फाँसी की उलटबाँसी (अंतिम)

E-mail Print PDF

मुकेश कुमार न्यूज़ चैनलों में बीमार बाबा के दृश्य छा गए। दिन-रात उनकी हेल्थ बुलेटिन चलने लगीं और उनके ब्लड प्रेशर का उतार-चढ़ाव सेंसेक्स की तरह बताया जाने लगा। बहरहाल, किसी तरह दो-चार दिनों में बाबा ठीक हुए मगर एक नया बखेड़ा खड़ा हो गया। हुआ यूं कि लोकसभा में भ्रष्टाचार को लेकर आरोप-प्रत्यारोपों का दौर चल रहा था। दो-तीन बार बैठक स्थगित भी हो चुकी थी।

इसी बीच में किसी कम्युनिस्ट नेता ने चुनौती उछाल दी कि बाबा में दम है तो पहले वे अपनी बिरादरी के भ्रष्टाचारियों की शिनाख़्त करें और उन्हें फाँसी पर चढ़ाएँ। उसने ये भी कह दिया कि नब्बे फ़ीसदी साधु-संत भ्रष्ट हैं और बाबा में हिम्मत ही नहीं है कि उनके ख़िलाफ़ कुछ करें। बाबा को ताव आ गया। उनके आजू-बाजू में बैठे नेता उन्हें रोकते इसके पहले ही उन्होंने ऐलान कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट के ग्यारह जजों की एक कमेटी सभी संतों की जाँच करेगी और तीस दिनों के अंदर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप देगी।

कट टू संत महासभा :  बाबा की घोषणा के बाद तो मानो देश में भूचाल ही आ गया। अब ये तो सब संत जानते ही हैं कि उनके पास धर्म के नाम पर काला धन ही आता है और उसी से उनका राज-पाट चलता है। इसका मतलब है कि वे भी करप्शन के लपेटे में आ जाएंगे। ज़ाहिर है कि बाबा की घोषणा ने उनके लिए संकट खड़ा कर दिया, इसलिए उन्होंने तुरंत संत महासभा बुलाकर गोलबंदी शुरू कर दी। इस तरह पूरा संत समाज बाबा के ख़िलाफ़ हो गया। उन्होंने बाबा को संत-द्रोही, धर्म-द्रोही घोषित कर दिया। विश्व हिंदू परिषद ने इसे हिंदू धर्म पर हमला करार दिया और देश भर में संत पूजा अभियान छेड़ दिया। इस सबसे बाबा की हालत और भी पस्त हो गई।

बाबा ने अपने दूत संतों के पास भेजे। संतों ने उन्हें आदेश दिया कि तुरंत प्रभाव से देश में सेंटोक्रेसी (संत-तंत्र) लागू की जाए और इसमें ऐसी व्यवस्था की जाए कि केंद्र से लेकर ग्राम स्तर तक संत-मंडल बनें और वही देश की शासन व्यवस्था चलाएं। भ्रष्टाचार के सवाल पर उन्होंने कहा कि उसे दो भागों में बाँटा जाना चाहिए-पहला तो सात्विक भ्रष्टाचार और दूसरा तामसिक भ्रष्टाचार। संत-महात्मा सात्विक भ्रष्टाचार करते हैं। वे अगर काला धन लेते भी हैं तो सात्विक कामों के लिए इसलिए उन्हें भ्रष्टाचार अधिनियम के कानूनों से मुक्त किया जाना चाहिए। मुल्ला-मौलवियों को सेंटोक्रेसी के बारे में पता चला तो उन्होंने इसका समर्थन करते हुए माँग कर दी कि इसमें दूसरे धर्मों के धर्मगुरूओं को भी शामिल की जाए ताकि देश का धर्मनिरपेक्ष चरित्र कायम रखा जा सके।

ब्राम्हण महासभा को सेंटोक्रेसी का पता चला तो उन्होंने अव्वल तो आरक्षण व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से ख़त्म करने की माँग कर दी और ये भी उम्मीद जताई कि इसमें ब्राम्हणों का विशेष ध्यान रखने की व्यवस्था का प्रावधान करने की माँग कर दी ताकि अगर कोई शूद्र उनके विरुद्ध कुछ भी करे तो उन्हें मनु-संहिता के हिसाब से दंडित किया जा सके। बाबा खुद यदुवंशी थे मगर वे अब खुद को ब्राम्हण ही समझते थे, इसलिए वे इस पर विचार करने के लिए तैयार भी हो गए। लेकिन पिछड़ों और दलितों को जब इसकी ख़बर लगी तो उन्होंने इसका विरोध शुरू कर दिया। लालू यादव और मुलायम सिंह ताल ठोंककर मैदान में उतर पड़े और मायावती ने भी इस मौके को गँवाना ठीक नहीं समझा। तमिलनाडु में द्रविड़ पार्टियों ने और दूसरी जगहों पर दलित संगठनों ने आंदोलन छेड़ दिया जिसके फलस्वरूप जगह-जगह हिंसा भड़कने लगी। कुछ ऐसा ही महिला संगठनों के साथ भी हुआ, क्योंकि स्त्रियों को नियंत्रण में रखने के उपाय करने की बातें भी सेंटोक्रेसी के तहत की जा रही थीं। मगर उनके जवाब में बजरंग दल और शिवसैनिक उतर पड़े और उन्होंने यहाँ वहाँ प्रेमी जोड़ों को पकड़कर पीटना शुरू कर दिया।

