25 जून पर विशेष (1) : अघोषित आपातकाल तो आज भी लागू है

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: इमरजेंसी 36 साल बाद : अगर आपातकाल का मतलब है- कुछ कानूनों के हाथों नागरिकों की आजादी का ठप हो जाना, नागरिक-अधिकारों के हनन पर सवाल उठाने वालों का निरंतर इस सदमे में जीना कि कहीं राजद्रोह का अपराधी ठहराने वाले कानूनों की कैद में जकड़ न लिया जाये और खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले मीडिया का नागरिक-अधिकारों के हनन पर ज्यादातर चुप्पी साधे रहना, तो फ़िर एक अघोषित आपातकाल आज भी लागू है...

यह अघोषित आपातकाल पूरे देश में न सही, मगर उन इलाकों में जरूर, जहां निजी पूंजी जल-जंगल-जमीन और खनिज से मुनाफ़ाखोर कमाई के लिए सरकारी मदद से नये उपनिवेश बसा रही है. अब से छह महीने पहले छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाके में गरीबों के बीच जीवन होम करने वाला एक डॉक्टर जेल में था. मुकदमे की सुनवाई के दौरान उसने अदालत से पूछा- सेक्शन 124-ए क्या होता है? जज का जवाब था- ‘राजद्रोह.’ और जैसा कि राजद्रोह के मुकदमे में अंग्रेजों के जमाने में होता था, स्थानीय अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुना दी. उम्रकैद की सजा पाने वाला वह डॉक्टर जिसे दुनिया बिनायक सेन के नाम से जानती है, अदालत से नहीं पूछ सका कि इस लोकतंत्र में जब कोई राजा नहीं है तो राजद्रोह का कानून कैसे हो सकता है. मगर राजद्रोह का कानून मौजूद था और उसकी मर्जी सबसे ऊपर थी.

...और अब से 36 साल पहले, 25 जून 1975 की आधी रात, यानी उस वक्त जब आज के हिंदुस्तान की बहुसंख्य आबादी की जीवन-लीला शुरू नहीं हुई थी, देश में आपातकाल लगा, तब भी ऐसा ही वाकया पेश आया था- लोगों का विवेक विद्रोह कर रहा था, मगर हाथ कानून से बंधे हुए थे. आपातकाल के जिन 19 महीनों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में नागरिक-अधिकारों के बूते उपजने वाली आजादी ठप रही, उन महीनों में एक लाख से ज्यादा लोग हिरासत में लिये गये, बिना मुकदमे के जेल में रखे गये और पुलिसिया ज्यादती के शिकार हुए. अदालत तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मर्जी के आगे मूक थी, मगर एक जज का विवेक उसकी आत्मा को कचोट रहा था. जस्टिस एचआर खन्ना ने तब के एटर्नी जनरल नीरेन डे से पूछा- क्या मौजूदा हालात में कानून में कोई उपाय है कि निर्दोष नागरिकों को पुलिस की गोली से बचाया जा सके. नीरेन डे का जवाब था- ‘माई लार्ड, मेरा विवेक विद्रोह कर रहा है, मगर कानून में फ़िलहाल ऐसा कोई उपाय मौजूद नहीं है.’

अगर ‘इंदिरा इज इंडिया’ के नारे को याद करते हुए मानें कि आपातकाल का मतलब है लोकतांत्रिक राज्यसत्ता को किसी एक व्‍यक्ति या पद का वाचक मानकर उसकी मर्जी को सवरेपरि बनाना, तो आज देश में घोषित तौर पर आपातकाल नहीं है, ना ही इसके आसार हैं. लेकिन अगर आपातकाल का मतलब है- कुछ कानूनों के हाथों नागरिकों की आजादी का ठप हो जाना, नागरिक-अधिकारों के हनन पर सवाल उठाने वाले लोगों का निरंतर इस सदमे में जीना कि कहीं राजद्रोह का अपराधी ठहराने वाले कानूनों की कैद में जकड़ न लिया जाये और खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने वाले मीडिया का नागरिक-अधिकारों के हनन पर ज्यादातर चुप्पी साधे रहना, तो फ़िर एक अघोषित आपातकाल लागू है- पूरे देश में न सही, मगर उन इलाकों में जरूर, जहां निजी पूंजी जल-जंगल-जमीन और खनिज से मुनाफ़ाखोर कमाई के लिए सरकारी मदद से नये उपनिवेश बसा रही है.

