एक अनामंत्रित पत्रकार का उलाहना और छोटी सी गुज़ारिश

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मुकेश कुमार आदरणीय, प्रधानमंत्री जी, मुझे बहुत खेद है कि संपादकों से मुलाकात में आपने मुझे आमंत्रित नहीं किया जबकि मैं उन तमाम कसौटियों पर खरा उतरता हूँ जिसके आधार पर आप पत्रकारों को बातचीत के लिए बुलाते हैं। मुझे नहीं मालूम कि आपने ऐसा क्यों किया होगा पर लगता है किसी ने मेरे ख़िलाफ़ आपके कान भरे हैं।

किसी ने ज़रूर उल्टा-सीधा कहा होगा और आपको लगा होगा कि मुझे न बुलाना ही आपके राजनीतिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा। मगर मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि अगर आपने मुझे बुलाया होता तो मैं कतई ऐसे सवाल नहीं करता जिनसे आपको असुविधा होती या आप धर्मसंकट में फँसा महसूस करते। इसके विपरीत मेरी उपस्थिति आपको राहत ही प्रदान करती।

मैं जानता हूँ कि मेरे इतना कह देने भर से आपको भरोसा नहीं होगा इसलिए मैं बताना चाहता हूँ कि यदि आपने मुझे बुलाया होता तो मैं ये नहीं पूछता कि इतने सारे घोटालेबाज़ों के परदाफ़ाश होने के बावजूद आप नैतिकता के आधार पर पद क्यों नहीं छोड़ देते। लोगों का क्या है उनको तो बस गाल बजाने से मतलब। उनका ये बोलने में क्या जाता है कि आपका मंत्रिमंडल अली बाबा और चालीस चोर की तरह है। असल में तो आप कीचड़ में कमल की तरह खिले हुए हैं, बिल्कुल पाक-साफ़। आप तो ईमानदारी की प्रतिमूर्ति हैं, लोग आपकी ईमानदारी की मिसालें देते हैं। आपकी कसमें खाकर सटोरिए दाँव लगाते हैं। कुछ भ्रष्ट लोग आपको शिखंडी की तरह इस्तेमाल करते हैं तो इसमें आपका क्या दोष।

मैं एक अदना सा पत्रकार आपके दरबार में हाज़िरी लगाने का आकांक्षी ये भी नहीं पूछता कि हर रोज़ बढ़ती महँगाई क्या आपकी नींद नहीं उड़ा देती। क्या कोई भूखा-नंगा चेहरा आपको परेशान नहीं करता और क्या आप फिर भी चैन से सोते हैं। अगर इस तरह से कोई सोचने लगे तो उसका जीना ही हराम हो जाएगा। और आपने सबका ठेका लिया है क्या... आपसे जिनके लिए जितना बन पड़ता है करते हैं, बाक़ी सबका अपना-अपना भाग्य है। आपकी नीतियों की वजह से देश के पचासों लोग अरबपति बन गए, क्या दूसरे लोग ऐसा नहीं कर सकते थे।

मैं जानता हूँ कि ये पूछने का कोई तुक नहीं है कि आपके आर्थिक सुधारों ने असमानता की जो खाई पैदा की है और बहुसंख्यक आबादी विपन्नता के दलदल में जिस तरह से समाती जा रही है, क्या उसके लिए आपको कोई अपराधबोध होता है या फिर इन क्रांतिकारी सुधारों के लिए वाहवाही आपके कानों में ध्वनित होती रहती है। ये तो मैं जानता हूँ या वही जानता है जिसे देश-विदेश के सैकड़ों दबाव झेलते और शक्तिशाली लोगों को खुश रखते हुए सरकार चलानी पड़ती है।

