महानगर में भटकता एक कस्‍बाई मन

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बिसन कुमार गोबर- मिट्टी लिपा आँगन, तुलसी चौरा, केले-पपीते अमरूद के पेड़ों का झुरमुट, चहचहाती चिडि़या, धूल से सने पर उल्लसित खिलंदडे बच्चे। आकाश चूमती पतंगों और कंचों का रंगीला संसार। इक्कीसवीं सदी की ओर पगलाये दौड़ते किसी भी के लिए यह दृश्य किसी फिल्म या अदबी रिसाले का हिस्सा भर हो सकता है।

पर यह ऐसी ईमानदार सच्चाई है जो महानगर के फ्रेम के बाहर निकलकर हजारों- हजार कस्बों व शहरों में आम बिखरी रहती है, यह दुनिया वह है जहां शाम बिना तुलसी चौरे पर दिया जलाये पूरी नहीं होती और घंटियों के टुनटुनाते शोर में माँ- दादी व बुआ का संध्या वंदन यह संकेत है कि बच्चों अब घर लौटो, खेल का समय खत्म हो गया, पढ़ाई का समय शुरू।

उत्तर प्रदेश के कस्बों और पिछडे़ व कम पिछडे़ शहरों में जन्म से जवानी तक लम्बा समय बिताकर दिल्ली आया मेरा मन बार-बार लौट कर उसी दुनिया में जाता रहा है,  जहां मेरी माँ अपनी कस्बाई भाषा में कहती 'मेरी नार गड़ी है' इसका अर्थ चाहे कुछ भी होता हो पर इतना सच है कि दिल्ली की आपा-धापी में तन तो जूझ रहा है पर मन ऐसे ही किसी कस्बाई आँगन के खूंटे से जीवन जीने की त्रासदी में बरस-दर बरस अपनी ढोये जा रहा हूँ। यह मेरी अपनी और नितांत निजी त्रासदी है जिसे मैं अकेले ढोने को अभिशप्त हूँ।

इसे अपने महानगरीय मित्रों के साथ बांट पाना संभव नहीं है। महानगर की दहलीज से बाहर कदम न रखने वाले या छुटिट्यों में तफरीह के लिये मसूरी, शिमला या नैनीताल जाने वालों को मेरी 'पीड़ा दिमागी फितूर' या किताबी लग सकती है। अपनी निजी पीड़ा का सार्वजनीकरण भी तो घर से निकलकर कोठे पर बैठने जैसा है।

तीन वर्ष पुरानी पक्की नौकरी ज्वाइन करने मैं बीबी-बच्चों और सामान से लदा फदा दिल्ली पहुँचा था तो हम सब बहुत उल्लसित थे। लगता था छोटे शहरों की छोटी- छोटी उपलब्धियों पर रीझता अपना मन अपने आप को धोखा देने जैसा था। वह सब इस महानगरीय विस्तार के सामने कितना छोटा तथा बेमानी लगने लगा था। नये किले फतह करने और राजधानी में अपना झंड़ा गाड़ने का जोश ढांढे भर रहा था। दिल्ली की भागती जिंदगी मेरे लिये तेजी से तरक्की करने का पर्याय थी और सुबह से रात तक की बतरह मेहनत कामयाबी की शर्तिया कुंजी। पत्नी और बच्चों को समय न दे सकना कष्ट नहीं देता था क्योंकि विश्ववास था कि 'यह सब उन्हीं के भले के लिये तो है'।

समय के साथ दिल्ली से परिचय तो बढ़ता गया पर पता नहीं क्यों दोस्ती घनिष्‍ठता में नहीं बदल सका। मोह भंग होने की प्रक्रिया कुछ ही महीनों में शुरू हो गयी थी और इंसानी रिश्तों के प्रति दिल्ली वालों की उदासीनता ने रिश्ते कभी मजबूत बनने ही नहीं दिये। मोहल्ले में पड़ोसिन- चाची, मौसी या भौजी के अलावा भला कुछ और कभी हो सकती थी? सोनू की मम्मी या मिसेज खंडेलवाल तो कतई नहीं।

घर के काम करने वाली को दिल्ली की रिहायशी बस्तियों में बच्चें 'आंटी' और सब्जी वाले को 'अंकलजी' जरूर कहते हैं, पर यह रिश्ता कितना बनावटी और फीका है। कालोनी के बाहर न वह सब्जी वाला हमें पहचाने की कोशिश करता है और न ही हम उससे गर्मजोशी से मिलना चाहते हैं। यहाँ तमाम रिश्ते लेन- देन के दायरे में कैद रहते हैं।

