गांधी कहीं छुपते, भागते, डरते, कमजोर पड़ते नहीं दिखते थे

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गिरीशजी: रामलीला मैदान, राजघाट और गांधी : आज अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलनों ने फिर से महात्मा गांधी की तकनीक सत्याग्रह और अनशन की ओर ध्यान आकर्षित किया है. हालांकि समय-समय पर इन गांधीवादी तौर तरीकों के प्रयोग की बात विभिन्न स्तरों पर होती रही है, लेकिन वे कितने गांधीवादी हैं, और हैं भी या नहीं- इसे लेकर सवाल भी उठते रहे हैं.

दुनिया भर में गांधी के इन प्रयोगों को मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला, दलाई लामा, आंग सान सूकी से लेकर राष्‍ट्रपति बराक ओबामा तक-  सभी अपने-अपने ढंग से गांधी को स्वीकारने और व्यवहृत करने की बात करते रहे हैं. अमेरिका में अश्वेतों के नागरिक अधिकार आंदोलन के नेता मार्टिन लूथर किंग ने तो यहां तक कहा कि ''जीसस क्राइस्ट ने मुझे रास्ता दिखाया और गांधी ने बताया कि इस रास्ते पर कैसे चलना है.'' अपने देश में विनोबा भावे, डॉ. राममनोहर लोहिया और जेपी ने इन्हें थोडे़ नए स्वरुप में लागू करने की कोशिश की. हाल में उत्तर अफ्रीका और मध्य पूर्व में उभरे लोकतांत्रिक आंदोलनों में भी गांधी इन्हीं संदर्भों में चर्चित रहे. आज जब रामलीला मैदान में अनशनरत बाबा रामदेव को आधी रात पुलिस की भारी घेराबंदी में सोते बच्चों, महिलाओं, लोगों पर लाठीचार्ज और आंसू गैस के बीच हिरासत में लिया जाता है, बाबा को बचाव में ऊंचे मंच से कूदना पड़ता है, छिपने और पुलिस से बच निकलने के लिए महिलाओं के वस्त्र पहनने पड़ते हैं, और फिर हरिद्वार ले जाए जाने पर वे फिर से अनशन शुरू करते हैं, 11 हजार लोगों की शस्त्र और शास्त्र के आधार पर सेना खड़ी करने का बयान देते हैं, फिर बाद में सफाई देते हुए शस्त्र को शौर्य से जोड़ते हैं, और दूसरी ओर रामलीला मैदान में इस पुलिस कार्रवाई को जलियांवाला बाग कांड जैसा बताते हुए इसके विरोध में अन्ना हजारे को बापू के समाधि स्थल राजघाट पर अनशन करना पड़ता है-  तो निश्चित रूप से चर्चाओं में तैर रही गांधी की सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, अनशन जैसी तकनीकों पर विचार जरूरी हो जाता है.

कृपया 1920 के दशक के शुरुआती वर्षों में गांधी द्वारा शुरू किए गए खिलाफत आंदोलन पर गौर करें. पूरा देश गांधी की रहनुमाई में अंग्रेजों के खिलाफ एक नई ऊर्जा के साथ एकजुट था. तभी उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के पास चौरीचौरा कांड हो गया. हुआ यह कि शांत प्रदर्शनकारी सत्याग्रहियों पर कुछ पुलिसकर्मियों ने लाठीचार्ज किया और गोलियां चलाईं. तभी पुलिसकर्मियों की गोलियां खत्म हो गईं और प्रदर्शनकारियों की भीड़ बढ़ी तो वे भागकर पास के थाने पहुंचे और बचाव में थाने का दरवाजा बंद कर लिया. लेकिन नाराज सत्याग्रहियों की बेकाबू भीड़ ने थाने को फूंक दिया, जिसमें लगभग 20 पुलिसकर्मी जिंदा जलकर मर गए. इस घटना की धमक पूरे देश में महसूस की गई. उधर, खिलाफत आंदोलन पूरे उफान पर था, और मानने वाले मानते हैं कि पूरा देश इस कदर एकजुट था कि यदि गांधी आंदोलन वापस न लेते तो आजादी की दिशा में तभी बहुत बड़ा कदम तय कर लिया गया होता. लेकिन गांधी ने साफ कहा,  ''ऐसी हिंसा से हासिल आजादी हमें नहीं चाहिए.''  तब गांधी के इस कदम और उनकी सत्याग्रह-सत्याग्रही अवधारणा को लेकर अनेक सवाल भी उठाए गए. रवीन्द्र नाथ टैगोर तो पहले से ही सत्याग्रह के ऐसे प्रयोग के दौरान हिंसा की आशंका से ग्रसित थे. लेकिन खास बात यह थी कि गांधी के सारे आंदोलन के केंद्र में उनकी नैतिक शक्ति थी- जो कभी न खत्म होने वाले अक्षय भंडार सरीखी थी.

