जूतों का लाइव और मेरे जूते की गुमशुदगी

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मनीष दुबेबीते कुछ समय से मैं कंगाली काट रहा हूँ.  पिछले दिनों भड़ास ने मेरी आप बीती "आजाद के गौरी ने हड़पे मेरे 35,000 रुपये"  प्रकाशित की.  कई लोगों के विचार आए, कई फ़ोन आए मेरे पास.  इन सब के बीच आई- गई बातों के बीच सबसे पहले मैं भड़ास का तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ,   जिसने मुझे और मेरी कलम को अपने दिनोंदिन नामचीन होते पोर्टल में जगह दी. अपनी बात रखने का मौका दिया. थैंक्‍यू.

भड़ास ने जिस दिन मेरी स्टोरी छापी मन को थोड़ी तसल्ली लाजिमी थी. पर यह तसल्ली दूर तक न जा सकी क्योकि किसी ने मेरे इकलौते जूते के जोड़े को मुझसे दूर कर दिया था. कंगाली में आटा गीला,  और उस में थोड़ा पानी ज्‍यादा हो गया. आज जब देश विदेश में बड़ी-बड़ी हस्तियों पर जूते चल रहे हैं. जूते पे स्क्रोल, जूते पे फ़ोनों, जूतों के लाइव के टाइम में जूते मंहगे हैं या सस्ते यह कहना मेरे लिए बेकार की बात होगी, क्योकि भाई अपन न तो मंहगे में हैं न सस्ते में.

सोचा चलो कहीं से व्यवस्था कर के इसे भी झेल लूँगा, पर यकीन मानिये मैंने पीठ पीछे भी उस शख्‍स को भला-बुरा नहीं कहा, जिसने मेरे जूते मुझसे दूर किये थे. क्या पता वो शायद मुझसे भी जादा कंगाल हो. मुझे सुबह अपने ऑफिस के लिए निकलना था और पहनने के लिए मेरे पास केवल 45 रुपये वाली हवाई चप्पल बची थी.  मैंने बैग उठाया और चप्पल पहन कर ऑफिस के लिए निकल पड़ा. थोड़ी शर्मिंदगी के बीच मन में सवाल उठ रहे थे. जांऊ की न जांऊ, पर नई-नई नौकरी है, कहीं चली गई तो और लाले न पड़ जाये. पत्रकारिता निष्ठुर जो ठहरी. सोच कर कहा,  चलो यार चलते हैं.

गली से मार्केट, मार्केट से सड़क, सड़क से बस आदि जगहों पर लोगों ने मेरी चप्पल और मै उन सबके पैरों में पड़े ब्रांड्स देख रहा था. कोई वुडलैंड, कोई रीबोक, तो कहीं प्‍यूमा, इन जूतों के ज़माने में मेरी हवाई चप्‍पल की क्या चाल.  खैर जैसे- तैसे ऑफिस पहुंचा. एक दो लोगों खासकर ऑफिस की कन्याकर्मियों के सामने हीनता का शिकार हुआ. किनारे की एक कुर्सी में तशरीफ रखकर कलम को धार देने लगा. कलम घिसने में मन नहीं लगा,  क्योंकि सारे टॉपिक्‍स, सारे स्टोरी आइडिया, सारी स्क्रिप्ट तो मेरे जूते ले गए थे.

मनीष दुबे

नई दिल्ली

08130073382

mkkumar893 @gmail .com


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