वे कमेंट मारते हैं तो सोचती हूं कि उन्हें गालियां सुना दूं

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: शुरुआत के लिए हिम्मत ही काफी है : पिछले 5 सालों से मैं नोएडा शहर में रहती हूं। इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करती हूं... काम के सिलसिले में कई बार रात को 10 बजे के बाद भी मुझे अकेले घर जाना होता है, ऐसे में मुझे पूरी तरह सतर्क रहना पड़ता है कि मेरे आस पास के लोग जो मेरे साथ चल रहे हैं किस तरह का व्यवहार कर रहे हैं...

क्योंकि पता नहीं रहता कब कौन क्या करे, कभी कोई कमेंट मारता है तो कभी अश्लील शब्दों का प्रयोग, अक्सर अकेले होने की वजह से कुछ नहीं कह पाती ऐसे में लगता है जैसे किसी ने मेरे साथ जाने क्या कर दिया कई बार घुटन होती है, कि लोग ऐसा क्यों करते हैं, कई बार लगता है कि गालियां सुना दूं लेकिन अकेलपन और रात का सन्नाटा ऐसा करने की हिम्मत नहीं देता...मन मसोस कर रह जाना होता है, लेकिन वो पल झकझोर देते हैं अंदर तक...ऐसे में कभी सोचती हूं कि जिन बहनों के साथ बलात्कार जैसा कृत्य हुआ होता है वो किस तरह जी पाती होंगी, और वो बच्ची जिसने इस दंश को झेला है उसकी मनहस्थिती कैसी होती होगी...

एक बार पाकिस्तानी लेखक मंटो की एक कहानी पढ़ी थी "खोल दो" अगर आपने नहीं पढ़ी हो तो ज़रूर एक बार पढ़ियेगा हिला कर रख देगी अन्तरात्‍मा को आपकी...मैं सोचती हूं कि किसी के लिखे शब्द जब मानस पटल पर हमें झकझोरते हैं तो बलात्कार की शिकार हुई महिला, युवती या बच्ची का क्या होता होगा??? हर क्षण उस दंश के एहसास के साथ जीना और दोषी को खुले आम देखना कितना दर्द दायक होता होगा... दुर्भाग्य ये है कि जब घटना हमारे साथ घटती है हमें तभी एहसास होता है..  दूसरे का एहसास सिर्फ इतना है कि टीवी पर या अखबार में ऐसी ख़बरें देखकर शायद आपका उस चेनल पर रिमोर्ट थम जाये या अख़बार में इस तरह की ख़बर को देखकर आप थोड़ा अफ़सोस जता लें, लेकिन मुहीम कैसे छिड़ेगी बड़ा सवाल है?

2008 में गृह मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्ट में देश में बच्चों के साथ होने वाले बलात्कार के कुल 5,446 मामले दर्ज किये गये... ग़ौर कीजिएगा.. दर्ज किये गये... क्योंकि कितने होंगे ये तो शायद आप समझ ही सकते हैं क्योंकि सरकारी आंकड़ों के बारे में आप भी जानते हैं, और सरकार भी... हमारे देश का दुर्भाग्य ये है कि जिस चीज़ के साथ सरकारी शब्द जुड़ जाता है वहां से विश्वास उठ जाता है, अब इसके बारे में आपको ज़्यादा समझाने की ज़रूरत तो होगी नहीं मुझे क्योंकि ये कोई रॉकेट साइंस तो है नहीं...

कितनी ही बार बलात्कार के मामले में घर के लोग यानी अपने ही लोग शामिल होते हैं, ऐसे में मामले को या तो दबा दिया जाता है या फिर लड़की को घर परिवार की इज़्जत का वास्ता देकर चुप रहने के लिए बोल दिया जाता है... क्या होता होगा उस लड़की का... कहते हैं जहर से मरना इतना ख़तरनाक मौत नहीं जितना स्लो पॉइज़न यानी धीमे ज़हर से मरना ख़ौफनाक होता है, वो लड़की तो हर रोज़ स्लो पॉइज़न से मरती होगी न... अभी हाल ही की घटना लखीमपुर खीरी में 14 साल की सोनम के साथ जो हुआ वो कितना ख़ौफनाक था,  इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि बलात्कार के बाद उसकी लाश को पेड़ से लटका दिया गया और उसे आत्महत्या का नाम देने की भी कोशिश की गयी...

पहले उस बच्ची का मानसिक, शारिरिक और फिर आत्मिक तक बलात्कार किया गया और वो भी उन लोगों के द्वारा जिन्हें देश और समाज की सुरक्षा के लिए बैठाया गया था...  सोनम के ग़रीब मां बाप कितनी लड़ाई लड़ पायेंगे अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए, कुछ दिनों बाद बाकी पड़े बलात्कार के मामलों की तरह ये केस भी बंद हो जायेगा... लेकिन सवाल ये है कि हम कब तक सोये रहेंगे.?  उत्तर प्रदेश के ही कन्नौज ज़िले में भी एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार की कोशिश का मामला सामने आया,  जिसमें लड़की के विरोध करने पर बलात्कारियों ने उस लड़की की आंखों को चाकू से रौंदा... मानवता और मानवीय मूल्यों को ताक पर रखकर ऐसा करने वाले लोगों के ख़िलाफ क्या होता है हमारे समाज में, यहां तो न्याय व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह? मीडिया पर प्रश्नचिन्ह? सुरक्षा प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह? मानवता पर प्रश्नचिन्ह? मानव मूल्यों पर प्रश्न चिन्ह? यानी हर बात पर, हर व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगे हुए हैं... क्या हिम्मत है हम सब में इन सब प्रश्नचिन्हों को मिटाने की... एक बार इस बात पर बात पर प्रश्नचिन्ह? लगाकर देखिए भले ही इन्हें मिटा न पायें लेकिन मिटाने की हिम्मत तो आ ही जायेगी और शुरुआत के लिए हिम्मत ही काफी है....

लेखिका बबिता अस्‍थाना सीवीबी न्‍यूज में एसोसिएट प्रोड्यूसर कम एंकर के पद पर कार्यरत हैं.


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