25 जून पर विशेष (4) : भ्रष्ट आचरण, नाचते कूदते नंदीगण और इंदिरा गांधी का (अ)न्याय

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वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने पत्रकार स्वर्गीय राजेंद्र माथुर ने एक लेख लिखा था. 12 जून 1975 को. इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद. इसे आप पढ़ेंगे तो महसूस करेंगे कि देश में हालात सुधरे नहीं बल्कि बदतर हुए हैं. काले धन की समस्या और विकट हो गई है. सिस्टम का पतन और ज्यादा हो चुका है. कांग्रेसियों का लोकतंत्र विरोधी आचरण और ज्यादा दिखने लगा है.

जी हुजूर शोर के बीच खोया एक सार्थक क्षण

राजेंद्र माथुर

परसों सवेरे इंदिरा गांधी ने इस्तीफा नहीं दिया, जबकि सारा देश सांस रोक कर उनके इस्तीफे का इंतजार कर रहा था। वह एक इस्तीफा सारे अतीत को धो सकता था, और इंदिराजी के साहस के लिए और नैतिक संवेदना के लिए एक स्तब्ध सराहना का भाव हवा में लहरा सकता था। उस एक इस्तीफे से नेता के रूप में इंदिरा गांधी की ऊंचाई कई गुना बढ़ जाती। लेकिन चापलूस, जीहुजूर सलाह मशविरों के बीच सारा दिन गुजर गया और सार्थकता का वह मुमकिन क्षण न जाने कहां खो गया।

इस्तीफा न देकर इंदिरा गांधी ने फिर सिद्ध किया है कि वे आज भी वही महिला हैं, जिसने 1969 के उन अनिश्चित दिनों में अंतरात्मा की आवाज का आह्वान किया था, और भयावह अंदरूनी दलबदल के जरिए जिसने वराह गिरि वेंकट गिरि नामक एक गैर-कांग्रेसी उम्मीदवार को जितवा दिया था। मर्यादाओं के अवमूल्यन के बाद जो खोटे सिक्के राजनीति में तबसे चलने लगे हैं, उनकी तादाद अब बेशुमार बढ़ गई है, जिसका नतीजा यह है कि अदालत द्वारा भ्रष्ट आचरण का फतवा दिए जाने के बाद भी अनगिनत नंदीगण नाचते कूदते इंदिरा गांधी से निवेदन कर रहे हैं कि इलाहाबाद के फैसले के बाद भी वे बनी रहें।

प्रधानमंत्री को बहुत मनाने की जरूरत पड़ी हो, ऐसा भी प्रतीत नहीं होता। आधे सेकंड के लिए भी उनके मन में यह विचार नहीं कौंधा कि कुर्सी छोड़ देना बेहतर होगा। अभिनय के लिए भी उन्होंने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के सामने इस्तीफे का प्रस्ताव नहीं रखा। श्रीनगर में छुट्टी मनाते राष्ट्रपति दिल्ली पर संवैधानिक संकट आया समझ लौटने वाले थे, लेकिन दिल्ली से उन्हें संदेश मिल गया कि संकट-वंकट कुछ नहीं है। उन्होंने यकीन कर लिया कि संकट नहीं है। आखिर प्रधानमंत्री जो भी फैसला करेंगी, वह राष्ट्रपति द्वारा खाई गई कसमों के अनुरूप ही होगा। वे नहीं आए।

कानून के जानकारों से कहलवाया गया कि स्वयं न्यायाधीश ने बीस दिन के लिए अपने फैसले पर नास्ति, नास्ति का आदेश दे दिया है। फैसला जब है ही नहीं, तो फिर इस्तीफे का प्रश्न ही कहां खड़ा होता है? जो है, वह बस ढाई सौ पन्नों का एक निबंध है जो इलाहाबाद के जज ने जंचवाने के लिए अभी दिल्ली भेजा है। श्री जगजीवन राम ने कांग्रेस संसदीय बोर्ड के सामने यह विचित्र थीसिस रखी कि कानून भले ही कुछ भी कहे, लेकिन इंदिराजी को नेतृत्व का नैतिक अधिकार है। यानी कांग्रेस के लिए येनकेन प्रकारेण प्राप्त की गई कुर्सी नैतिक है, और वह कुर्सी कैसे प्राप्त हुई इस बात की हर जांच अनैतिक और अवांछित है।

