फाँसी की उलटबाँसी (एक)

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मुकेश कुमार अस्पताल से लौटने के बाद बाबा अपनी कुटिया में बैठे जड़ी-बूटियाँ छान रहे थे। उनके चेले महीने भर तक हिमालय की पहाड़ियों पर भटकने के बाद ये जड़ी-बूटियाँ इकट्टी करके लाए थे। बाबा उनको पारखी नज़रों से गौर से देखते और छाँट-छाँटकर अलग रखते जा रहे थे। दरअसल, पिछले कई सालों से वे यही कर रहे थे। उन्हें खोज थी एक ऐसी बूटी की, जिसे खाने से मनुष्य भविष्य में प्रवेश कर सकता है भविष्य का दर्शन कर सकता है।

इस बूटी का उल्लेख आयुर्वेद के चौथे खंड में कूट भाषा में किया गया है, मगर आज तक उसे कोई समझ नहीं पाया। बाबा को लगता है कि उन्हें रहस्य मिल गया है और वे उसमें वर्णित स्वाद, रंग एवं गंध के आधार पर उसी बूटी की खोज में लगे हुए थे। ये संयोग ही था कि आज जैसे ही उन्होंने एक बूटी के चूर्ण को जिह्वा पर रखा, उनका सर चकराने लगा और उन्हें लगा कि वे इहलोक से किसी और लोक की यात्रा पर निकल पड़े हैं। कुछ क्षणों तक वह शून्य में विचरण करते रहे। फिर धीरे-धीरे उन्होंने स्थिरता अनुभव की। इसके बाद उन्हें किसी पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म की तरह एक-एक सीन नज़र आने लगे। बल्कि यूं कहना ज़्यादा उचित होगा कि उन दृश्यों में एक किरदार की तरह वे स्वयं दिखलाई देने लगे।

बाबा ने देखा कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उन्होंने जो अभियान चलाया था, वह कामयाब हो गया है और नतीजे में भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल काँग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए को विशाल बहुमत से परास्त करके सत्ता में लौट आए हैं। चारों तरफ विजयोल्लास छाया हुआ है और उनकी जय-जय हो रही है। जगह-जगह उनको सम्मानित किया जा रहा है, उन पर पुष्पवर्षा की जा रही है। चैनलों पर हर विषय के विशेषज्ञ पत्रकार उनकी प्रशंसा के पुल बाँध रहे हैं। वे भी प्रसन्न हैं। बालकृष्ण ने उनके कान में आकर बताया कि उनकी बनाई आयुर्वेदिक दवाईयों की बिक्री सौ गुना बढ़ गई है। बाबा की प्रसन्नता भी इससे सौ गुना और बढ़ गई।

इसके बाद दृश्य परिवर्तन होता है। वे देखते हैं कि दिल्ली में प्रधानमंत्री चुनने की कवायद चल रही है। आडवाणी प्रधानमंत्री बनने की अंतिम इच्छा पूरी करना चाहते हैं, मगर जब कोई उनसे आग्रह नहीं करता तो वे घोषणा कर देते हैं कि देश का नेतृत्व किसी युवा नेता के हाथों में सौंपा जाना चाहिए और वे अब बढ़ती उम्र की वजह से राजनीति से संन्यास लेना चाहते हैं। उनके इतना कहने के बाद भाजपा के अंदर मारधाड़ शुरू हो जाती है। सुष्मा-जेटली तो आपस में गुत्थमगुत्था हैं ही मोदी भी तलवार भाँजने लगे हैं। जसवंत सिंह और मुरली मनोहर जोशी जैसे कुछ पुराने नेता भी अपना दावा ठोंक ही रहे हैं। एनडीए के दूसरे नेता मसलन, नीतीश कुमार भी फिराक में हैं कि क्या पता देवेगौड़ा की तरह उन्हीं के भाग्य से छींका टूट जाए।

