'' आप कस्‍बाई पत्रकारों का दर्द नहीं समझ सकते बग्‍गाजी''

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समाचार पत्रों याने छापा समाचार पत्रों के कर्मचारियों और पत्रकारों के वेतन आदि निर्धारण के संबंध में भारत सरकार ने न्यायमूर्ति जी. आर. मजीठिया को ''वेज बोर्ड''  नियुक्त किया था। इस ''वेज बोर्ड''  की सिफारिशें लंबे समय से सरकार के पास लंबित हैं और अभी तक न तो सरकार ने इनके क्रियान्वयन के लिये कोई पहल की है और न ही प्रिन्ट मीडिया के मालिकों ने। इसके विपरीत प्रिन्ट मीडिया के मालिकों ने ''मजीठिया वेज बोर्ड''  के खिलाफ अभियान शुरू किया है।

इसी संर्दभ में इण्डिया टुडे समूह के सीईओ आशीष बग्गा ने ''प्रिन्ट मीडिया को कैसें मारे''  शीर्षक से इण्डिया टुडे में मेहमान के पन्ने पर अपना लेख छापा है। उन्होंने जो तर्क दिये हैं उन पर क्रमश: विचार किया जाना चाहिए:-

01.वे लिखते हैं कि जब मीडिया अभूतपूर्व बदलाव का वाहक बना है तब भारत सरकार आजाद प्रिन्ट मीडिया को पंगु बना देने पर आमादा है। इससे बड़ा असत्य क्या हो सकता है। मीडिया व्यवस्था के मालिकों और पालकों के नियंत्रण में है अतः वह कोई बदलाव नही कर रहा है। '' वेज बोर्ड''  गैर संवैधानिक नहीं है अपितु संवैधानिक है। भारतीय संविधान ने समाजवाद के सिद्धांत को अंगीकार किया है। संविधान में मूल अधिकारों का अध्याय है जिसमें इन्सान को जिन्दा रहने का अधिकार दिया गया है।

आशीष बग्गा यह जानते ही होंगे कि जिन्दा रहने का अधिकार बगैर रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा, यातायात और बगैर मनोरंजन के संभव नहीं है। अच्छा होता कि आशीष बग्गा जी अपने वेतन का खुलासा करते। परन्तु इंण्डिया टुडे जैसे संपन्न और वैश्‍वीकरण के हितग्राही संस्थान के सीईओ का वेतन लाख रुपये प्रतिमाह से कम नहीं होगा। कार, बंगला आदि की सुविधायें अलग होंगी तथा प्रिन्ट मीडिया के जिन पत्रकारों के वेतन आदि के निर्धारण के लिये '' मजीठिया वेज बोर्ड''  बनाया गया था उनके वेतन और स्थिति को भी वे देखने का कष्ट करें।

समूचे देश्‍ा में कस्बाई स्तर तक के पत्रकारों याने संवाददाताओं को या तो वेतन मिलता ही नहीं है या टेलीफोन आदि के किए कुछ खर्च मिल जाते हैं। बहुत सारे अखबारों के कस्बाई हॉकर ही उनके संवाददाता या पत्रकार होते हैं। किन कठिनाईयों और जान जोखिम में डालकर कस्बाई पत्रकार काम करते है, इसकी कल्पना दिल्ली के वातानुकूलित मकान में रहकर बग्गा जी नहीं कर सकते। अगर दिल्ली या मेट्रो के पत्रकार के साथ कोई घटना घट जाती है तो समूचे देश में चर्चा होती है। मीडिया के प्रभाव में सरकारें भी उनकी मदद को आगे आती हैं। परन्तु कस्बाई पत्रकारों को पुलिस, माफिया, सामन्त और सरकार सभी के हमले झेलने होते हैं और इसके बावजूद भी अपवाद छोड़ दें तो वे ग्रामीण, कृषक और मजदूर समाज के पक्ष में लिखते हैं, वहॉं के समाचार लिखते हैं क्योंकि उनकी संवेदनशीलता मरी नहीं होती।