दरअसल, पब्लिक मेमोरी बहुत छोटी होती है। वह भूल गई है कि जब अर्थव्यवस्था संकट में थी तो आपने ही मुद्रा कोष और विश्व बैंक के साथ मिलकर रुपए की कीमत गिरा दी थी और फिर उदारवाद के ज़रिए विकास की आँधी लाकर देश को संकट से उबारा था। आपने देश के लिए इतने त्याग किए हैं कि अगर कोई ये पूछे कि बीस सालों में दस लाख किसान और करीब इतने ही मज़दूरों ने आत्महत्याएं की हैं और उसके लिए आपके द्वारा लागू की गई आर्थिक नीतियाँ ज़िम्मेदार हैं तो ये आपके साथ सरासर नाइंसाफ़ी होगी और प्रश्नकर्ता की अकल पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है। इसलिए ये सवाल तो मैं नहीं ही करता।

आपने देश को तरक्की की राह पर ला खड़ा किया है। जगह-जगह मॉल बन रहे हैं, फ्लाई ओवर बन रहे हैं, इतने सारे हवाई जहाज़ उड़ रहे हैं, दुनिया भर की कीमती गाड़ियाँ और दूसरे अंतरराष्ट्रीय ब्रांड की चीज़ें आसानी से उपलब्ध हैं। अगर लोग रुकावटें न खड़ी करते तो आज भारत अमेरिका को भी पीछे छोड़ देता। ऐसे में अगर कोई कहे कि आप केवल एक वर्ग की सोचते हैं तो वास्तव में उस आदमी को अर्थव्यवस्था की कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में इस तरह के सवाल पूछकर मैं तो अपना और देश का कीमती वक्त बरबाद करने से रहा।

दरअसल, लोगों को मालूम नहीं है कि आप चौबीसों घंटे किस तरह से देश सेवा में जुटे रहते हैं। आप तो ग़रीबों की सुध लेने के लिए रातों में वेश बदलकर निकल पड़ते हो। सर्द अँधेरी रातों में मैंने खुद आपको ठंड में ठिठुर रहे लोगों को कंबल बाँटते देखा है। इन्हीं के लिए आप कभी विश्व बैंक तो कभी मुद्रा कोष के दबाव में आ जाते हो। बड़े औद्योगिक घरानों को बड़ी-बड़ी रियायतें भी आप इसीलिए देते हो कि वे आम आदमी को सस्ती चीज़ें मुहैया करवाएं। अब इसमें भला आपका क्या दोष यदि वे ऐसा न करें तो।

मौन तो विद्वतजनों का आभूषण होता है। शास्त्रों के अनुसार अल्पभाष्य गुणों का राजा है। जो कम बोलते हैं वे कम ग़लत बोलते हैं। लगता है कि लोग शायद ये कहावत भी भूल गए हैं कि अधजल गगरी छलकत जाए, भरी गगरिया चुप्पै जाए। इसलिए कोई चाहे कुछ भी कहे, मगर बड़े से बड़े मुद्दों पर भी आपके मौन धारण करने की रणनीति का कायल हूँ और इस बारे में कोई प्रश्न करने की धृष्टता मैं नहीं करने वाला था।

अब लोगों का क्या है, वे तो कुछ भी कहते हैं। आपको कठपुतली कहने वाले भूल जाते हैं कि सबके सब किसी न किसी के हाथों की कठपुतली हैं और सब किसी न किसी रिमोट से संचालित होते हैं। किसी का रिमोट कंट्रोल दस जनपथ के हाथ में है तो किसी का नागपुर में। कइयों के रिमोट कंट्रोल टाटा, बिड़ला और अंबानियों के हाथ में होते हैं। वास्तव में जो लोग आप पर ये तोहमत लगाते हैं उन्हें न तो राजनीति का ज्ञान है और न ही लोकतंत्र का।

उपरोक्त स्पष्टीकरण के बाद मुझे आशा ही नहीं पूरा विश्वास है कि इस पत्र से आपकी समस्त शंकाएं दूर हो जाएंगी और पत्रकारों के साथ अगली मुलाकात में आप बेखटके मुझे आमंत्रित करेंगे।

आमंत्रण की प्रतीक्षा में

लोकतंत्र  का सजग प्रहरी

इस व्‍यंग्‍य के लेखक मुकेश कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. इन दिनों हिंदी राष्ट्रीय न्यूज चैनल 'न्यूज एक्सप्रेस' के हेड के रूप में काम कर रहे हैं.


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