लोकतंत्र का डॉक्टर

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दिनेश चौधरी डॉ. रमांकात दानी -जैसा कि नाम से जाहिर भी हो रहा है- पेशे से चिकित्सक हैं। रोज अनेक लोगों का इलाज करते हैं और अब तक कितनों का किया है कोई हिसाब नहीं है। इनमें से कुछ को असाध्य मानी जानी वाली बीमारियां थीं, पर धुन के पक्के डॉक्टर दानी ने अड़ियल बीमारियों को भी चलता कर दिया। मगर एक मरीज ऐसा है, जो ठीक होने का नाम ही नहीं लेता। इसकी नब्ज कई दिनों से ठीक नहीं चल रही है।

डॉ. साहब ठोक-बजाकर उसे रास्ते में लाने जितनी कोशिश करते हैं, उनका यह मरीज कमबख्त अपने मर्ज के साथ उतना ही फैलता जाता है। इस जिद्‌दी मरीज का नाम भारत का लोकतंत्र है और पुणे में राजनीति की शिक्षा देने वाली अपने किस्म की इकलौती संस्था से संबद्ध मित्र संकल्प सिंघई  डॉ. दानी को 'लोकतंत्र का डॉक्टर' कहते हैं। मैं डॉ. दानी को चुनाव सुधारों का मदनलाल धरतीपकड़ कहता हूं। 'एकला चलो रे' की तर्ज पर उन्हें बरसों से आंदोलन करते हुए देख रहा हूं। उनमें गजब का धैर्य है। कोई आये या न आये, कोई साथ चले या न चले, कोई तवज्जो दे या न दे, अपने पेशे से समय निकालकर वे पूरे उत्साह के साथ अपने आंदोलन में लगे रहते हैं। अभी पिछले दिनों गृहमंत्री चिदंबरम के खिलाफ वॉल-राइटिंग में लगे थे। कूटनीतिक प्रयासों के तहत उन्होंने अपने अभियान में बाबा रामदेव के शिष्यों को भी शामिल कर लिया-यह कहते हुए कि इसी आदमी के चलते दिल्ली की पुलिस ने तुम्हारे स्वामी पर लाठियां भांज दी थीं। वे कहते हैं कि चिदंबरम के फर्जी तरीके से चुनाव जीतने का जयललिता का आरोप सही है और चुनाव आयोग की भूमिका इस मामले में पूरी तरह से संदिग्ध है। वे चुनाव आयोग को लोकतंत्र का रसोइया कहते हैं, जो जानबूझकर घटिया खाना खिलाकर इसकी सेहत बिगाड़ रहा है।

डॉ. साहब के पास एक मारुति वैन है जो दरअसल लोकतंत्र के इलाज के लिये बनायी गयी एंबुलैंस है। इसके शीशों में चुनाव सुधारों से संबंधित स्लोगन लिखे हुए होते हैं। 'एंबुलैंस' में पीछे की ओर एक अटैची होती है, जिसमें किसिम-किसिम के पोस्टर, पर्चे, बैनर, अखबार की कतरनें और चुनाव-सुधारों से संबंधित अन्य दस्तावेज होते हैं। लेकिन डॉ. दानी उन बुद्धिजीवियों की मानिन्द नहीं हैं तो महज अखबारों और रिसालों में बयान देते रहते हैं। महज चुनाव प्रक्रिया की खामियों को जानने व सुधारने के लिये वे बाकायदा चुनाव भी लड़ चुके हैं। उनके गले में स्टेथेस्कोप हो या न हो, उनकी जेब में चुनाव आयोग विरोधी कागजातों का जखीरा होता है और इन सब के साथ अपने तेवरों से वे मुझे एक ऐसे फिदाइन लगते हैं, जो किसी भी वक्त चुनाव आयोग पर ''आत्मघाती हमला'' कर सकते हैं।

दानीजी

इतने सालों से वोट देते हुए क्या आपको पता है कि आप किसी प्रत्याशी को नकार सकते हैं? अगर आपको नहीं मालूम तो कोई बात नहीं, क्योंकि डॉ. साहब की राय में यह चुनाव आयोग की नालायकी है, जो देश की जनता के प्रति नहीं बल्कि अपने नियोक्ता के प्रति वफादारी दिखाता है लोगों से महत्वपूर्ण चीजों को छुपाता है या फिर जान-बूझकर उनका प्रचार नहीं करता। डॉ. साहब के अनुसार आज भी आप चाहें तो किसी प्रत्याशी को नकार सकते हैं लेकिन आपकी पहचान गुप्त नहीं रहने वाली है। वे कहते हैं कि इस तरह के प्रावधान जान-बूझकर बनाये गयें हैं ताकि आप प्रत्याशियों के आंखों की किरकिरी बन जायें और वे आपको इस तरह से सबक सिखायें कि आप दोबारा ऐसा करने का साहस न कर पायें।

डॉ. दानी के अनुसार चुनाव संचालन संहिता 1961 की धारा 49 (0) के तहत आप चाहें तो 'नो वोट' के अपने अधिकार का उपयोग कर सकते हैं। यह बात चूंकि लोगों की जानकारी में बहुत आम नहीं है, इसलिये उन्होंने अपनी 'एंबुलैंस' के शीशों पर पूरी प्रक्रिया का वर्णन लिख रखा है। उनके अनुसार यदि आप किसी भी प्रत्याशी को अपनी आकांक्षा के अनुरुप नहीं पाते हैं तो चुनाव बूथ में जाकर अपना पहचान पत्र दिखायें और हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान के साथ नाखून पर अमिट स्याही लगवायें। बूथ अधिकारी को 'नो वोट' के अपने इरादे के बारे में बतायें। बूथ अधिकारी चुनाव आयोग द्वारा दिये गये एक विशेष रजिस्टर में आपके व अपने हस्ताक्षर के साथ 'नो वोट' का अनुमोदन करने के लिये बाध्य होगा और यदि 'नो वोट' की संखया सबसे ज्यादा हो गयी तो सारे प्रत्याशी अयोग्य साबित हो जायेंगे।

दानीजी

डॉ. दानी कहते हैं कि "नो वोट" की यह प्रक्रिया भी मतदान की तरह गुप्त होनी चाहिये व ईवीएम मशीन में "इनमें से कोई नहीं" का विकल्प होना चाहिये। फिर देखिये कि अन्ना हजारे व उनके साथियों को अपनी पसंद का लोकपाल बनाने के लिये चुनाव जीतकर आने का पाठ पढ़ाने वाले कांग्रेसियों का क्या हश्र होता है? इन पंक्तियों को पढ़ते हुए क्या आपको रोमांच का अनुभव नहीं हो रहा है? लोकतंत्र की सेहत को सुधारने के लिये डॉ. साहब के पास और भी बहुत सारे नुस्खें हैं पर वे भीड़ तंत्र के आगे बेबस हैं। उनके आंदोलन को आपके सहयोग की सख्त जरूरत है, क्‍योंकि आखिरकार यह लोकतंत्र की सेहत ही नहीं बल्कि उसकी आबरू का सवाल है।

लेखक दिनेश चौधरी पत्रकार, रंगकर्मी और सोशल एक्टिविस्ट हैं. सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद भिलाई में एक बार फिर नाटक से लेकर पत्रकारिता तक की दुनिया में सक्रिय हैं. वे इप्‍टा, डोगरगढ़ के अध्‍यक्ष भी हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it   के जरिए किया जा सकता है.


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