ऐसे ही इलाकों की फ़ेहरिस्त में शामिल है- पश्चिम बंगाल के सिंगूर-नंदीग्राम की धनखेतियां, ओड़िशा के नियमगिरी के पहाड़ी इलाके की बस्तियां, छत्तीसगढ़ का इंद्रावती नदी के पार का आदिवासी बहुल किनारा और बुलंदशहर-अलीगढ़-मथुरा-आगरा का वह शस्यश्यामला दोआब जहां दिल्ली के लालकिले को आगरा के ताजमहल से जोड़ने की पर्यटनी हड़बड़ी में पुलिस की सेंध लगती है, कोई सनहा लिखने वाला नहीं होता और आक्रोश में कोई बाहर निकलकर अपनी बेचारगी में रोये-चिल्लाये तो सरकारी बंदूक से दनादन गोली चलती है. याद कीजिए भट्ठा-परसौल और सोचिए कि वह आकस्मिक आपातकाल नहीं तो और क्या था कि एक समय जिस किसान नेता के साथ घूमने में इस देश का नेतृत्व वर्ग फ़ा महसूस करता था, उसी मनवीर सिंह तेवतिया को बस एक रात के फ़ासले में भगोड़ा और अपराधी ठहराकर उसके सिर पर 50 हजार रुपये के इनाम का ऐलान कर दिया गया. क्या उसके बाद किसी तेवतिया के लिए जेल के अलावे सिर छुपाने के लिए कोई और जगह बची थी? और क्या तब यूपी पुलिस की किसी जेल में उसके लिए इस बात की गारंटी थी कि एनकाउंटर न कर दिया जायेगा?

देश में ऐसे इलाके लगातार बढ़ रहे हैं, जहां तेवतिया की तरह कोई कहे कि शीशे के महल बसाने के लिए किसानों की जीविका का एकमात्र आधार जमीन छीनी नहीं जा सकती तो उसे भगोड़ा घोषित कर उसका एनकाउंटर तक किया जा सकता है. ऐसे आदिवासी इलाके भी बहुत हैं, जहां माओवादी हिंसा और सरकारी बलों की लड़ाई के बीच जलते गांवों में जाकर कोई बिनायक सेन की तरह घायलों की मरहम-पट्टी करे तो उसे राजद्रोह के अपराध में उम्रकैद की सजा सुनायी जा सकती है. यह सिर्फ़ आशंका नहीं है, एक ऐसी सच्चाई है जिसे देश के लोकतांत्रिक ढांचे के भीतर काम करने वाली संस्थाएं तक स्वीकारती हैं. मिसाल के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2006 से 2009 के बीच 434 लोगों की पुलिसिया हिरासत में मौत हुई है. मानवाधिकार आयोग के ही दूसरे आंकड़े कहते हैं कि साल 1993 से 2008 के बीच पुलिस के साथ मुठभेड़ में जिन 2560 लोगों की मौत हुई है, उनमें 1224 व्‍यक्ति ‘फ़ेक एनकाउंटर’ में मारे गये.

