इसीलिए हर काल में सुंदर स्त्रियां सबको नचाती रही हैं

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डा. सुभाष राय : सुनो भाई साधो - 3 : सुषमा जी नाची तो मेरा मन भी नाचने को हुआ। पता नहीं वे जानती कि नहीं पर मैं जानता हूं कि सबहिं नचावत राम गुसाई। समूचा जगत एक विशाल रंग-मंच की तरह है। हम सभी नाच रहे हैं। एक अदृश्य धागे में बंधे हुए, जिसका सूत्र किसी और के हाथ में है। एक झीने पर्दे के पीछे खड़ा वह सबको नचा रहा है।

अक्सर हमें पता ही नहीं चलता कि हमें कोई नचा रहा है। अलग-अलग हर कोई सोचता है कि वह अपने ताल पर नाच रहा है, कभी-कभी कई लोगों के मन में यह भी गुमान होता है कि वे औरों को भी नचा रहे हैं। हर कोई दूसरों को अपने इशारे पर नचाना चाहता है। यह सहज नहीं है, पर इसमें खुशी मिलती है। अगर आप लोगों को अपनी उंगली पर नचा सकें तो आप बड़े होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं। कभी-कभी लोग अपना काम निकालने के लिए भी प्रभावशाली लोगों के लय-ताल पर नाचते रहते हैं। जब अनायास बहुत खुशी मिल जाये तब भी आदमी नाच उठता है। इसके विपरीत कई बार गुस्से में भी, किसी की कड़वी बात से भी आदमी नाच उठता है।

आदिम काल से सौंदर्य पर रीझकर आदमी नाचता रहा है, सुंदरता किसी को भी नचा सकती है। इसीलिए हर काल में सुंदर स्त्रियां सबको नचाती रही हैं। इसी गुण के कारण वे बहुत आसानी से न केवल सत्ता के पास बने रहने में कामयाब रही हैं, बल्कि सत्ता का पहिया घुमा देने में भी। आज भी दुनिया में अनेक मजबूत इरादों वाली चालाक, बुद्धिमान या खूबसूरत महिलाएं हैं, जिनके इशारे पर तमाम बड़े-बड़े लोग नाच रहे हैं। नाच के मूल में जायें तो यह नाट्य का ही रूपांतर है। भगवान शंकर आदि नट माने जाते हैं। वे जगत के कल्याण में लगे रहते हैं। वे आसानी से नहीं नाचते। पर वे जब नाचते हैं तो समूचा ब्रह्मांड नाच उठता है, धरती, सूर्य, तारे नाच उठते हैं, समुद्र अपनी फेनिल लहरों पर सवार होकर नाचने लगता है। शिव के इस नृत्य से तांडव मच जाता है।

भरत के नाट्यशस्त्र के अनुसार नाट्य शब्द में संगीत, नाटक, नृत्य, वाद्य सब कुछ शामिल है। नौटंकी भी नाट्य का ही एक रूप है। पर नाच केवल नाच है। जिसे नाचना आता है, वह भाग्यशाली है। वह सबको लुभा सकता है, सम्मोहित कर सकता है। जिसे नहीं आता है, उसके लिए तो आंगन टेढ़ा है। कोई तो बहाना चाहिए। हिंदी के संत काव्य में नाच का बड़ा महत्व है। मीरा हों या सूरदास या कोई और भक्त कवि, वे अपने आराध्य के सामने नाचने में कतई संकोच नहीं करते पर वे इस तरह नाचते-नाचते अपने प्रिय को नचाने भी लगते हैं। मीरा कहती हैं, वृन्दावन में रास रचायो, नाचत बाल मुकुन्दा। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, काटे जम का फन्दा।

भक्त नाचता है तो भगवान भी नाचने लगते हैं। रास है क्या? एक ही समय में सबके साथ कृष्ण का नाचना। असल में भक्त खुद को मिटाना नहीं चाहता। उसे भगवान का सामने होना रोमांचित करता है। इस रोमांच को वह बनाये रखना चाहता है। वह अपना कृष्ण खुद ही बन जाता है और अपने ही साथ नाचने लगता है। वही कृष्ण होता है, वही राधा। उसे समझ में नहीं आता है कि यह सब कैसे हुआ लेकिन उत्कट प्रेम में वह अपनी संपूर्ण संभावना के साथ अपने ही शरीर से बाहर खड़ा हो जाता है, खुद को ही कृष्ण के रूप में रच लेता है, अपनी कल्पना के साथ नाच उठता है। लेकिन इस नाच के पहले भी एक नाच देखना पड़ता है। जब तक वह अपनी सत्ता से अपरिचित रहता है, कुछ पाने की होड़ में नाचता रहता है। काम-क्रोध का चोला पहनकर, विषयों की माला से लदा हुआ, निंदा की रसमयता में निमग्न, मोह के घुंघरू बांधे वह एक अलग तरह के नृत्य में मगन रहता है।

लालच के ताल पर, माया का वसन पहने, लोभ का तिलक लगाये वह एक ऐसी दुनिया में नाचता रहता है, जो होती ही नहीं। भ्रम की दुनिया, अज्ञान की दुनिया। जब कभी खुद पर अपनी कृपा होती है, वह इस अंधकार से बाहर आ पाता है। जब सच समझ में आता है, वह चिल्ला पड़ता है, बहुत नाच लिया भगवान, अब इस अज्ञान से बाहर करो। जैसे ही भावात्मक गहराई से ऐसा निवेदन उभरता है, वह महारास में शामिल हो जाता है। कृष्ण के साथ नाचने लगता है, कृष्णमय हो जाता है। यह नाचना बड़ा ही अद्भुत है। जिसे अपने ताल पर, अपने लय पर नाचना आ जाता है, जिसे अपनी सत्ता का बोध हो जाता है, जो अपने ही आईने के सामने खड़ा होकर खुद को देखने का साहस कर लेता है, उसे और नाचने की जरूरत नहीं रह जाती। जो दुनिया की सुख-सुविधाएं हासिल करने के लिए नाचते-नाचते थक गया, जिसे अहसास हो गया कि अब सिर्फ नाचना है, इस तरह नाचना है कि जीवन नृत्य में ही बदल जाये, वही इस रंग-मंच का असली नट साबित होता है, वही नटवर की शरण हासिल कर पाता है। नाचते-नाचते जब हृदय बेचैन हो जाय, मन थक जाय और बोल पड़े, अब मैं नाच्यो बहुत गुपाल तो समझो काम बन गया।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला और डीएलए के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को जनसंदेश टाइम्स से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. उनसे संपर्क 07376666664 के जरिए किया जा सकता है.


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Comments (2)Add Comment
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written by Dr maharaj singh parihar, June 12, 2011
सबहि नचावत राम गुसाई, हकीकत बयां की है अपने आलेख में डॉ. सुभाष राय ने। नाच के संबंध में पौराणिक संदर्भ को जोडकर इसे समीचीन ही नहीं अपितु इस आलेख को पठनीय और संग्रहणीय बना दिया है। आज समूचा देश नाच रहा है। कोई खुशी में तो कोई बेवसी में, कोई रिश्‍वत लेते नाच रहा है तो कोई रिश्‍वत देते देते परेशान होकर नाच रहा है। चोर भी नाच रहे हैं और सिपाही भी नाच रहे हैं। लगता है कि नाच ही इस देश की नियति है। नाच अगर रासलीला में बदल जाये तो कितना उत्‍तम हो जब सब लोग एक ही रंग में नाच का धमाल दिखायें।
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written by Indian citizen, June 12, 2011
बहुत बढ़िया आलेख है डा०साहब.

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