क्या हिन्दी अखबारों को सम्पादक की जरूरत है?

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सम्पादक की दम तोड़ती हुई परम्परा के मद्देनजर यह सवाल उठाना बेहद जरूरी हो गया है कि क्या हिन्दी अखबारों को सम्पादक की जरूरत है? और सम्पादक से आशय पत्रकारिता की समझ रखने वाले लोगों से है ना कि मैनेजमेंट वालों से। एक समय था जब हिन्दी पत्रकारिता अपने सम्पादकों के कारण जानी और पूजी जाती थी।

मसलन रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, एसपी सिंह, उदयन शर्मा, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, राहुल बारपुते, एनके सिंह से लेकर एक लंबी फेहरिस्त है। इनका लेखन ही इनकी पहचान था लेकिन आज हिन्दी पत्रकारिता किस दौर में पहुंच गई है?  सम्पादकों का लिखने से कोई बहुत ज्यादा वास्ता नहीं है, वे कितना अच्छा मैनेजमेंट कर सकते हैं सब कुछ इसी पर निर्भर हो गया है, यही वजह है कि अखबार तो फलफूल रहे हैं लेकिन सम्पादक नाम की संस्था दम तोड़ रही है।

मेरे एक मित्र हाल ही में दिल्ली से निकलने वाली एक बड़ी साप्ताहिक पत्रिका के सम्पादक पद से हटाए गए पता चला कि मैनेजमेंट के दबाव के कारण उन्हें विज्ञापनों के लिए विभिन्न राज्यों की राजधानियों में भटकना पड़ता था। कई न्यूज चैनल्स के ब्यूरो ऐसे लोगों को दिए गए हैं जो ज्यादा से ज्यादा धनराशि जुटा सकते हों। सम्पादकों पर भी जबर्दस्त दबाव है कि वे नेताओं से तालमेल बढ़ाकर विज्ञापन जुटाएं। ऐसे में बेचारा सम्पादक विज्ञापन के तनाव पाले या फिर लेखन करे?

जाहिर है कि मैनेजमेंट तेजी से सम्पादकों को ऐसे काम में लगा रहा है जो उनके नहीं हैं। आज कोई भी मैनेजमेंट अपने सम्पादकों से ऐसा नहीं कहता कि आप ऐसी कलम चलाओ कि पढ़ने वालों को अच्छा खासा वैचारिक माहौल मिले। यही वजह है कि अब कोई भी अखबार अपने यहां राजेन्द्र माथुर जैसे सम्पादक नहीं चाहता। सबको मैनेजमेंट एडिटर चाहिए। ऐसे अखबार अपने पाठकों को भी अप्रत्यक्ष में यही संदेश दे रहे हैं कि यहां ज्यादा वैचारिक की उम्मीद मत रखो। पाठकों तुम भी सुधरो हमें सुधरे तो अर्सा हो गया। अखबार के पहले पन्ने पर पहले सम्पादकीय की झंकार सुनाई देती थी वह जगह तो कभी की कार्पोरेट सेक्टर को नीलाम हो गई वहां तो सिर्फ अखबार का मत्था बचा है। ऐसे में इन अखबार वालों को कौन समझाए कि बिकती है खबर, अखबार नहीं और बिकता है विचार विज्ञापन नहीं।में ही बांटने पड़ते हैं। उन्हें दाम चुकाकर कोई भी नहीं खरीदता? यदि सम्पादक नाम की संस्था को दमदार बना दिया जाए तो आज भी अखबारों को बिकने से और चर्चित होने से कोई नहीं रोक सकता? लेकिन मैनेजमेंट को तो सम्पादक वही चाहिए जो विज्ञापन दिलाने में भी रूचि ले?विचारों का गला घोंटकर कोई भी अखबार खबरों के दम पर कितने दिन टिका रह सकता है? खबरों का प्रवाह तो आज चारों तरफ से है ऐसे में पाठक सार्थक लेखन कहां पर खोजे?  आज भी सड़ी फिल्में लोग फोकट में भी देखना पसंद नहीं करते? जाहिर है कि ऐसी फिल्मों से किसी का मनोरंजन नहीं होता। अखबारों की भी यही हालत है विचारहीन और फोकटिए अखबार फोकट

लेखक अर्जुन राठौड़ पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


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