02.  बग्गा के अनुसार प्रिन्ट मीडिया के पत्रकारों, गैर पत्रकारों के वेतन के लाभों में 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी प्रस्तावित की गई है, परन्तु सौ फीसदी कहने में बड़ा लगता है, वस्तुतः वह दोगुना है। आज जब केन्द्र सरकार के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को न्यूनतम 30 हजार रुपये वेतन एंव भत्ता मिलता है,  तब मॅंहगाई के इस भयावह दौर में एक पत्रकार को अगर महीने का 15-20 हजार रुपया मिल भी जाये तो कोई बड़ी घटना नहीं है। वेतन समानता के सिद्धांत को श्री बग्गा न्यायपूर्ण मानते हैं परन्तु कहते हैं कि वह अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। उन्हें जानना चाहिए कि न्याय के सिद्धांत कभी अप्रासांगिक नहीं होते। समानता का अधिकार संवैधानिक अधिकार और समानता की आकांक्षा, संवैधानिक आकांक्षा है, जो समाज के लिये अपरिहार्य है। समानता की आकांक्षा कभी भी गैर जरूरी या अप्रासांगिक नहीं होती। श्री बग्गा की इस बात से मैं सहमत हूं कि टीवी, इण्टरनेट, डिजीटल मीडिया पर भी मजीठिया आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाना चाहिए या उनकी वेतन सुविधाओं को तार्किक और व्यावहारिक बनाने के लिये एक पृथक बोर्ड बनाना चाहिए।

03.  न्यूज प्रिन्ट के दाम बढ़े हैं यह सही है परन्तु यह भी सत्य है कि अधिकांश अखबार अपनी प्रसार संख्या को बहुत अधिक बताकर ज्यादा सरकारी कोटे का प्रिन्ट लेते हैं और ज्यादा प्रसार बताकर ज्यादा दरों पर विज्ञापन लेते है। यह प्रशासन और मीडिया का मिला जुला भ्रष्टाचार है जिसकी निष्पक्ष जॉंच कर कार्यवाही होना चाहिए। जहॉं तक श्री बग्गा का यह कहना है कि मींडिया अपने कर्मचारियों के वेतन और सहूलियतों पर 20 प्रतिशत खर्च करता है तो उन्हें यह भी जानना चाहिए कि मीडिया अब मुनाफा कमाने वाली संस्था है इसलिये कुल लाभ का 20 प्रतिशत व्यय कोई ज्यादा नहीं है। सरकार अपने कर्मचारियों के वेतन, पेंशन भत्ता और सुविधाओं पर 30 प्रतिशत से अधिक खर्च करती है, फिर जो मैंने उपर भी लिखा कि मेट्रो या महानगरों की पत्रकारिता एवं कस्बाई छोटे शहरों की पत्रकारिता में जमीन आसमान का अंतर है। एक कस्बे के 200 संवाददाताओं को नगरों के 50 संवाददाताओं और शहरों के 30 संवाददाताओं के कुल कितना वेतन मिलता है,  उनसे कई गुना वेतन इण्डिया टुडे के प्रधान संपादक पाते होंगे। श्री बग्गा जानते होंगे कि दिल्ली के कुछ बड़े पत्रकारों का पैकेज डेढ़ से दो करोड़ होता है याने महीने का 16 लाख रुपये।

04. मशीनीकरण के दौर ने और मीडिया में विदेशी पूंजी आने के बाद तथा तकनीक के नए नए प्रयोगों ने पत्रकार और गैर पत्रकार की संख्या बहुत कम कर दी है। अब एक पत्रकार टाईपिस्ट, कम्पोजीटर, पू्रफ रीडर, संवाददाता आदि सभी के काम करता है। अब वह समाचार को सीधे टाईप कर भेजता है। अधिकांश समाचार पत्रों में डिब्बों में पड़े टाईप या हाथ से लिखे समाचार तो अब संपादक व संवाददाता देखते भी नहीं हैं बल्कि उसे ई-मेल या सीडी से ले लेते है और तब मीडिया का बड़ा हिस्सा अखबार को खबर बनाता है तो खबर निकालने में कौन सा खर्च करना पड़ता है।

मजीठिया बोर्ड की सिफारिशें भी पत्रकारों और गैर पत्रकारों की आवश्‍यकता की तुलना में बहुत कम हैं। होना तो यह चाहिए कि '' वेज बोर्ड''  की सिफारिशें लागू की जायें और उनका संबंध मूल्य सूचकांक के साथ जोड़ा जाये, जो दिल्ली वाले पत्रकार हैं वे पत्रकार बिरादरी की बराबरी के लिये अपनी सुविधायें कम करें तथा अपने वेतन कम करें और कस्बा, नगर के पत्रकारों की सुविधायें व वेतन बढ़ाकर भाई चारा और समानता का व्यवहार करना चाहिए। बग्गा साहब कार में चलते होंगे और महानगर में व्यायाम के बाद की खुराक विशेषज्ञों ने 1500 कैलोरी की खुराक तय की होगी, परन्तु जो कस्बाई पत्रकार साईकिल पर चलते हैं, दिन भर पसीना बहाते है, उन्हे मजदूर के समान 2200  कैलोरी खुराक चाहिए। आशा है इस फर्क को श्री बग्गा और उन जैसे अन्य महानुभाव समझेंगे।

