय. जहां भी संभव हो उसे भी इसी तरह अपमानित किया जाय,  मौका लगने पर पीट भी दिया जाय तो आखिर किस मुंह से, किस नैतिक बल से हम जन सामान्य को यह सीख देंगे कि समाज और राजनीति में अहिंसा और शालीनता को महत्त्व देना चाहिए? दिग्विजय जैसों को याद रखना चाहिए कि इज्ज़त केवल डर से या लोभ से नहीं मिला करती. स्वयं का आचरण ऐसा रखना होता है जिसे देख कर लोग खुद-ब-खुद सम्मान देने को प्रेरित हो जाय.

अभी यह मामला चल ही रहा था कि दिग्विजय का अनुसरण करते हुए इकनॉमिक टाइम्स के एक पत्रकार ने भी अपनी 'जात'  दिखा ही दी (कृपया इसे आरक्षण के लिए परिभाषित जाति न समझा जाय). ट्विटर पर लिखे अपने सन्देश में उस अभागे ने बाबा रामदेव को यह सलाह दे दी कि वो अपना अनशन अच्छी तरह से कर पायेंगे अगर गाय का मांस खाना वे शुरू कर दें तो. अब अगर कोई ऐसे लुच्चों को उसकी औकात बताते हुए उसकी जुबान खींच ले तो क्यूं गलत होगा? ज़ाहिर है अपने यहां लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबको है. लेकिन संविधान ने आपकी अभिव्यक्ति पर ढेर सारी शर्तें भी लगाई हैं. संविधान के जिस अनुच्छेद (19) में यह अधिकार दिया गया है, उसी में मोटे तौर पर यह भी कहा गया है कि आपकी अभिव्यक्ति का अधिकार वहीं तक है जहां आप किसी दूसरे के इस अधिकार का हनन न करते हों. अन्यथा बदतमीजी भरे अभिव्यक्ति को दण्डित करने का विधान भी किया गया है.

तो अभी भ्रष्टाचार समेत ढेर सारे प्रासंगिक मुद्दों के कारण जिस तरह का तनावपूर्ण माहौल देश में व्याप्त है. सफेदपोशों-पेड पत्रकारों-चोरों-डकैतों-गुंडों-राजनेताओं के खिलाफ जिस तरह का आक्रोश आज जनसामान्य में मन में है उसमें समाज के बड़े कहे जाने वाले लोगों पर यह सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे शालीनता का परिचय दें. अगर अपराध किया है तो शर्मिन्दा होकर, जिस जनता का पैसा लूटा है उससे गाली खा कर भी धैर्य और संयम से रहे. अन्यथा जूते दिखाने का विकल्प समाप्त हो जाने पर लोग उद्वेलित हो आपको 'जार निकोलस द्वितीय'  बनाने से भी परहेज़ नहीं करेंगे. फ्रांस की राज्य क्रान्ति, रूस का इतिहास या हाल में मिस्त्र या लीबिया के नागरिकों ने यही तो सन्देश देने की कोशिश की है कि जनाक्रोश के आगे बड़े-बड़े तोपों का मुंह भी जनता की तरफ से हट कर आपके महल की तरफ जाने में देर नहीं लगता. इकनॉमिक टाइम्स के उस टुच्चे दो कौड़ी के पत्रकार से लेकर बिन पेंदी के लोटे दिग्विजय सिंह तक ये सीख जितनी जल्दी अंगीकार कर लें उतना ही बेहतर है. याद रखें....'जनार्दन' और जनता का फर्क मिट जाने को ही लोकतंत्र कहा जाता है.

डिस्क्लेमर :  जिस 'लोकतांत्रिक'  अधिकार का प्रयोग दिग्विजय ने किया है,  उसी का उपयोग एक आम नागरिक की हैसियत से करते हुए मैंने ने भी कुछ अपशब्दों का इस्तेमाल किया है. जो सज़ा दिग्विजय को मिले वही इस मुझे भी.

लेखक पंकज झा रायपुर में भाजपा के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.


AddThis