अगले दृश्य में एनडीए की बैठक चल रही है और प्रधानमंत्री के सवाल पर यहाँ भी रार मची हुई है। मगर मीटिंग के बीच में ही नागपुर से संदेश आता है कि चूँकि बाबा की मुहिम की वजह से चुनाव जीता गया है इसलिए उन्हें ही प्रधानमंत्री बनाना उचित होगा। इससे तमाम दावेदारों के मुँह लटक जाते हैं मगर चूँकि उनके बीच के किसी नेता की लाटरी नहीं लग रही थी लिहाज़ा इसके लिए वे अंतत: तैयार हो जाते हैं। आनन-फानन में तीन वरिष्ठ नेताओं की एक कमेटी बनाई जाती है और उसे प्रस्ताव लेकर बाबा के पास जाने के लिए कहा जाता है। चूँकि सरकार के गठन के लिए अब समय कम बचा है इसलिए बाक़ी के लोग मंत्री-पदों के बँटवारे में लग जाते हैं।

कट टू नेक्स्‍ट सीन : तीनों नेताओं की कमेटी आश्रम में बाबा को मनाने में जुटी हुई है। बाबा बार-बार कह रहे हैं कि मुझे सत्ता का मोह नहीं है और माया से मेरा क्या वास्ता। हाँ अगर आप लोग बहुत ही ज़िद करते हो तो बालकृष्ण को प्रधानमंत्री बना लें क्योंकि वे बनें या बालकृष्ण एक ही बात है। मगर नेता लोग नहीं मान रहे हैं। अंत में जनादेश का सम्मान करने और राष्ट्रहित में बाबा हामी भर देते हैं। इससे तीनों नेता प्रफुल्लित होकर उनकी चरणधूलि अपने माथे पर रखते हैं और मोबाइल पर दिल्ली बात करने लगते हैं। रविशंकर प्रसाद और शहनवाज़ हुसैन इसकी घोषणा एक प्रेस कांफ्रेंस में करते हैं। इसी के साथ वे तिथि, मुहुर्त, स्थान के बारे में विस्तार से बताते हुए जानकारी देते हैं कि इस महान अवसर को महिमा प्रदान करने के लिए कौन-कौन सी विभूतियाँ उपस्थित रहेंगी। काँग्रेस सहित दूसरे विपक्षी दल इसे सांप्रदायिक राजनीति की जीत बताते हुए फासीवाद के ख़तरे का अंदेशा जताते हैं। बहरहाल, इस तरह बाबा इस भारत भूमि के प्रथम संत प्रधानमंत्री नियुक्त हो जाते हैं।

जारी...

इस व्‍यंग्‍य के लेखक मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों हिंदी राष्ट्रीय न्यूज चैनल 'न्यूज एक्सप्रेस' के हेड के रूप में काम कर रहे हैं.


