एक मित्र ने कटाक्ष किया- अब आप पत्रकार ही बाकी हैं

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हरिवंशएक दिन के ही अखबार (8 जुलाई 2011) में दो खबरें आयीं. (1) 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में दयानिधि मारन केंद्रीय मंत्रिमंडल से हटे या हटाये गये. संभावना है कि वह भी तिहाड़ जेल जायें. पूर्व मंत्री (राजनेता), नौकरशाह (बड़े) और कॉरपोरेट वर्ल्ड के बड़े लोग तिहाड़ में पहले से ही हैं. इसी मामले में. एक मित्र ने कटाक्ष किया.... अब आप पत्रकार ही बाकी हैं.

यह जांच सचमुच आगे बढ़े, तो यह कटाक्ष सच हो सकता है, क्योंकि इसमें बड़े-बड़े पत्रकारों के नाम भी हैं. पर इससे भी खास बात ‘हिंदुस्तान के शासक वर्ग के लोग (राजनीति, नौकरशाही, कॉरपोरेट वर्ल्ड) तिहाड़ में हैं. पत्रकारिता भी घेरे में है.’ याद रखिए यह सब एक मात्र सुप्रीम कोर्ट के सक्रिय हस्तक्षेप से संभव हुआ है. मीडिया या पत्रकारिता के कारण नहीं. 2जी में जब घोटाले हो रहे थे, तब या उसके बाद तक उसके कागजात- जानकारियां, देशभर में उपलब्ध थे. पर मीडिया के सूरमा तो यूपीए 2 सरकार में मनपसंद विभाग राजा को दिलाने और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को शक्ल देने में लगे थे.

सुब्रमण्यम स्वामी की सक्रियता व सुप्रीम कोर्ट के सौजन्य से समाज अपने शासकों (नेता, अफ़सर, कॉरपोरेट वर्ल्ड और मीडिया) की असली शक्ल देख रहा है. भारत के एलीट या रूलिंग क्लास का सही चेहरा. यह भी याद रखिए, संविधान में केंद्रीय मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेवारी है. इस मसले पर तब और प्रभावी मंत्रियों-अफ़सरों ने क्या कहा-किया था, यह भी सामने आ रहा है. सुब्रमण्यम स्वामी की तो एक पखवारे पहले किताब भी आ गयी है. ‘2जी स्पेक्ट्रम स्कैम, लेखक सुब्रमण्यम स्वामी’ हर आनंद पब्लिकेशन). इस किताब का निष्कर्ष, एक पंक्ति में, कैसे यह व्यवस्था, पूरी तरह तहस-नहस हो गयी है? टूट और बिखर गयी है. मरम्मत के दायरे से बाहर, यह 2जी स्पेक्ट्रम से प्रमाणित हो गया है.

इस तरह दयानिधि मारन का जाना, राजनीति के लोभी, लालची, भ्रष्ट, अनैतिक रूप का उजागर होना है. लेकिन आश्चर्य देखिए, इसे रोकने के लिए यह केंद्र सरकार कितनी सजग है? बाबा रामदेव-अन्ना के आंदोलनों और जन दबाव के बावजूद भ्रष्टाचार की सजा का प्रावधान, नये लोकपाल बिल में 10 वर्ष है. आंदोलनकारियों की मांग है कि यह सजा फ़ांसी की हो या आजीवन कारावास. साथ में पूरी संपत्ति जब्त हो. पर केंद्र सरकार सहमत नहीं है. इतनी सड़ांध, भ्रष्टाचार के जानलेवा कैंसर (देश के लिए) के बावजूद केंद्र भ्रष्टाचारियों पर ‘सॉफ्ट’ क्यों है?

