यह किस किस्म की बहस है हुजूर!

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आनंद सिंह खबरिया चैनलों पर बहस देखना मेरा पसंदीदा शौक रहा है। इसे और हवा दी है एनडीटीवी इंडिया के प्राइम टाइम ने। यह 9 से 10 बजे (रात) में शायद सातों दिन आता है। मैं प्राइम टाइम डिबेट इसलिए देखता हूं क्योंकि प्रायः रोज ही मेरे पसंदीदा एंकर्स इसमें जुड़ते हैं। चाहे वो निधि कुलपति हों, रवीश या फिर अभिज्ञान प्रकाश। ये लोग बहस को एक दिशा देने वाले एंकर हैं। आप कड़े शब्द बोल कर इन्हें डायवर्ट नहीं कर सकते।

लेकिन, मारन के इस्तीफे वाले दिन यह डिवेट कसैला हो गया। एक बड़े मीडिया समूह के मालिक विनोद शर्मा और कामरेड अतुल कुमार अंजान के बीच जो तीखी झड़प हुयी वह निंदा के भी काबिल नहीं है। दोनों ने छिछले शब्दों का इस्तेमाल किया। विनोद शर्मा जिस तरीके से अतुल कुमार अंजान को शब्दों के माध्यम से लतिया रहे थे, उससे मुझे अचरज हुआ। अचरज इस नाते कि एक मीडिया ग्रुप का चेयरपर्सन इस तरह की बातें बोल कैसे सकता है। और, मुझे याद है कि तीन मिनट के अंदर अभिज्ञान प्रकाश को दो ब्रेक लेने पड़े थे..जबरिया के।

मैं एनडीटीवी का पुराना दर्शक हूं। रवीश, अभिज्ञान, निधि, विनोद दुआ, मनोरंजन भारती जैसे वरीय पत्रकारों का सम्मान करता हूं। उस नाते ही मेरी यह हार्दिक तमन्ना है कि कम से कम एनडीटीवी को तो आज तक या फिर जी न्यूज न बनाएं। एनडीटीवी पर इस किस्म की बहसों की कोई गुंजाइश न हो, यह मेरी कामना है। इस लेख को मैं आदरणीय प्रणब राय के मेल पर भी डाल रहा हूं। आगे जो उनकी इच्छा।

दरअसल, ताजातरीन इश्युज पर डिबेट करना और करवाना बेहद अच्छी परंपरा है। दूरदर्शन के जमाने में भी इस किस्म के डिबेट होते थे। डिबेट का अपना एक स्टैंडर्ड होता था। सवाल पूछने वाला भी सलीका जानता था, जवाब देने वाले को भी यह पता होता था कि देश की अवाम उसे बेहद गौर से सुन रही है। तब भी काल्पनिक सवाल होते थे पर उसमें भी एक लज्जत होती थी। यानी, तब के डिबेट हमारा ज्ञान-कौशल बढ़ाते थे। अब वो बात नहीं रही। यह तो गनीमत है कि डिबेट जिनके बीच हो रहा होता है, वे एक-दूजे को गरियाते नहीं पर उनकी भाव-भंगिमाएं सब कुछ व्यक्त कर देती हैं।

डिबेट किसी भी स्वस्थ समाज के लिए जरूरी है। पढ़ाई से लेकर देश की हालत तक इसकी जरूरत महसूस की जाती है। आपको आइएस बनना है तो भी डिबेट की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, बेशक इसका फार्मेट थोड़ा सा बदल गया है। इसकी जरूरत पर शायद ही कोई बुद्धिजीवी इनकार करेगा। पर, यह भी देखना होगा कि डिवेट किनके बीच हो रही है और किस दिशा में जा रही है। मारन वाले प्रसंग में अतुल कुमार अंजान ने बेशक चुभती हुई भाषा का इस्तेमाल किया था (और मैं मानता हूं कि अतुल इससे बच सकते थे) लेकिन शर्मा जी ने पहले तो उनके वामपंथी होने पर सवाल खड़ा किया, फिर जिस भाव-भंगिमा के साथ उन्होंने जवाब दिया वह मूड खराब करने के लिए पर्याप्त था।

निदान-पार्टी विशेष के लोग अक्सर चर्चा में आने के लिए उल-जुलूल बयान देते हैं, शोशा छोड़ने के लिए जानवरों सरीखा चेहरा भी बनाते हैं। इससे हमारा पूरा समाज सफर करता है। हम लोग जिन्हें वोट देकर दिल्ली पहुंचाते हैं उससे एक आदर्श व्यवहार की उम्मीद तो कर ही सकते हैं। टीवी चैनल वाले प्रसिद्ध चेहरों के मुंह से कैशिंग बाइट्स (जिससे उनका चैनल चर्चा में बना रहे) हर संभव जतन करते हैं। क्या यह उचित है। कम-अज-कम जब आप देश के सामने एक प्रमुख मसले पर डिबेट कर रहे हों। मुझे लगता है कि बहस में आमंत्रित सभी मेहमानों से इन बिंदुओं पर सहमति लेनी चाहिए...

1.    कोई भी पक्ष गाली नहीं बकेगा, उल-जुलूल टिप्पणी नहीं करेगा

2.    जहां तक संभव हो, बहस हिंदी में जारी रहे

3.    एंकर्स को भी चाहिए कि वो दोनों पक्षों से इस किस्म के सवाल न पूछे कि वो आपा खो बैठे

4.    दूसरों के मुंह से अपनी बात रखवाने की गंदी और निहायत ही घटिया परिपाटी बंद हो (अफसोस, यही मसला शर्मा जी और अंजान जी के बीच उस दिन फ्लैश हो गया)

5.    बहस का विषयांतर न किया जाए

6.    एक माकूल फैसला होने तक बहस जारी रहे, बेशक थोड़ा वक्त ज्यादा लग जाए

मुझे नहीं मालूम कि मेरे इन सुझावों को कौन मानेगा और कौन नहीं,  पर इतना तय है कि इन सुझावों को मान लिया जाएगा तो इस किस्म के लेख लिखने की जरूरत किसी और लेखक को नहीं पड़ेगी।

लेखक आनंद सिंह दैनिक हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा समेत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों नए लांच होने वाले अखबार हम वतन में बतौर प्रिंसिपल करेस्पांडेंट कार्यरत हैं.


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Comments (4)Add Comment
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written by ishwar singh chandel, July 11, 2011
you are absulately right sir. but news channel,s are not agree this thing, because trp.
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written by ishwar singh, July 11, 2011
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written by vishnu kant shukla, July 11, 2011
आनंद जी,
मैं आपसे सहमत हूं। आज कल टीवी पर जो बहस हो रहे हैं उनका न कहीं सिर होता है न पैर। बहस सार्थक होना चाहिए। वैसे भी बहस देखता कौन है आज कल। आज कल तो छह मीटर साड़ी में भी टीवी के रुपहले पर्दे पर लोग सेक्स ही खोजते हैं।
विष्णु
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written by ek patrkar, July 11, 2011
face book par chhayen hain barmeswar mukhiya bahas me

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