फाँसी की सज़ा को लेकर देश ही नहीं दुनिया भर में हंगामा मच गया। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसके ख़िलाफ़ विश्वव्यापी अभियान छेड़ दिया। मानवाधिकार संगठनों ने भी कानून के ख़िलाफ़ आंदोलन करने की चेतावनी दे डाली। देश भर का प्रबुद्ध तबका लामबंद हो गया और जगह-जगह सभा सेमिनारों के ज़रिए आवाज़ बुलंद करने लगा।

चैनलों को तो मानो ज़बर्दस्त टीआरपी खींचू मसाला मिल गया। उनमें अलग-अलग एंगल से ख़बरें चलने लगीं और माहौल बाबा के ख़िलाफ़ बनने लगा। जो चैनल बाबा को खुश करके टीआरपी बटोरने में लगे रहते थे, अब उनकी मुखालफ़त करके रेटिंग पाने की जुगत में लग गए। उन पर ख़बर चलने लगी कि भ्रष्टाचारियों के परिजन फाँसी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करेंगे और इंडिया गेट पर कैंडल लेकर अनिश्चितकालीन धरना भी देंगे। उन्होंने एक परिजन की बाइट भी दिखाई जो कह रहा था कि अगर हमारे घरवाले भ्रष्ट हैं तो बाबा भी भ्रष्ट हैं क्योंकि वे भ्रष्ट लोगों के साथ मिलकर एक भ्रष्टाचारी सरकार चला रहे हैं।

साउथ ब्लॉक के अपने दफ़्तर में बैठे बाबा टीवी पर यही सब देख रहे थे जब बालकिशन ने उन्हें फोन देते हुए कहा कि अमेरिका से बराक ओबामा लाइन पर हैं। बाबा हाय हलो कुछ करते इसके पहले ही वहाँ से ओबामा ने कहा- बाबाजी मैं एक लिस्ट भेज रहा हूँ जिसमें अमेरिकी कंपनियों के नाम हैं। ध्यान रहे इनके खिलाफ़ कुछ नहीं होना चाहिए नहीं तो हम सारी इनवेस्टमेंट वापस ले लेंगे और पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के सारे जिहादी इंडिया पर छोड़ देंगे। इसके बाद उन्होंने बगैर कुछ सुने लाइन काट दी। बाबा को कुछ समझ में नहीं आया। एक तो अमेरिकन लहज़े वाली अँग्रेज़ी और उस पे सीधे-सीधे धमकियाँ। इसका उनको तजुर्बा था नहीं, इसलिए उनका ब्लड प्रेशर हाई होने लगा। उन्हें पसीने छूटने लगे। वे चीखकर किसी को बुलाना चाहते थे मगर आवाज़ हलक में अटककर रह गई। आसपास मदद के लिए देखने लगे मगर बालकिशन तब तक जा चुके थे। इसी समय जड़ी-बूटी का असर समाप्त होने लगा। धीरे-धीरे वे भविष्य से वर्तमान में लौटने लगे। थोड़ा संयत होने पर उन्होंने लौकी का जूस मँगाकर पिया और पाँच मिनट तक कपाल भाति की।

इस तरह बाबा का भविष्य दर्शन संपन्न हो गया। अब ये पता नहीं है कि उन्हें इस भविष्य दर्शन से भविष्य दृष्टि मिली या नहीं, मगर बाबा किसी उधेड़बुन में अवश्य फँसे प्रतीत होते हैं। वे इस धर्मसंकट में हैं कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान की आफ़त मोल ली जाए या फिर भविष्य-दर्शन की जड़ी-बूटी को पेटेंट करवाकर अपने उद्योग को विस्तार दिया जाए।

समाप्त

इस व्‍यंग्‍य के लेखक मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों हिंदी राष्ट्रीय न्यूज चैनल 'न्यूज एक्सप्रेस' के हेड के रूप में काम कर रहे हैं.

फाँसी की उलटबाँसी (एक)

फाँसी की उलटबाँसी (दो)


AddThis