कानून की चर्चा करने से क्या फायदा? कानून में तो यह भी नहीं लिखा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा भ्रष्ट आचरण का तमगा मिलने के बाद किसी प्रधानमंत्री के लिए इस्तीफा देना जरूरी होगा। फैसला लोकसभा की सीट का है, इस बात का नहीं कि साढ़े तीन सौ कांग्रेसियों ने अपना नेता किसे चुना और क्यों चुना? छह महीने तक प्रधानमंत्री के लिए लोकसभा का सदस्य रहना जरूरी नहीं। और छह महीने के अंदर निश्चय ही यह प्रगतिशील संशोधन किया जा सकता है कि लोकसभा के नेता के लिए लोकसभा का सदस्य होना जरूरी नहीं होगा। मुख्य चुनाव आयुक्त को यों उच्चतम न्यायालय का फैसला कचरे में फेंकने का अधिकार है ही। अब बताइए सिर्फ कानून क्या करेगा? सवाल सिर्फ शोभनीयता का और मर्यादाओं का है, और कांग्रेस के नेता इन छह वर्षों में बेरहमी से उन्हें रौंद रहे हैं।

इंदिरा गांधी रहें या न रहें, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने उनका रूबरू मुकाबिला उन्हीं के बनाए भस्मासुर से करवा दिया है। ईमानदार तथा सोच-विचार करने वाले लोग महीनों से कह रहे हैं कि काले धन का महासागर भारत में इसलिए लहरा रहा है कि इसी काले पैसे के बूते पर सत्ताधीशों की कुर्सी टिकी है। महीनों से जयप्रकाश नारायण पागलों की जरह चुनावों को साफ सुथरा बनाने की गुहार मचा रहे हैं। लेकिन ताबड़तोड़ सिक्किम विलय का संशोधन करने वाली सरकार, ताबड़तोड़ अमरनाथ चावला के मुकदमे का फैसला रद्द करने वाली सरकार, चुनाव सुधार के मामले में कछुए की चाल से चल रही है, क्योंकि कच्छपत्व में उसके निहित स्वार्थ हैं। इंदिरा गांधी को चुनावी गड़बड़ के कारण अपात्र माना गया है, इसमें बड़ा कवित्वमय न्याय है, क्योंकि इस मामले में तो प्रदूषण की गंगोत्री सचमुच वे ही हैं।

न्यायाधीश ने जिन मुद्दों पर उन्हें दोषी पाया है, वे अपेक्षया गौण हैं। कुछ सरकारी अफसरों ने कुछ चुनाव सभाओं में इंदिरा जी के लिए मंच बनवाए और बिजली का प्रबंध किया, इससे भारत का वोटर क्या प्रभावित होगा, जिसने चुनाव के समय सारे देश को गंदे चहबच्चों और बदबूदार पनालों में बदलते देखा है। यशपाल कपूर नामक एक सरकारी अफसर के इस्तीफे की तारीख से क्या फर्क पड़ता है, जबकि सारी जनता जानती है कि सरकारी एजेंसियों का चुनाव में धड़ल्ले से सर्वत्र इस्तेमाल होता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जो मुद्दे गुनाह के पाए हैं, वे गौण हैं। लेकिन अदालत में समूची सच्चाई कभी सिद्ध नहीं होती और आइसबर्ग के शिखर की तरह जितनी सच्चाई सिद्ध हो जाए, उसके लिए हमें इनसान की लापरवाही के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। लेकिन इलाहाबाद में क्या सिद्ध हुआ और क्या नहीं हुआ, यह महत्वपूर्ण नहीं है। रायबरेली में इंदिरा गांधी की ओर से क्या किया गया वह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि सारे देश में, सीट-सीट पर आज चुनाव के नाम पर क्या चल रहा है। किसने हुकूमत को आज एक असंख्य तानोबानोवाली लेवी प्रणाली का रूप दे दिया है?

