अन्ना हजारे, रामदेव और कांग्रेस (अंतिम)

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दिनेश चौधरी: हां, मैं बिका हुआ हूं! : "आप अमेरिका के साथ हैं या नहीं हैं?"... 9/11 के बाद बुश ने सारी दुनिया से यही वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछा था और चूंकि वह दुनिया का दादा है इसलिए प्रश्न के उत्तर में "इनमें से कोई नहीं" वाला विकल्प नहीं रखा था। जिन्होंने उत्तर "नहीं" में दिया वे सब आतंकवादी कहलाये। प्रतिबद्धताओं को स्पष्ट करने-कराने की बुश की यह नीति कालांतर में काफी लोकप्रिय हुई।

और, अगर इसके इतने लोकप्रिय होने का जरा-सा भी अंदाजा बुश को होता तो वह इसका पेटेंट करा लेता। भारत के राजनीतिक परिदृश्य में अभी जो कोहराम मचा हुआ है उसमें भी बुश की इस शैली का प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है और आज के माहौल में कुछ लिखना या बोलना जोखिम का काम हो गया है। अगर आप बाबा के पक्ष में बोलते हैं तो आप आरएसएस के एजेंट हैं और अगर आप बाबा की आलोचना करते हैं तो आप बिके हुए हैं। बाबा पर अब दो पार्ट में लिखे और भड़ास पर छपे लेखों पर जो प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं, वे कमोबेश इसी तरह की हैं।

बाबा के असंख्य भक्तों की पीड़ा मैं समझ सकता हूं क्योंकि वे निर्दोष-निष्कलंक हैं और सचमुच चाहते थे कि इस व्यवस्था में परिवर्तन होना चाहिये। वे बाबा के साथ सच्चे मन से जुडें हैं और उन पर इनकी अपार श्रद्धा भी है, लेकिन दुख है कि इसी श्रद्धा के फेर में वे कुछ इस तरह की चीजों को नहीं देख पा रहे हैं जो बहुत साफ-साफ दिखाई पड़ रही हैं। मैंने पिछले दो किस्तों में जो कुछ भी लिखा है, उसमें मैंने कहीं पर भी आंदोलन के औचित्य पर प्रश्न नहीं उठाया है बल्कि आंदोलन के तरीकों की व खासतौर पर बाबा की मंशा की आलोचना की है और आलोचना की भी जानी चाहिये ताकि आप अपनी गलतियों से आइंदा के लिये सबक ले सकें। ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। भ्रष्टाचार पर दो समानांतर आंदोलन आपके सामने चल रहे हैं, उनका तुलनात्मक अध्ययन क्यों नहीं कर लेते?

अन्ना का आंदोलन बेहद सादगी के साथ शुरू हुआ था और  उसमें मीडिया का जमावाड़ा पहले दिन से नहीं था। खुद अन्ना को भी यकीन नहीं था कि उन्हें आगे चलकर इतना समर्थन हासिल होगा। लेकिन अचानक मिले इस समथर्न से भी अन्ना बौराये नहीं और पूरे समय उनका व्यवहार गरिमापूर्ण था। उनके साथ के लोगों की भूमिकायें भी स्पष्ट थीं। अन्ना सब जगह दिखाई नहीं पड़ते थे और सभी जगह वही नहीं बोलते थे। 8 जून के अनशन में भी कुछ यही माहौल था और उनके साथियों ने अपने-अपने विषयों के अनुसार ही बातें की। उनके पास भक्तों की भीड़ नहीं थी और  न उनका कोई काडर है। लोग स्वत:सफूर्त आंदोलन से जुड़ते चले गये और आंदोलन के इस फैलाव का "श्रेय" लेने का प्रयास अन्ना ने नहीं किया। उनकी सादगी ही इस आंदोलन में उनका संदेश रही और एक बिल्कुल नयी पीढी , जो केवल लैपटाप व एसएमएस की भाषा समझती थी और जिसने  गांधी को केवल मुन्नाभाई के जरिये जाना था, उनसे जुड़ती चली गयी। अन्ना का आंदोलन आगे चलकर क्या रूप लेता है, यह कहना मुश्किल है, लेकिन एक गांधीवादी के साथ नयी पीढ़ी का जुड़ जाना ही इस आंदोलन की एक बड़ी जीत है।