जरूरी यह भी है कि कस्बों और छोटे शहरों मे पत्रकार कालोनियॉं बनें,  जिनमें पत्रकार भवन भी हो। पत्रकारों का सामूहिक बीमा कराया जाये, जिसके प्रीमियम की राशि मालिक लोग जमा करें। जिस प्रकार दिल्ली में केन्द्र सरकार स्वास्थ्य सेवा (सीजीएचएस) का विस्तार पत्रकारों को दिया गया है,  उसी प्रकार राज्यों की राजधानियों, नगरों, कस्बों तक स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हो। एक अपेक्षा मैं पत्रकार मित्रों से भी करूंगा कि प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ताओं का शुल्क कम करें ताकि गरीब भी अपनी बात उनके माध्यम से समाज व सरकार तक पहुंचा सकें।

रघु ठाकुर

भोपाल

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Comments (6)Add Comment
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written by sudhir awasthi, July 03, 2011
raghu jee, aap ne ptrkarita ka drd kha dnyvad. sudhir awasthi hardoi (u.p.)
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written by sudhir awasthi, July 03, 2011
raghu jee, aap ne ptrkarita ka drd kha dnyvad. sudhir awasthi hardoi (u.p.)
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written by sudhir awasthi, July 03, 2011
raghu jee, aap ne ptrkarita ka drd kha dnyvad. sudhir awasthi hardoi (u.p.)
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written by nandkishor, July 01, 2011
तो किया शहरो के पत्रकारों को पत्रकारिता की सारी सुविधाएँ प्राप्त हो ही जाती है किन्तु ग्रामीण पत्रकार सवाददाता बन कर रह जाता है सारी कठनैयों के बात भी उसके हिस्से सिर्फ कस्ट ही आता है हमारा देश गाँवो का देश कहलाता है किन्तु पत्रकारिता गावो की नही शहरो की गुलाम ही दिखाती है शहरो में वातानुकूलित कमरों से गावो की पत्रकारिता दिखाई नहीं देती ग्रामीण सवाददाता प्रेस की बेगारी ही करते आ रहे है बगैर किसी लालच के इनके हिस्से आने वाला इनका अधिकार भी प्रेस के ही मालिक खाये जा रहे है paत्रकारो का शोसन पत्रकार लाबी ही कर रही है धन्यवाद जो अपने जागरूक इस समाज को जगाने की कोशिस कर एक प्रयास to kiya
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written by nandkishor, July 01, 2011
तो किया शहरो के पत्रकारों को पत्रकारिता की सारी सुविधाएँ प्राप्त हो ही जाती है किन्तु ग्रामीण पत्रकार सवाददाता बन कर रह जाता है सारी कठनैयों के बात भी उसके हिस्से सिर्फ कस्ट ही आता है हमारा देश गाँवो का देश कहलाता है किन्तु पत्रकारिता गावो की नही शहरो की गुलाम ही दिखाती है शहरो में वातानुकूलित कमरों से गावो की पत्रकारिता दिखाई नहीं देती ग्रामीण सवाददाता प्रेस की बेगारी ही करते आ रहे है बगैर किसी लालच के इनके हिस्से आने वाला इनका अधिकार भी प्रेस के ही मालिक खाये जा रहे है paत्रकारो का शोसन पत्रकार लाबी ही कर रही है धन्यवाद जो अपने जागरूक इस समाज को जगाने की कोशिस कर एक प्रयास to kiya
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written by akhand pratap, June 30, 2011
Raghu Ji Samajwadio ki us khep ke akhiri yoaddha hain jisne siddhanton se kabhi digna nahi seekha, jinka siwaye is mulk ke apna kehne ko kuchh nahin, jeevan yapan k mamle me sarvatha upekshit aur bebas patrakaron ke mudde per itni gaharai aur marak andaz me awaz uthane ke liye unka sadhuwad kia jana chahiye

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