नागरिक-अधिकारों की आवाज उठाने वाले मुखर लोगों में से एक डॉक्टर बिनायक सेन आज जेल से बाहर हैं, तो क्या यह मान लिया जाये कि जो लोग भारत के भीतर निजी पूंजी की मुनाफ़ाखोरी के हाथों बसते नये उपनिवेश में आम बाशिंदों के जीवन-जीविका-गरिमा का सवाल उठा रहे हैं, वे अपनी बात सरकारी खौफ़ से बेखटके होकर कह सकते हैं? गुजरे दो जून को ही एमनेस्टी इंटरनेशनल ने खबर दी थी कि रमेश अग्रवाल और और डॉक्टर हरिहर पटेल नाम के दो मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर छत्तीसगढ़ सरकार ने झूठे आरोप मढ़कर गिरफ्तार कर लिया है, उन्हें जमानत पर रिहा करने से अदालत ने इनकार किया है. रमेश अग्रवाल के हायपरटेंशन का उपचार सरकारी अस्पताल में कुछ इस तरह किया जा रहा है कि उन्हें बेड पर जंजीरों में जकड़ कर रखा गया है. रमेश या हरिहर पटेल का दोष क्या है? यही कि दोनों ने लोगों को यह समझाने का अपराध किया कि इलाके में एक निजी कंपनी कोयले जलाकर बिजली बनाने का जो थर्मल स्टेशन बना रही है, उससे लोगों के जीवन और जीविका को नुकसान पहुंचेगा. जाहिर है, देश के भीतर निजी पूंजी के हाथों बस रहे नये उपनिवेशों में आप नागरिक अधिकारों की बात करेंगे तो आप पर आरोप मढ़े जा सकते हैं और आपको माओवादी करार देकर राजद्रोही साबित किया जा सकता है- रमेश और हरिहर पटेल की गिरफ्तारी इसी की एक बानगी है.

बिनायक सेन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद सभी जानते हैं कि स्थानीय अदालत का उम्रकैद का फ़ैसला अपुष्ट प्रमाण, झूठे गवाह और पुलिस के परस्पर विरोधी बयानों को सही मानकर दिया गया था. बिनायक सेन छूट गये हैं, हो सकता है कल को रमेश अग्रवाल भी छूट जायें, पर मूल सवाल तब भी अनुत्तरित रहेगा- कि अगर देश में लोकतंत्र है तो फ़िर मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों के खिलाफ़ आवाज उठाना और बीमार विचाराधीन कैदियों के उपचार में मददगार होना या फ़िर जारी व्यवस्था के अन्यायों से असहमत होकर विरोध दर्ज कराना, यानी वह सबकुछ जो बिनायक सेन या रमेशचंद्र-हरिहर पटेल ने किया, अपराध कैसे कहला सकता है?

इस विडंबना पर गौर कीजिए कि जिस ब्रिटेन ने भारत में अपना राज कायम रखने के लिए राजद्रोह का कानून लागू किया था, उसमें यह कानून बरसों पहले खत्म किया जा चुका है. मगर उसी ब्रिटिश शासन से आजाद होने वाले भारतीय लोकतंत्र में यह कानून आज भी बदस्तूर जारी है. नागरिक-अधिकारों पर सरकारी सुविधा के मुताबिक पहरा बिठाकर जब चाहे तब इमरजेंसी लगाने वाले ये कानून ही हैं कि एक गरीब लड़की इरोम चानू शर्मिला गुजरे साढ़े दस सालों से भूख हड़ताल करके सरकारी नजरों में यह पूछने का अपराध कर रही है कि क्या मणिपुर कोई‘एनमी-जोन’है जो वहां सशस्त्र बलों को अपनी मर्जी से चाहे जिस पर गोली चला देने का अधिकार देने वाला स्पेशल कानून लागू किया गया है.

कानून है तो उसका उपयोग है और उपयोग है तो फ़िर शोषण की वह सच्चाई भी कहीं ना कहीं होनी ही चाहिए, जिसके बारे में यह सोचकर कि जनता कहीं बगावत ना कर बैठे, अपना राज बनाये रखने के लिए अंग्रेजी-सरकार ने राजद्रोह का कानून बनाया था. सोचें कि कहां हैं शोषण के वे ठिकाने और यह भी कि क्या उदार आर्थिक नीतियों के दौर में ये ठिकाने भारत के भीतर निजी पूंजी के नये आंतरिक उपनिवेश बन रहे हैं, क्योंकि उपनिवेशों में ही नागरिक-अधिकारों का सबसे ज्यादा हनन होता है, वहीं से व्यवस्था के आमूल बदलाव की आवाजें भी उठती हैं और उन्हीं आवाजों को टोकने के लिए राजद्रोह के कानून बनाये जाते हैं. इमरजेंसी को बीते चाहे 36 साल हो रहे हों, लेकिन निजी पूंजी के हाथों शोषण के नये ठिकानों में तब्दील होते देश के कुछ भू-भागों में इमरजेंसी जैसे हालात अब भी कायम हैं.

प्रभात खबर में प्रकाशित चंदन श्रीवास्तव की रिपोर्ट


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