प्रधानमंत्री और उनके मीडिया वाले ये पंच प्यारे

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शेषजीबहुत दिन बाद कुछ चुनिन्दा पत्रकारों से मुखातिब हुए मनमोहन सिंह ने अपनी बात बतायी. उनके मीडिया सलाहकार के पांच मित्र पत्रकारों के कान में उन्होंने कुछ बताया लेकिन जब देखा कि वहां से निकलकर वे संपादक लोग प्रेस कांफ्रेंस करने लगे हैं और प्रधानमंत्री की बात पर अपनी व्याख्या कर रहे हैं तो हड़बड़ी में करीब नौ घंटे बाद प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट पर सरकारी पक्ष भी रख दिया गया.

उनके दफतर वालों की मेहनत से जारी की गयी ट्रान्सक्रिप्ट पर नज़र डालें तो साफ़ लगता है कि दिल्ली के सत्ता के गलियारों में तैर रही बहुत सारी कहानियों को खारिज करने के लिए प्रधानमंत्री ने इन पंच प्यारों को तलब किया था. उन्होंने एक बार फिर ऐलान किया कि वे कठपुतली प्रधानमंत्री नहीं हैं. राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने के अभियान को भी उन्होंने अपने तरीके से हैंडिल करने की कोशिश की. कांग्रेस के एक वर्ग की तरफ से चल रहे उस अभियान को भी उन्होंने दफन करने की कोशिश की जिसके तहत दिल्ली में यह कानाफूसी चल रही है कि सारे भ्रष्टाचार की जड़ में प्रधानमंत्री ही हैं. देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि अपने आप को बचाने के लिए ही वे प्रधानमंत्री पद को लोकपाल के घेरे में नहीं आने देना चाहते. लेकिन डॉ. मनमोहन सिंह ने बहुत ही बारीकी से यह बात स्पष्ट कर दी कि दरअसल कांग्रेस का वह वर्ग प्रधानमंत्री को लोकपाल से बाहर रखने के चक्कर में है जो भावी प्रधानमंत्री की टोली में है.

जहां तक उनका सवाल है, वे तो प्रधानमंत्री को लोकपाल की जांच में लाना चाहते हैं. राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनवाने की कोशिश में लगे नेताओं को उनके इस बयान का असर कम करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ेगी. संपादकों से प्रधानमंत्री के संवाद की यह वे बातें हैं जो आम तौर पर सबकी समझ में आयीं और टेलीविज़न में काम करने वाले कुछ अफसर पत्रकारों ने इसे टीवी के ज़रिये पूरी दुनिया को बताया और सर्वज्ञ की मुद्रा में बहसों को संचालित किया. दिल्ली शहर में बुधवार को कई ऐसे पत्रकारों के दर्शन हुए जो कई वर्षों से प्रधानमंत्री और उनके मीडिया सलाहकार के ख़ास सहयोगी माने जाते थे,  लेकिन संवाद में नहीं बुलाये गए. उनके चहरे लटके हुए थे. जो लोग नहीं बुलाये गए थे उन्होंने अपने अपने चैनलों पर बाकायदा प्रचारित करवाया कि प्रधानमंत्री अपनी कोशिश में फेल हो गए हैं. इन बातों का कोई मतलब नहीं है, दिल्ली में यह हमेशा से ही होता रहा है.

ज़्यादातर प्रधानमंत्री इन्हीं मुद्दों में घिरकर अपने आपको समाप्त करते रहे हैं. केवल जवाहरलाल नेहरू ऐसे व्यक्ति थे जिनको हल्की बातों में कभी नहीं घेरा जा सका. प्रधानमंत्री ने आरएसएस और बीजेपी की अगुवाई में शुरू किये गए उस अभियान को पकड़ने की कोशिश की जिसके बल पर हर बार आरएसएस ने देश की जनता को अपनी राजनीति का हिस्सा बनाने में सफलता पायी है. उन्होंने संसद, सीएजी और मीडिया से अपील की उनकी सरकार को सबसे भ्रष्ट सरकार साबित करने की आरएसएस की कोशिश का हिस्सा न बनें और पूरी दुनिया के माहौल को नज़र में रख कर फैसले करें. उन्होंने कहा कि निहित स्वार्थ के लोग उनकी सरकार को लुंजपुंज सरकार साबित करने की फ़िराक़ में हैं और मीडिया उनको हवा दे रहा है. उन्होंने मीडिया से अपील की कृपया सच्चाई की परख के बाद ही अपनी ताक़त का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ करें.

भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने की आरएसएस और बीजेपी की कोशिश को पकड़कर प्रधानमंत्री ने निश्चित रूप से दक्षिणपंथी राजनीति को अर्दब में लेने की कोशिश की है. यह बात स्पष्ट कर देने की ज़रुरत है कि १९६७ से लेकर अबतक लगभग सभी सरकारें भ्रष्ट रही हैं. उन पर विस्तार से चर्चा करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि सब को मालूम है कि टाप पर फैले भ्रष्टाचार का शिकार हर हाल में गरीब आदमी ही होता है और उसे मालूम है कि सरकार भ्रष्ट है. लेकिन भारत के समकालीन इतिहास में तीन बार केंद्रीय सरकार को भ्रष्ट साबित करके आरएसएस ने अपने आपको मज़बूत किया है. यह अलग बात है कि २००४ के चुनावों में कांग्रेस ने भी बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार को महाभ्रष्ट साबित करके एनडीए की सरकार को पैदल किया था. लेकिन केंद्र की कांग्रेस सरकार को भ्रष्ट साबित करने की कोशिश के बाद हमेशा ही आरएसएस के हाथ सत्ता लगती रही है. इस विषय पर थोड़े विस्तार से चर्चा कर लेने से तस्वीर साफ़ होने में मदद मिलेगी.

१९७४ में जब जयप्रकाश नारायण का आन्दोलन शुरू हुआ तो उसमें बहुत कम संख्या में लोग शामिल थे लेकिन जब केएन गोविन्दाचार्य ने पटना में उनसे मुलाकात की और आरएसएस को उनके पीछे लगा दिया तो बात बदल गयी. राजनीति की सीमित समझ रखने वाली इंदिरा गाँधी ने थोक में गलतियाँ कीं और १९७७ में आरएसएस के सहयोग से केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बन गयी. महात्मा गाँधी की हत्या के आरोपों की काली छाया में जी रहे संगठन को जीवनदायिनी ऊर्जा मिल गयी. आरएसएस की ओर से बीजेपी में सक्रिय उस वक़्त के सबसे बड़े नेता नानाजी देशमुख ने खुद तो मंत्री पद नहीं स्वीकार किया लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को कैबिनेट में अहम विभाग दिलवा दिया. जनता पार्टी की सरकार में आरएसएस के कई बड़े कार्यकर्ता बहुत ही ताक़तवर पदों पर पंहुच गए. बाद में समाजवादी चिन्तक और जनता पार्टी के नेता मधु लिमये ने इन लोगों को काबू में करने की कोशिश की लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. आरएसएस वालों ने जनता पार्टी को तोड़ दिया और बीजेपी की स्थापना कर दी. लेकिन आरएसएस के नियंत्रण में एक बड़ी राजनीतिक पार्टी आ चुकी थी.

