अखबार निकालो, फोकट में बांटों, पत्रकारिता का भला करो!

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इन दिनों इन्दौर में अखबार फोकट में बांटने की परम्परा चल रही है। बड़े-बड़े समूह के अखबार इन्दौर से निकले और फोकट में बंटते चले गए। अब इनका नाम भी क्या लें जिनके घर भी फोकट में अखबार आए हैं,  वे समझ सकते हैं कि कौन से अखबार थे? सवाल इसी बात का है कि कागज से लेकर छपाई और वेतन से लेकर हॉकरों के कमीशन तक देने के बाद कोई भी अखबार फोकट में क्यों बांटा जाए?

और यदि एक बार फोकट में अखबार पढ़ने की लत लग गई तो पाठक उसे खरीदकर क्यों पढ़ेगा?  ऐसे समय में जबकि पूरे विश्व में प्रिन्ट मीडिया अपने अस्तित्व के सबसे कठिनतम दौर से गुजर रहा है यह बहस होना चाहिए कि अखबार फोकट में क्यों बंटे? अमेरिका में 200 अखबार बंद हो गए। वजह रही पाठक संख्या का लगातार कम होना। भारत में भी क्या स्थिति है,  इंडिया टुडे की पाठक संख्या में भारी गिरावट आई है। इधर आउटलुक जैसी पत्रिका को मासिक होना पड़ा है। पत्रिकाओं की स्थिति बहुत अधिक बदतर है।

महिला पत्रिकाएं किसी तरह गिफ्ट आइटम बांटकर अपनी प्रसार संख्या बचाने में लगी हुई है। न्यूज चैनल्स की संख्या लगातार बढ़ रही है और चौबीसों घंटे ये चैनल्स सूचनाएं और खबरें प्रसारित कर रहे हैं। इधर मोबाइल पर नेट आने के बाद खबरों को देख पाना बहुत आसान हो गया है। भास्कर जैसा अखबार भास्कर डॉट कॉम पर उतना ही ध्यान दे रहा है, जितना वह अखबार पर देता है। विचारणीय बात यही है कि अखबारों को फोकटिया बना देने से किसका भला होगा?

याद कीजिए रविवार पत्रिका के वे दिन जब इलेक्‍ट्रानिक टाइप राइटर पर बिल्कुल सादा छपने के बाद भी मात्र एक रुपए में यह पत्रिका पूरे देश में धूम मचा देती थी। आज भी इस सत्य को कोई नहीं झुठला सकता कि बिकती है खबर, अखबार नहीं। आज तो ये आलम है कि सरकारी तंत्र पर दबाव बनाना हो या फिर और कोई भी कारण हो, जिसे देखो वह अखबार निकाल लेता है। ऐसे अखबार जो अपनी इकानामी लेकर नहीं आते कुछ ही समय में बंद हो जाते हैं। इससे पत्रकारिता के साथ ही पत्रकारों का भी बुरा हाल होता है।

सोचने वाली बात तो यह भी है कि टाइम्स ग्रुप ने धर्मयुग, सारिका और दिनमान जैसी पत्रिकाएं क्यों बंद की? और धनकुबेर धीरूभाई अंबानी का अखबार संडे आब्‍जर्बर तो कभी बंद ही नहीं होना था,  लेकिन धीरूभाई ने खुद ने उस में ताले लगवाए। धीरू भाई ने कहा भी था कि घाटे की इकोनामी लेकर कोई भी अखबार नहीं चल सकता।

लेखक अर्जुन राठौर मध्‍य प्रदेश में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


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