क्या याद दिलाने की जरूरत है कि आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भ्रष्टाचारियों को चौक-चौराहे के लैंपपोस्ट पर लटकाने (फ़ांसी) की बात की थी. नवंबर 2010 में बिहार में कांग्रेस की बुरी पराजय हुई, तो कांग्रेसियों ने कहा, वे भी बिहार सरकार की तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ़ सख्त कानून बनायेंगे? आज तक कहां है, वह कानून? दरअसल संघीय व्यवस्था में, राज्य, केंद्रों की रहनुमाई नहीं करते, केंद्र राज्यों की अगुवाई और मार्गदर्शन करता है. यहां उलटी स्थिति है. एक-एक कर केंद्र में मंत्री रहे, बड़े पदों पर नौकरशाह रहे लोग तिहाड़ जेल जा रहे हैं, क्यों? लोभ, भ्रष्टाचार और अनैतिक सांठगांठ के कारण. रोग के इस मूल कारण-प्रवृत्ति को रोकने के लिए केंद्र सरकार कितनी तत्पर है? यह जानिए, आठ जुलाई 2011 की दूसरी खबर से. इससे केंद्र की मंशा साफ़ होती है.

‘सांसद निधि’, अब पांच करोड़ की होगी. 1993-94 में यह योजना तत्कालीन कांग्रेस सरकार (नरसिंहराव प्रधानमंत्री थे) ने शुरू की. अपनी सरकार बचाने के लिए. तब पहला सांसद घूस कांड हुआ. कांग्रेस सरकार ने कुछ सांसदों को घूस देकर अपनी सरकार बचाने में मदद ली. सांसदों को भ्रष्ट करने का पहला सार्वजनिक और पुख्ता प्रमाण था. इसके बाद सभी सांसदों को खुश करने के लिए सांसद कोष शुरू हुआ. इसी रास्ते विधायक भी चले. इन कोषों के दुरुपयोग पर‘ऑडिटर जनरल’ की रपटों या अन्य जांच निष्कर्षों को गौर करें, तो इसे कब का खत्म होना चाहिए था.

माना जाता है कि भ्रष्ट सांसद-विधायक 40/50 फ़ीसदी तक इसमें कमीशन लेते हैं. हालांकि ईमानदार सांसद-विधायक भी हैं. पर वे अपवाद और आज की मुख्यधारा से बाहर हैं. पांच करोड़ का 40 फ़ीसदी, साल में दो करोड़. पांच वर्ष में दस करोड़. अब राजनीति को एक तरफ़ कांग्रेस ऐसे फ़ैसलों से ‘स्टेट पावर’ (सत्ताधीशों के अहंकारपूर्ण राजबल), मनीपावर (अर्थबल) और मसल पावर (भुजबल. पैसा होगा, तो अपराधी-लोभी आयेंगे ही) की कंदराओं में ठेल रही है. इस राजनीति के गर्भ से तो ‘राजाओं’, ‘मारनों’ और तिहाड़ गये शासक वर्ग के बड़े चेहरों की तरह ही लोग निकलेंगे. ऐसे फ़ैसलों से जेल जानेवाले चेहरे बदलते जायेंगे, पर रोग बढ़ता जायेगा. भ्रष्टाचारियों-घोटालेबाजों का कारवां अंतहीन होगा.

ऐसा क्यों किया केंद्र सरकार ने? देश और केंद्र सरकार नाजुक दौर में हैं. भ्रष्टाचार और घोटालों के गंभीर आरोपों से. सरकार मिली जुली है. क्या सांसदों को खुश रखने की यह कोशिश नहीं है? अमेरिकी परमाणु डील पर कैसे सांसद खरीदे-बेचे गये, विकीलीक्स के खुलासे के बाद भी यह भी बताने की जरूरत है? यह भी याद रखिए, बिहार ने विधायक फ़ंड खत्म करने का ऐतिहासिक और साहसिक फ़ैसला किया, जब केंद्र सरकार या कांग्रेस ने एक कोने से बात उठी कि सांसद कोष भी खत्म होगा? पर केंद्र सरकार में वह साहस नहीं है. समझौते से सत्ता मिलती है. सत्ता के लाभ मिलते हैं, इतिहास के यश नहीं.