आज के बीजेपी के सभी बड़े नेता उसी दौर में राजनीति में आये थे और आज उनके सामने ज़्यादातर पार्टियों के नेता बौने नज़र आते हैं. राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, नरेंद्र मोदी, सुशील कुमार मोदी सब उसी दौर के युवक नेता हैं. दिलचस्प बात यह है कि केवल राजनीतिक लाभ के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाया गया था क्योंकि सत्ता में आने के बाद जनता पार्टी की सरकार अपनी पूर्ववर्ती कांग्रेस से भी ज्यादा भ्रष्ट साबित हुई. दूसरी बार भ्रष्टाचार के खिलाफ जब आरएसएस ने अभियान चलाया तो मस्कट के रूप में राजीव गाँधी के वित्तमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को आगे किया गया. राजीव गाँधी की टीम में राजनीतिक रूप से निरक्षर लोगों का भारी जमावड़ा था. उन लोगों ने भी भ्रष्टाचार के मुद्दे को ठीक से नहीं संभाला और वीपी सिंह की कठपुतली सरकार बना दी गयी. उस सरकार का कंट्रोल पूरी तरह से आरएसएस के हाथ में था और बाबरी मस्जिद के मुद्दे को हवा देने के लिए जितना योगदान वीपी सिंह ने किया,  उतना किसी ने नहीं किया. वीपी सिंह के अन्तःपुर में सक्रिय सभी बड़े नेता बाद में बीजेपी के नेता बन गए. अरुण नेहरू, आरिफ मुहम्मद खान और सतपाल मलिक का नाम प्रमुखता से वीपी सिंह के सलाहकारों में था. बाद में सभी बीजेपी में शामिल हो गए.बाबरी मस्जिद के मुद्दे को पूरी तरह से गरमाने के बाद भ्रष्टाचार और बोफर्स को भूल कर आरएसएस ने केंद्र में सत्ता स्थापित करने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया था.

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश को लामबंद करके सत्ता हासिल करने के नुस्खे को आरएसएस ने बार बार आजमाया है. यह भी पक्की बात है कि उसके बाद सत्ता भी मिलती है. लेकिन इस बार लगता है कि मनमोहन सिंह उनकी इस योजना की हवा निकालने का मन बना चुके हैं. आरएसएस ने पहले तो अन्ना हजारे को आगे करने की कोशिश की लेकिन सोनिया गाँधी ने उनको अपना बना लिया. बीजेपी के नेता बहुत निराश हो गए. अन्ना हजारे का इस्तेमाल मनमोहन सिंह के खिलाफ तो हो रहा है लेकिन वे बीजेपी के राजसूय यज्ञ का हिस्सा बनने को तैयार नहीं हैं. इस खेल के फेल होने पर बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने योग के टीचर रामदेव को आगे किया लेकिन भ्रष्टाचार की हर विधा में गले तक डूबे रामदेव अब उनकी जान की मुसीबत बने हुए हैं.

इन सारे नहलों पर बुधवार को चुनिन्दा और वफादार संपादकों को बुलाकर प्रधान मंत्री ने भारी दहला मारा और साफ़ संकेत दे दिया कि भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की मंशा को वे उजागर कर देंगे. ज़ाहिर है इस संकेत में यह भी निहित है कि वे पब्लिक डोमेन यह सूचना भी डाल देने वाले हैं कि भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर आरएसएस अपनी साम्प्रदायिक राजनीति को चमकाने के फ़िराक़ में है. जानकार समझ गए हैं कि प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार को निहित स्वार्थों का एजेंडा साबित करने की कोशिश करके अपनी पार्टी के उन लोगों को भी धमकाने की कोशिश की है जो उनको राहुल गाँधी का नाम लेकर डराते रहते हैं. जहां तक बीजेपी का सवाल है उनको तो सौ फीसदी घेरे में लेने की योजना साफ़ नज़र आ रही है. जो भी हो अगले कुछ महीने साम्प्रदायिक राजनीति के विमर्श में इस्तेमाल होने वाले हैं. अगर प्रधानमंत्री ने देश की सेकुलर जमातों को अपना मकसद समझाने में सफलता हासिल कर ली तो एक बार बीजेपी फिर बैकफुट पर आ जायेगी.

लेखक शेष नारायण सिंह जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं.