रिश्तों की व्यवसायिकता का पहला आघात हमें तब लगा जब हम सब (मैं, पत्नी व बेटियां बया-बकुल ) 25 किमी का सफर तय कर जमुना पार कालोनी से पश्चमी दिल्ली में परिचित परिवार से मिलने गये और 'आओ जी'  के साथ ठंड़े पानी और चाय बिस्कुट की सरसरी खातिरदारी के साथ विदा हो गये। यह हम 'कम प्रगतिशील'  इलाके में पले बढ़े लोगों के लिये एक गहरा धक्का था। क्या यह सम्भव है कि सपरिवार, वह भी बरसों बाद घर आया मित्र बिना भोजन किये वापस चला जाये? लगा था महानगर के लोग बहुत तरक्की कर गये हैं हम ही कहीं जड़ खड़े रह गये।

पहले पहल एक कालोनी के दूसरे तल्ले का एक फ्लैट और फिर एक बेहतर कालोनी में एक तल और ऊंचा फ्लैट। वेतन के एक तिहाई हिस्से से महीने भर के लिये कमाये 2 कमरे,  बैठक और रसोईघर। बच्चों के लिये इतनी बड़ी दिल्ली में बस इतनी सी दुनिया थी। दिन भर वह इन्हीं कमरों में दौड़-भाग व खेलकूद करते। बड़ी बेटी स्कूल चली जाती तो छोटी बिटिया बकुल अकेली पड़ जाने पर खिड़की से बाहर झांकती उदास खड़ी रहती। उसके बचपन का वह तमाम हिस्सा 10 गुणा 12 के दो कमरों व बैठक में बीत गया।

फुर्सत होने पर मां के साथ वह कभी जमीन पर उतरती। अकबकाये से इधर-उधर देखती और फिर जल्द ही अपनी छोटी ही दुनिया में वापस लौट आती। मुझे बच्चों विशेषकर छोटी बेटी को देखकर अपनी ददिहाल के पिजंडे में बंद उस 'मिट्ठू'  की याद आती जो सालों तक पिंजडे में कैद रहने के बाद बाहर खुला देने पर भी मुक्ताकाश में न जाकर वापस पिंजडे में लौट आता था।

हम कैसी मानसिकता तैयार कर रहे हैं इन नौनिहालों की?  कितनी संकुचित-सीमित दुनिया है इनकी- महानगरीय विस्तार के बावजूद। घर में यदा-कदा घुस आती जिद्दी गौरिया या तार पर बैठे अपशकुनी कौवों के अलावा ये किसी पक्षी को नहीं पहचानते। उन्हें स्कूल जाने पर किताबें बताती हैं कि हमारे आस-पास कितने तरह के पशु-पक्षी हैं। इस किताबी ज्ञान से हम कितना उन्हें धरती से जोड़ पायेंगे भला?

कभी- कभी कल्पना करता हूँ कि गुडिया सी तीन वर्षीय बकुल को अगर मैं अपने बचपन का संसार दे दूं तो वह क्या करेगी? पर सोच नहीं पाता। क्योंकि मेरे बचपन के इर्द- गिर्द घिरे पता नहीं कितने ही करेक्टर जीव-जंतु, पेड़- पौधे और किस्म किस्म के खेल बकुल की नन्हीं दुनिया में समा ही नहीं पायेंगे। अब क्या हो सकता है? कोई चारा नहीं हैं। थकान और बेचैनी में आंखें मूंद कर नन्हीं गुडिया को उसकी अपनी दुनिया में जीने के लिये छोड़ देता हूं।

लेखक बिशन कुमार वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा पिछले तीन दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. इंडियन एक्‍सप्रेस, डेक्‍कन हेराल्‍ड, आईबीएन7, इंडिया न्‍यूज, यूएनआई, सहारा, बीबीसी, शिकागो ट्रिब्‍यून जैसे संस्‍थानों में रिपोर्टर से लगायत संपादक तक का सफर राजधानी दिल्‍ली समेत कई राज्‍यों में कर चुके हैं. फिलहाल अब अपनी खुद की कंपनी ब्‍लू इंक मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के समूह संपादक हैं.


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