और कांग्रेस भविष्य में यशहीन पार्टी ही बनना चाहती है, ऐसे फ़ैसले यही संकेत देते हैं. आज विपक्ष में भी कोई मधुलिमये या एके राय नहीं है, जो खड़ा हो और कहे कि गरीबों की आय बढ़े बिना, सांसदों का वेतन-भत्ता- सुविधाएं क्यों बढ़ें? हम नहीं लेंगे (इन लोगों ने नहीं लिया). एक तरफ़ गरीबों-आम जनता पर महंगाई की मार, दूसरी ओर शासकों-सत्ताधीशों द्वारा राजकोष का यह दुरुपयोग? सांसद कोष जैसे प्रावधानों से ईमानदार राजनेता भी भ्रष्ट माने जाने लगते हैं, इसलिए आज राजनीति को बचाने की जरूरत है, हम ऐसे फ़ैसले नहीं मानेंगे? क्या ऐसा कहने या स्टैंड लेनेवाले सांसद 120 करोड़ के देश में बचे हैं?

आज इस देश में सिर्फ़ गद्दी के भूखे पॉलिटिशियन बचे हैं? कोई स्टेट्समैन (राजदर्शी) नहीं बचा? दोनों में अंतर है. एक वर्तमान देखता है, दूसरा वर्तमान के साथ भविष्य भी. राजाजी (राजगोपालाचारी) ऐसे ही भविष्यद्रष्टा मनीषी थे. उनकी एक बोधमय लघुकथा है. पढ़िए यह अंश ‘राजनीति मेरी प्रेयसी’ (अरुण भोले) पुस्तक के सौजन्य से. शीर्षक है-‘पुरस्कार’. पहले वह कथा ही बता देता हूं. धरातल से उनकी चिंतन-चोटी की ऊंचाई आप नाप सकें, तो इसी कथा से नाप लें. कथा यों है:

महाराज ने बूढ़े राजशिल्पी को सभा में बुलाकर आदेश दिया - ‘नदी के दक्षिण- तट पर एक ऐसा भवन बनाओ, जो सौंदर्य और सुविधा की दृष्टि से राज्य भर में अद्वितीय हो.’ और तत्काल ही महाराज की आज्ञा से भवन-निर्माण के निमित्त राजशिल्पी को संभावित धनराशि भी दे दी गयी. इतनी धनराशि अपने अधिकार में देखकर शिल्पी का मन डोल गया. उसने सोचा- क्यों न घटिया और नकली सामग्री से ही भवन खड़ा कर दूं और इस रकम का शेष अंश बचाकर लाभान्वित हो जाऊं? लोभ ने विवेक की आंखों को अंधा बना दिया- भवन तैयार हो गया. महाराज बड़े प्रसन्न हुए. भवन के उदघाटन के लिए एक विशाल समारोह आयोजित हुआ. हर्षोत्फ़ुल्ल चेहरे से महाराज उठे और जन समूह की ओर उन्मुख होकर बोले, ‘आज मेरी एक पुरानी साध पूरी हुई है. कई वर्षों से राजशिल्पी की एकनिष्ठ कर्तव्यपरायणता और राजभक्ति को मैं पुरस्कृत करना चाहता था. आज वह पुरस्कार तैयार हो गया है. अपने राज्य का यह सबसे सुंदर- सुखद भवन मैं राजशिल्पी को पुरस्कार में देता हूं’ इन शब्दों के साथ महाराज ने भवन की चाबियां शिल्पी के हाथों में सौंप दीं. महाराज के औदार्य ने सारे समाज को जय-जयकार से प्रतिध्वनित कर दिया. हमारे ही अपने छल, हमें जीवन में इस प्रकार छल रहे हैं? हम जानते हुए भी चुप हैं.

लेखक हरिवंश देश के जाने-माने पत्रकार हैं और बिहार-झारखंड के अग्रणी अखबार प्रभात खबर के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लिखा प्रभात खबर अखबार से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.


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