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Comments (8)Add Comment
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written by Yogendra Singh jadaun, July 05, 2011
आप काँग्रेस के एक वफादा 5 वेँ एजेँट हैँ आपने उन चारोँ के नाम नही बताये? शायद आप भूल मेँ हैँ कि R S S का नाम लेने से लोग भ्रष्टाचार व कालेधन का
मु द् दा भूल जायेँगे और
देश की जनता फिर वेवकूफ
बन जायेगी इन मुद्दोँ से ध्यान हटाने के लिए कश्मीर,आतंकवाद,नक्स
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written by adarsh prakash singh, July 04, 2011
jugad ka jamana hai bhai. jisne congress ko sadh liya vaha pmo tak chala gaya. chaploosi ka inam to milta hi hai- adarsh prakash singh
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written by BIJAY SINGH, July 03, 2011
ye gine hue log na to media /press ke representative hain aur na hi inke chalte hi baki patrakar hain.
PM ne sirf panch ko hi kyon bulaya,dar tha kahin sahi sawal koyi na pooch de.
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written by सत्यप्रकाश "आजाद", July 03, 2011
शेष जी, आपसे ऐसी अपेक्षा नहीं थी...कौन किसको आगे कर रहा है, कौन पीछे, ये बात बेमानी है...असल बात ये देखने की है कि इससे देश को कितना फायदा है या नुकसान.
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written by Ritesh, July 02, 2011
Poora one-sided article hai. RSS ne tiya-paancha kiya hoga JP aur VP ke saath, lekin 2G scam, CWG scam, BRT scam, Bofors scam, etc. etc. kisne kiya? Yeh kahna ki 1967 ke baad se desh me saari kendriya sarkaren bhrasht thi, galat hai. Pandit Nehru ke zamaane me Mundhra scam, Krishna Menon jeep scam bhool gaye hain kya? Nehru ne vitt mantralaya se kaha tha Dharam Teja ko kuch paise de do, aur LIC ne us zamaane men 50 crore rupaye loan de diye jo doob gaya. Badle me Dharam Teja saab London me Rajiv, Sanjay ki 'padhai' ka kharcha sambhal rahe the. Ye main nahin, Nehruji ke PA Mathai ki pustak aur Menaka Gandhi dwara jaari Rajiv ke haath ki likhi chitthi bata rahi hai. RSS communal hai lekin Congressi aur Nehru Gandhi parivaar doodh ke dhule nahin hain. Singh saab, kripaya itihas tod-marod kar na pesh karen.
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written by Anil Pande, July 01, 2011
PM KE PANCH PYARON KI Kartuten

have you seen the body language of Alok Mehta and Kumar Katkar outside the PM house also on the TV screens yesterday?

Loksatta Editor Kumar Ketkar,who was facing multiple court cases for malicious reporting and for making false allegations was expelled out of Loksatta by Express Group in March this year. Why PMO overlooked these charges?

Do you want us to narrate the story, how Alok Mehta managed the Padam Shree award? And how he is doing his best to facilitate Rajya Sabha seat for Chhajlani.

Anyway, besides Lokpal, the entire nation wanted to know common man answer on price rise, crime, corruption, food and social security etc.

Five or 500, hardly matters, but one should not show off that they are something special among journalist community.

And why only TV and Print Editors? What about Web Media and Radio Editors?
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written by vijay singh, July 01, 2011
sir, bahut satik tippadi hai,,,acha laga...vijay singh
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written by d singh, July 01, 2011
मैं लोकपाल हूँ
इन नेताओ से परेषान हूँ
रोज ये चर्चा करते कितना पैसा खर्चा करते है
मेरे बनने या बिगड़ जाने से क्या फर्क पड़ता है
जब इस देष का आदमी आज भी भूख से मरता है
लोकपाल तो लोकपाल है
आम आदमी भी हैरान है
क्या इसमें खास बात है
क्या ये हर मर्ज का इलाज है
पुदीन हरा है या झंडू बाम है
रामदेव से लेकर अन्ना तक परेषान है
सोनिया को लेकर सुशमा हैरान है
आखिर ये लोकत्रंत का कौन सा मजाक है
कि अनषन करने पर जूता लात
और घोटाले बाजो का पूरा सम्मान
अगर यही है भारत और यही स्वराज
तो लूटलो पूरा हिन्दुस्तान
जय सरकार जय सरकार
मै लोकपाल हूँ
नेताओ के लिए बवाल हूँ
जनता के लिए रामवाण हूँ
जल्द ही इन गददारो की खीचने वाला खाल हूँ
हकीकत में मेैं जन लोकपाल हूँ
मैं लोकपाल हूँ मै लोकपाल हूँ

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