दूसरी तरफ बाबा का आंदोलन एक सेलिब्रिटी का आंदोलन था। आंदोलन के दो दिन पहले से ही मीडिया वालों ने उनके भव्य पंडाल को अपना स्टूडियो बना डाला था। सरकार से बातचीत आंदोलन शुरू होने से पहले ही चालू हो गयी थी। भारी तादाद में भक्तगण पहले दिन से विराजमान थे, लेकिन बाबा के मंच में कुछ तरतीब समझ नहीं आ रही थी। बात करने भी बाबा ही जाते थे। वक्ता, मुख्य वक्ता, प्रवक्ता, संचालक, सब कुछ बाबा ही थे। यह मैं उतने समय की बात कह रहा हूं, जितने समय तक मैं टीवी देख पाया, क्योंकि बाबा के भक्तों को यह बताना आवश्यक है कि उनके आंदोलन के समर्थन में मैं भी दिन भर धूप में बैठा हुआ था, बावजूद इसके कि 3 तारीख की शाम को ही एक पत्रकार मित्र ने दिल्ली से फोन पर यह सूचना दी थी कि बाबा की सरकार से कुछ सहमति बन गयी है। बाबा ने टीवी पर इसका खण्डन किया था।

कहने का तात्पर्य यह है कि बाबा का यह आंदोलन अगर देश की 121 करोड़ जनता का आंदोलन था, जैसा कि बाबा टीवी पर कहते रहे, तो फिर उन्हें इस आंदोलन को "वन मैन शो" बनाने की क्या जरूरत थी? क्या बाबा को इतने बड़े आंदोलन के संचालन के लिये एक टीम बनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई? क्या बाबा को यह महसूस नहीं हुआ था कि इतने बड़े आंदोलन में अगर वे गिरफ्तार हो जाते हैं तो दूसरी व तीसरी पंक्ति का नेतृत्व किनके हाथों में होगा? या बाबा निश्चिंत थे कि इन सबकी नौबत ही नहीं आयेगी?

मैंने लेखमाला की दूसरी किस्त में जो लिखा है उसका लब्लोलुआब यही है कि बाबा औरों को श्रेय देना नहीं जानते और वे बाकायदा इस बात के लिये प्रयासरत रहते हैं। एक ही बात को बार-बार दोहराना ठीक नहीं है, खासतौर पर तब जबकि वह घटना भक्तो को विचलित कर रही है, लेकिन मान लें कि बाबा प्रशांत भूषण को अपने साथ रखते तो क्या कपिल सिब्बल के हाथ में वह चिट्ठी पहुंच पाती जिसने सारे किये-कराये पर पानी फेर दिया? बाबा ने बाद में मासूमियत से कह दिया कि यह सरकार धोखेबाज है। सरकार अगर ईमानदार होती तो आपको आंदोलन की जरूरत ही क्या थी?

एक बड़ी लड़ाई में व्यक्तिगत गुण, दुर्गुण, राग, द्वेष, अहम आदि का कोई स्थान नहीं होता। शीर्ष स्तर पर भले ही एक ही नेता हो पर निचले स्तर पर एक सामूहिक नेतृत्व तो होता ही है जो विभिन्न प्रकार के दायित्वों को अंजाम देता है। भक्तगण किस्म के सीधे-सादे लोगो में भावना का ज्वार उठाकर, इतनी सारी रणनीतिक चूकों के साथ, इतनी क्रूर व्यवस्था से इतनी बड़ी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। केवल एक व्यक्ति के अहम् के पोषण के लिये यदि बाबा के भक्तगण इन रणनीतिक चूकों की आलोचना का भी अधिकार नहीं देना चाहते तो -हां, मैं बिका हुआ हूं!

समाप्त

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it   के जरिए किया जा सकता है. दिनेश चौधरी के भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित अन्य लेखों को पढ़ने के लिए क्लिक करें- भड़ास पर दिनेश


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