कार्टून

शायद इसीलिए जब खिलाफत आंदोलन की वापसी के बाद उन पर राजद्रोह का लंबा मुकदमा चला, तो गांधी जजों की जूरी के सामने बिना संकोच के निर्भीकता से यह कह सके कि ''इस आंदोलन की अगुवाई मैं कर रहा था. चौरीचौरा में हुई हिंसा की जिम्मेदारी भी मेरी है. मैं गुजारिश करता हूं कि इसके लिए जो भी सख्त से सख्त सजा का प्रावधान हो, वो मुझे दी जाए.''  गांधी के इस बयान पर अदालत सन्न रह गई. उसे इस बात पर भी हैरत हुई कि गांधी ने अपने बचाव में न तो कोई तर्क दिया और न ही कोई वकील रखा. आधुनिक लोकतांत्रिक इतिहास का अपने किस्म का यह पहला और अनूठा वाकया था. कोर्ट के सात न्यायाधीशों के पैनल ने गांधी को 6 साल की कड़ी कैद की सजा सुनाई. लेकिन साथ ही फैसले में लिखा, '' गांधी जैसा मुजरिम न तो कभी इस कोर्ट में आया था और न ही भविष्य में कभी आएगा. कोर्ट कानून से बंधी हुई है इसलिए उसने सजा जरूर सुनाई है. लेकिन वो ब्रिटिश सरकार से अपील करती है कि गांधी की यह सजा माफ कर दी जाए. और यदि यह सजा माफ कर दी जाती है तो सबसे ज्यादा खुशी इस अदालत को ही होगी.''  बहरहाल इस फैसले के बाद गांधी को जेल हुई. वो अलग बात है कि जेल में स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर ब्रिटिश सरकार ने दो साल बाद उन्हें रिहा कर दिया. तो यह थी गांधी की नैतिक शक्ति-  जो उनकी अन्य सभी ताकतों और पारदर्शी गतिविधियों का स्त्रोत थी.

दक्षिण अफ्रीका से लौटने पर भारत में पहली प्रयोग भूमि बिहार के चंपारण में भी उनके साथ यही नैतिक शक्ति रहती है. जब उन्हें पुलिस पकड़ कर ले जाती है और जेल जाने से बचने के लिए जुर्माना अदा करने को कहा जाता है, तो वह जुर्माना अदा करने और जमानत तक लेने से इनकार कर देते हैं. नतीजतन मजिस्‍ट्रेट उन्हें फिर भी रिहा करने का आदेश देता है. यही नहीं, चंपारण में किसानों के शोषण की पूरी कहानी गांधी 'पत्रकार'  के रूप में तैयार करते हैं और अखबार में धारावाहिक रूप में प्रकाशित करके ब्रितानी सरकार और देश के बौद्धिक वर्ग को जगाने का प्रयास भी करते हैं. ऐसा ही गांधी 1930 के नमक सत्याग्रह के दौरान भी करते हैं जब साबरमती आश्रम से समुद्र तट तक की लगभग 200 किलोमीटर की यात्रा वो कई हफ्तों में गांव-गांव पैदल चलकर ही पूरी नहीं करते, वो लोगों की नैतिक चेतना को जागृत करते हैं, देश की आत्मा को झकझोरते और जगाते हैं-  और ऐसा वो एक बडे संघर्ष की तैयारी में उस 'नमक' को आधार बनाकर करते हैं, जो हर घर, हर रसोई में इस्तेमाल होता है. और फिर, उस नमक पर लगने वाले ब्रिटिश टैक्स की अदायगी के कानून को तोड़कर 'सूरज का अस्त न देखने वाले तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य'  को नैतिक धरातल पर ही तो ललकारते हैं.

गौर करने की बात यह है कि ऐसे ढेरों उदाहरण जो साफ बताते हैं कि गांधी कहीं डरते, झुकते, कमजोर पड़ते, भागते, छिपते नजर नहीं आते. गांधी ने सत्‍याग्रही के लिए 11 बातें जरूरी बताईं थीं, जिनमें सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रहम्चर्य, सर्वधर्म समन्तवा, खादी, सर्वत्र भयवर्जना, स्वदेशी, शरीर श्रम, अस्वाद जैसी बातें शामिल थीं. वैसे लोहिया ने बाद में इस एकादश व्रत की अनेक बातों को गैरजरूरी बताया था और सत्याग्रह की जगह सिविल नाफरमानी शब्द का प्रयोग किया था. लेकिन गांधी ने सत्याग्रह और अनशन जैसी तकनीकों के प्रयोग में घृणा, वैमनस्य, हिंसा को दरकिनार करते हुए इसे सत्याग्रही और उसके पूरे परिवेश के शुद्धिकरण के लिए जरूरी माना था. ' पुत्रात् शिष्यात् पराजयम' - सत्याग्रही का व्यवहार ऐसा ही होना चाहिए. यानी कि जैसे पिता पुत्र से और गुरू शिष्य से पराजय की कामना करता है, वैसा ही सत्याग्रही से भी अपेक्षित है, तभी वह सही अर्थों में सत्य ग्राही हो सकता है.

मूल बात है कि गांधी के समय से अब तक आए अनेक बदलावों और माहौल में परिवर्तन के साथ मूल धारणा में भी परिवर्तन हुआ है, लेकिन मर्म की बात यही है कि नैतिक धारा वही है. अपरिवर्तित. ध्यान से देखें तो गांधी की तकनीक की सफलता उसकी नैतिक ताकत, पारदर्शी आचरण और जागृत जनशक्ति में ही निहित है. तभी तो जेपी जैसे वामपंथी को भी गांधी की ''साध्य और साधन की पवित्रता'' ही अंततः लुभाती है और लोहिया को भी समाजवाद गांधी मार्ग से ही संभव प्रतीत होता है. आज जबकि लोकतांत्रिक धाराएं दुनिया के स्तर पर पहले से ज्यादा मजबूत हुईं हैं, वो चाहे सत्ता पक्ष हो या जन पक्ष-  ऐसे में नैतिक, विवेकसम्मत, कल्याणकारी, पारदर्शी पहल ही परिवर्तन की वाहक हो सकती है. इसके लिए जरूरी नहीं कि उसकी शुरुआत राजघाट या रामलीला मैदान से ही हो, समझा जाना चाहिए कि किसी सुदूर ग्रामीण, आदिवासी, उपेक्षित अंचल की पगडंडी से भी ऐसी समवेत पहल निर्णायक हो सकती है.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा 'लोकमत समाचार' में प्रकाशित हो चुका है. गिरीशजी से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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