सबक दे गया न्‍यूज ऑफ द वर्ल्‍ड का बंद होना

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sanjayब्रिटेन का सबसे ज्यादा प्रसारित साप्ताहिक टैबलाइड अखबार ''न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'' का अंतिम अंक 10 जुलाई 2011 को निकला और अपने अपने अंतिम संस्करण के मुख्य पृष्ठ पर 'थैंक्यू एण्ड गुड बाय' की घोषणा के साथ ही मीडिया जगत और पाठकों से विदा ले लिया। एक पूरे पृष्ठ पर प्रकाशित संपादकीय में अखबार ने पाठकों से माफी मांगते हुए लिखा कि 'हम रास्ते से भटक गये थे'।

अखबार ने अपने अंतिम संपादकीय में लिखा कि डेढ़ दशक से यह अखबार पाठकों की जिंदगी का हिस्सा बन गया था। इस अखबार ने 168 वर्षों में छह राजाओं के शासनकाल को देखा। दुनिया को हिला देने वाली कई खबरों को प्रकाशित कर विश्व के मीडिया जगत में तहलका मचाया। अखबार का प्रकाशक न्यूज इंटरनेशनल ने पिछले सप्ताह फोन हैंकिंग के आरोपों के बाद अखबार को बंद करने की घोषणा की थी।

'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  इसलिये चर्चित नहीं रहा कि इसने मीडिया जगत की खबरों को विश्व स्तर पर उठाया,  बल्कि इस अखबार को पीत पत्रकारिता के सबसे बड़े उदाहरण के तौर पर देखा जाता रहा है। 28 लाख प्रसार संख्या वाले इस अखबार ने अपने प्रसार संख्या को बनाये रखने के लिये कई हथकंडों वाली खबरों को प्रसारित किया। बड़े नामचीन लोगों की जिंदगी में ताक-झांक कर, पत्रकारिता के मापदंडों को ताक पर रखते हुए इसने ऐसी-ऐसी खबरें छापी जिससे यह पाठकों के एक वर्ग में अपनी पैठ बनाने में सफल तो रहा लेकिन मीडिया जगत में पीत पत्रकारिता का एक मिशाल बनकर उभरा।

आज जब यह अखबार बंद हो चुका है तो मीडिया जगत में चर्चा आम है कि पीत पत्रकारिता के एक युग का अंत हो गया है। इस अखबार की पतन की शुरुआत उस समय हो गयी जब इसने पत्रकारिता को मिशन नहीं व्यवसाय के तौर पर देखा और पत्रकारिता के नैतिकता को ताक पर रख पीत पत्रकारिता को बढ़ावा दिया। कई ऐसे उदाहरण हैं, इसने खबर को सनसनी, मसालेदार बनाकर पेश किया। जहां एक ओर प्रसार संख्या बढ़ाने के लिये इस अखबार ने तमाम हथकंडे अपनाए वहीं पाठकों की सहानुभूति धीरे-धीरे जाती गयी। विज्ञापन देने वालों ने अपने हाथ खींच लिये। अंत में थक हार कर, इसके मालिक मर्डोक को अखबार को बंद ही करना पड़ा।

'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  एक अक्टूबर 1843 को लंदन से यह शुरू हुआ था। शुरू में इसके पाठक बड़े ही साधारण वर्ग के थे। शुरू से ही यह चटपटी खबरें यह देता रहा था। इसकी वजह पाठकों का आम होना था। लेकिन धीरे-धीरे इस अखबार ने अपनी पकड़ बना ली। 1950 तक इसका प्रसार संख्या 90 लाख तक पहुंचा। 1969 को इसे मर्डोक ने खरीद लिया। लेकिन उन्होंने इस सुधारा नहीं बल्कि अखबार को शिखर पर पहुंचाने के लिये पीत पत्रकारिता से जुड़ी खबरों को ही तरजीह देते गये और फिर नतीजा सामने हैं।

'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  विश्व के मीडिया में यह अखबार पीत पत्रकारिता कर अपने को शिखर पर पहुंचाया लेकिन आज जो उसका हश्र हुआ है वह मीडिया के लिये एक सबक है। खासकर भारतीय मीडिया के लिये जहां हजारों पत्र पत्रिकाएं राजधानी दिल्ली से लेकर जिला मुख्यालयों से प्रकाशित हो रही हैं और ये पत्र भी कहीं न कहीं से अपने मिशन को पीछे छोड़ पीत पत्रकारिता के आगोश में है। तभी तो खबर लेकर पैसा छापने, पेड न्यूज, पत्रकारों द्वारा दलाली, सत्ता पक्ष को आंख बंद कर समर्थन देना सहित अन्य भ्रष्टचार के वे सभी आरोप हैं जो भारतीय मीडिया पर लगता रहा है। देश भर में 500 से ज्यादा संचालित खबरिया चैनल भी टीआरपी के चक्कर में उसी रास्ते पर चल रहे हैं जिस पर 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  अखबार चल रहा था। अखबार का हश्र तो सामने है। अब भारतीय मीडिया को भी सोचना होगा, समझना होगा और पत्रकारिता के नैतिकता पर अमल करते हुए पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं मिशन के रास्ते पर लाना ही होगा।

'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  अखबार का बंद होना भारतीय मीडिया के लिये भी एक संदेश है। उनके लिये जो टीआरपी और प्रसार बढ़ाने के लिये खबरों के साथ आये दिन खिलवाड़ करते रहते हैं। झूठी खबरों का प्रसारण प्रकाशन कर थोड़ी देर के लिये वाहवाही तो लूट लेते हैं लेकिन खबर पर उठे सवाल पर और उसकी असत्सयता पर खंडन छापने या प्रसारित करने की भी जहमत तक नहीं उठाते। ऐसे में भले ही यह दुख बात है कि 168 वर्षों से प्रकाशित होने वाले अखबार की मौत हो गयी। वजह सामने हैं। वजह जो दिख रहा है वह उसके मिशन से हट जाना और पाठकों का विश्वास खो जाना अहम है और यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है, जो भारतीय मीडिया को सचेत कर गया है।

लेखक संजय कुमार बिहार राष्‍ट्रभाषा परिषद के 'नवोदित साहित्‍य सम्‍मान' से सम्‍मानित हैं तथा कई पुस्‍तकों का लेखन कर चुके हैं. पिछले बीस वर्षों से पत्रारिता के क्षेत्र में सक्रिय संजय कुमार वर्तमान में आकाशवाणी पटना में समाचार संपादक हैं.


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