झूठे नाम से कमेंट लिखने वाले राघव, दम हो तो सामने आओ

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यशवंत जी, 'भास्कर का यह संपादक चापलूसों व चाटूकारों का पोषक है' शीर्षक से मेरे द्वारा लिखे गए आलेख पर मुझसे जुड़ी दो टिप्पणियां प्रकाशित हुई है। मैं इस पर अपना पक्ष भी रखने के साथ ही यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि मेरे 21 साल के पत्रकारिता जीवन से जुड़े किसी भी मुद्दे पर कोई साथी चाहे तो मुझसे खुली बहस कर सकता है।अवनीश जैन के खिलाफ जो आरोप मैंने लगाए हैं उन पर मैं आज भी कायम हूं, इन्हें साबित करने का माद्दा रखता हूं और झूठे नामों से जो लोग सामने आ रहे हैं उनकी भी हकीकत जानता हूं। कृपया मेरे कमेंट को प्रकाशित करने का कष्ट करें।

झूठे नाम से खिलने वाले नामर्द राघव, दम हो तो तथ्यों के साथ सामने आओ, नाम से लिखो और यदि मेरे कारण तुम्‍हारी कोई इच्छा पूरी नहीं हो पायी हो तो ऐसा बताओ..थोड़ा साहस दिखाओ मेरे भाई..अब सुनो मेरी बात.

1. यदि भास्कर प्रबंधन मुझे पसंद नहीं करता था तो फिर मार्च 2005 में मुझे विशेष संवाददाता के रूप में फिर से भास्कर में क्यों लाया गया। क्या मुझे यह दायित्व सौंपने का फैसला सुधीरजी की सहमति के बिना संभव था। कल्पेशजी मेरे गुरू थे, हैं और रहेंगे। तुम जैसे लोग भले ही कुछ भी सोचते रहो।

2.  यदि में इतना ही भ्रष्ट हूं तो फिर मुझे पिछले 19 साल से प्राइम बीट्स पर काम करने का मौका क्यों मिलता रहा? क्राइम, प्रशासन, नगर निगम, आईडीए, कांग्रेस-भाजपा जैसी बीट्स पर जितने समय मैंने काम किया उतना किसी और ने नहीं.. कोई एक आरोप नहीं है मेरे खिलाफ एस.आर.सिंह, श्रवण गर्ग, राजकुमार केसवानी तथा कल्पेश याज्ञनिक जैसे संपादकों ने भ्रष्ट होने के बावजूद मुझे हमेशा महत्वपूर्ण जिम्‍मेदारी क्यों सौंपी? क्या इन संपादकों ने यह जानते हुए भी मुझे काम करने का पूरा मौका दिया कि मैं भ्रष्ट हूं?

3.  जिस समय में फ्री प्रेस में रिपोर्टर था तब भी मेरे पास गाड़ी थी और आज भी है। मेरे अनुज सिविल इंजीनियर हैं, उनकी पत्नी प्रोफेसर हैं, बहन राज्य पुलिस सेवा की अधिकारी है और पिता सेवानिवृत आईएएस। परिवार में तीन गाडियां है और ड्राइवर भी हैं। संयुक्त परिवार के सदस्य के नाते मुझे परिवार में मौजूद सुविधाओं को उपयोग का पूरा अधिकार है और मैंने किया भी है? मेरे परिवार की स्थिति इंदौर शहर में किसी से छुपी हुई नहीं है।

4. मैं इस शहर में 25 साल से रह रहा हूं और 22 साल से पत्रकारिता कर रहा हूं। निसंदेह मेरे अफसरों व नेताओं से संबंध है। यह सूची बहुत लंबी है पर मुझे इस बात का भी गर्व है कि शहर में अफसरों व नेताओं के खिलाफ सबसे दमखम से जिन लोगों की कलम चली है उनमें से मैं भी एक हूं? नेताओं व अफसरों के खिलाफ मेरी खबरों की फेहरिश्त लंबी है और जिन लोगों के खिलाफ मैंने लिखा,  उनके यदि आज भी मेरे साथ संबंध मधुर है तो इसका एकमात्र कारण यह है कि मैंने कभी खबरों को बेजा फायदा नहीं उठाया,  जो सही था वही लिखा और जो लिखा उसे साबित भी किया।

5. जिस दौर में मैं भास्कर में समाचार संपादक बना था उस दौर में वहां समाचार संपादक की हैसियत बड़े बाबू से ज्यादा नहीं थी। तब यह पद सजावट के समान जैसा था। हकीकत जानते ही मैंने श्रवण गर्ग द्वारा परोसी गई थाली राजेंद्र तिवारी को यह कहते हुए लौटा दी थी कि केवल कागज भरने और कुर्सी तोडऩे वाला यह काम मुझसे नहीं होगा। तब रुमनी घोष तो बहुत बाद में समचार संपादक बनी, अभी 7-8 महीने पहले।

6. अवनीश से मेरा कोई पूर्वाग्रह नहीं था। वह और मैं लगभग साथ साथ ही पत्रकारिता में आए। उसके इंदौर भास्कर के संपादक बनने के तीन महीने पहले मैं ही वह शख्‍स था जिसने उससे कहा था कि वह कब संपादक का दायित्व संभाल रहा है। जब वह संपादक बना तो उसने खुद मुझसे फोन करके कहा था कि मैं अपने सफल कार्यकाल के लिए आपकी, विनोद पुरोहित, आदिल कुरैशी तथा रूमनी घोष की मदद चाहता हूं। मैंने भी उन्हें पूरी मदद का आश्वासन दिया,  लेकिन बाद में जिस शैली में वह काम करने लगा उसमें मुझे लगा कि हम दोनों का साथ ज्यादा लंबा नहीं चल पाएगा। वह संपादक मानने लायक शख्‍स ही नहीं था और मैंने उसे बाद में कभी संपादक माना भी नहीं।

7.  मैने भास्कर से भास्कर टीवी में बदलाव प्रबंधन के प्रस्ताव पर लिया था। इसके पीछे मेरा मकसद अवनीश के छिछोरेपन से मुक्ति पाना था। मुझे यह डर कतई नहीं था की मुझे वहां से निकाल दिया जाएगा? अवनीश में इतनी ताकत भी नहीं थी क्योंकि मेरे खिलाफ उसके पास कोई मुद्दा नहीं था। यह शख्‍स अपनी गलतियों के कारण संस्थान के अंदर कितना कमजोर था इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल भर तक विजय पाठक जैसा आदमी इससे भिड़ता रहा, इसके खिलाफ बोलता रहा, भोपाल में देशभर के संपादकों के सामने इसे बेनकाब किया तो यह उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया।

8. मेरे भाई यदि मेरा चाल चरित्र और चेहरा इतना ही खराब होता तो आज मुझे अपने साथियों के बीच इतना सम्‍मान हासिल नहीं होता। जिससे मैंने पत्रकारिता सीखी, जिनके साथ काम किया और जिन्हें सिखाया आज भी वे मुझे उतना ही प्यार और सम्‍मान देते हैं। लीडर शब्द उन्हीं का दिया हुआ है। मुझे लोगों की दुआ ही मिली है बद्दुआ नहीं और यही कारण है कि मुझे जीवन में कभी पीछे मुडकर देखने का मौका नहीं आया। राघव, तुम्‍हे फिर निराशा होने वाली है.. जल्दी ही में एक नई खबर सुनाने जा रहा हूं..इंतजार करो।

अरविंद तिवारी

पूर्व पत्रकार

दैनिक भास्‍कर, इंदौर

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