सरकारी खजाने में जमा होने वाले टैक्स के अलावा हर स्तर पर एक प्रायवेट चौथ की प्रणाली क्यों शुरू हो गई है? कांग्रेस की वर्तमान हुकूमत क्योंकि इन सारे प्रश्नों का उत्तर सिर्फ अपनी मोटी चमड़ी का सार्वजनिक प्रदर्शन करके देती है, इसलिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में निजी न्याय से परे एक ऐतिहासिक न्याय भी है। निजी न्याय की पकड़ से इंदिरा गांधी निकल सकती हैं, लेकिन ऐतिहासिक न्याय के तकाजों का उनके पास क्या जवाब हैं? इस्तीफा देकर वे यह प्रदर्शित कर सकती थीं कि ऐतिहासिक न्याय के तकाजों के प्रति वे संवेदनशील हैं। लेकिन यदि वे कुर्सी पर बनी रहीं, तो भी इतिहास की चुनौतियों का उत्तर तो उन्हें देना ही होगा।

इलाहाबाद के जज के सबसे बड़े सवाल वे हैं, जो परसों के फैसले में नहीं लिखे गए। समूची जनता ये सवाल दिल्ली के हाकिमों से पूछ रही है, और हाकिम कह रहे हैं कि एक अकेला जज अपने कास्टिंग वोट से करोड़ों लोगों की पसंद तो ध्वस्त नहीं कर सकता। लेकिन जज अकेला नहीं है, यह अंशत: गुजरात के चुनावों ने सिद्ध किया है। लेकिन इंदिरा गांधी से इस्तीफे की उम्मीद करना शायद आशावादियों का निरा सु:स्वप्न था। राज करने के लिए जो नेता नियमों और मर्यादाओं की जरूरत महसूस न करे (दरअसल इन चीजों से राजकाज ज्यादा आसान बनता है, और कुर्सी अधिक प्रामाणिक एवं प्रतिष्ठित हो उठती है) उस नेता से महज शोभनीयता के खातिर राजत्याग की उम्मीद रखना दुराशा नहीं तो क्या है?

निश्चय ही इंदिरा गांधी के इस्तीफे से भारतीय गणतंत्र की स्थिरता के कुछ भयावह सवाल खड़े हो सकते थे। लेकिन आगे पीछे तो हमें यह तय करना ही होगा कि यह राष्ट्र-राज्य चक्रवर्ती व्यक्तियों के भरोसे टिका हुआ है या वह भारत की जनता द्वारा अनुमोदित संस्थाओं और नियमों के भरोसे टिका है। जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री के उत्तराधिकार के मामले जिस ढंग से भारत ने निपटाए, उससे यह भय निराधार ही लगता है कि भारत में प्रधानमंत्री का परिवर्तन राज्यक्रांति की तरह भूकंपकारी है। फिर भी वह भय है, और सब उससे ग्रस्त हैं। लेकिन इंदिरा गांधी अपने इस्तीफे द्वारा देश की राजनीतिक नियामतों में एक महत्वपूर्ण वरदान और जोड़ सकती थीं। यदि वे अलग हट जातीं, तो देश को एक योग्य और प्रशंसित नेता हमेशा रिजर्व में उपलब्ध होता, और किसी भी संकट के क्षण में वे फिर से प्रधानमंत्री बन सकती थीं। क्या इस देश में भूतपूर्व प्रधानमंत्री कहा जाने वाला कोई व्यक्ति कभी होगा ही या नहीं?


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