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Comments (8)Add Comment
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written by Manohar Gaur. Chief Sub Editor, Lokmat Samachar. Nagpur, June 20, 2011
aise waqt men jab toi-nabhata, lokmat aur ht jaise bade-bade group wage board ke virodh men abhiyan chala rahen hain, DNA ka is tarah wage board ke paksha men likhana sarahaniya aur kabiletarif hai. DNA aur yogesh pawar ko shukriya kaha jana hi chahiye. shoshan ke khilaph abhiyan chalane ka dava karnewale ye bade-bade group shoshan ke karkhane bane huen hain. INS aur bade newspaper kewal chaparasi aur drivers ki salary ke bare men hi likh rahe hain. akhir iske mayne kya hain? board ke paksha men ab tak S.N.Sinha aur pawar ke lekh hi dekhane ko milen hain aur waha bhi bhadas men hi. hamare sangathanon ko bhi iske virodha men abhiyan chalana chahiye.
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written by Nitesh Mishra, June 19, 2011
आपका व्यंग्य पढने के बाद एक आम आदमी बस भटकाव का शिकार ही हो सकता है...आखिर वो किसे अपना माने... अंततः उसे चोरों के बीच छुपे किसी चोर को चुनना पड़ता है... मैं आपलोगों की तरह सोच तो नहीं सकता पर इतना जरूर कहूँगा कि जो भी लिखे स्पष्ट लिखें... और समाज को रास्ता दिखानेवाले शब्द अपने जेहन से निकालें... नहीं तो सर जी बहुत धुरंधर व्यंग्यकार पड़े हुए हैं और कितने आये... लिखकर निकल लिए... सो मेरा आपसे यही आग्रह है कि कुछ क्लिअर विज़न देने का कष्ट करें... नहीं तो गेम जारी था, है और रहेगा... साथ ही जारी रहेगी यूँ ही अंटशंट प्रकार कि उठापटक...
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written by faisal khan, June 19, 2011
mukesh ji waqayi lajawab.kamaal kar diya aapne lekin baba ramdev ka sapna is janam mai poora hone wala nahi hai jitna bhi drama BJP aur RSS ke sath mil kar kiya tha sab gus gobar ho gaya aur ab to apni jaan bachani bhari pad rahi hai wahin logon ke samne asliyat bhi khul gayi ki ye kaisa baba hai jo mahila vesh sirf jaan ke dar se dharan kar leta hai baba ko ab hosh aa gaya lagta hai tabhi to maun vart dharan kar liya hai aur rahi baat balkrishan ki to vo jis tarah se tv par ro raha tha to sari kalayi khul gayi ki kitna dam hai bande mai,,faisal khan(saharanpur)
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written by visrsingh, June 19, 2011
mukesh sir aap ka comment bahut achcha hai ,
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written by धीरेन्द्र, June 18, 2011
अरविन्द जी सही कह रहे हैं. यह हेड तो नहीं हैं लेकिन इनकी बात हेड से निकली है.
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written by sanjay singh, June 18, 2011
क्‍या धांसू व्‍यंग्‍य है। सब कुछ कह दिया। अगली कड़ी का बेसब्री से इंतजार है।
बधाई
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written by Arvind Kumar Gupta , June 18, 2011
मुकेश जी सादर प्रणाम,
बड़ा ताज्जुब लगा आप के इस फांसी की उलटबांसी -1 पढ़कर ......................क्या व्यंग्य लिखा है !.....काश आपका व्यंग्य व्यक्ति विशेष पर ना लिखकर अन्ना और बाबा राम देव के मुद्दों और सरकार पर लिखा गया होता.......... एक ऐसे चैनल का हेड जो अभी गर्भावस्था में है इस तरह संकुचित और मुद्दों से अलग हटकर व्यंग्य कर रहा है उससे क्या उम्मीद की जाय कि निष्पक्षता या औरो से कहीं से भी अलग वह कुछ नया दिखा या बता पाने में सक्षम होगा ? शायद ..........................
माना कि चैनल आन एअर होने को है तो कुछ ना कुछ खुशामदगी करनी पड़ेगी लेकिन आपको नहीं किसी और का काम है यह ..................
टी आर पी का दबाव आप पर भी बनेगा लेकिन ज़रा उन मुद्दों को भी उठाकर तो देखिएगा जिससे करोडो लोगो की भावनाएं जुडी है , जुड़ा है देश का भविष्य ........................अगर अपनी काबलियत दिखानी है तो भीड़ से हटकर कुछ अलग करके दिखाएँ ................यह मेरी सलाह नहीं बल्कि आम लोगो की मीडिया से उम्मीदे हैं!
अगर यही मौजूदा सरकार विपक्ष में होती और सरकार किसी दूसरे गठ्वंधन की होती तो क्या ये कांग्रेसी लोकपाल बिल का इस तरह विरोध करते या शर्तो वाली बात करते ? शायद नहीं उम्मीद करता हु कि आपके फांसी की उलटबांसी -2 में निष्पक्षता होगी !
और एक ऐसे दूध से धुले इंसान कि कल्पना होगी जो मसीहा बनकर आएगा और इन भ्रस्टाचारियो का विनाश कर भारत के स्वर्णिम भविष्य का निर्माण करेगा !

लेखक एक अदना सा (टी वी न्यूज़ चैनल का) संबाददाता है !
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written by MANINDER, June 18, 2011
मुकेश जी आपने तो वाकये में कमाल कर दिया और धोती फाड़ कर रुमाल कर दिया .......लाजवाब

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