एसपी के इन चिरकुट चेलों का दोगलापन

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: कब तक एसपी का नाम ले-लेकर दोगले लोग अपने दाग को उजले कहते रहेंगे : सुरेंद्र प्रताप सिंह उर्फ एस.पी. सिंह को यह देश जानता है। उन जैसा शानदार पत्रकार सौ-दो-सौ सालों में एक बार ही पैदा होता है। विलक्षण प्रतिभा के धनी एसपी ने रविवार को रविवार बनाया, आज तक को आज तक। इसके अलावा बहुत कुछ किया, जिस पर बाद में जिक्र। यहां जिक्र उनके चेलों का, जो आज की तारीख में विभिन्न मीडिया हाउसों में काम कर रहे हैं।

पहले ही माफी मांग लूं, इन चेलों में से किसी का नाम जाहिर नहीं करूंगा। इसके पीछे हमारी अपनी मजबूरी है। पर, जो बातें हैं वो सौ टके सत्य। उनके एक चेले अभी पैदा होने वाले अखबार के संपादक हैं। पहले किसी और अखबार में थे। वहां भी उन्होंने एसपी का चेला होने का तमगा दिखाया और पा गए नौकरी। बाद में, सियार का रंग जब उतरा और वह हुआ हुआ करने लगा तब चूतड़ पर लात मार कर हकाल दिया गया। अब नई कंपनी पकड़ी है इन्होंने। अखबार लांच करने जा रहे हैं। हर बात पर एक ही कमेंट..एसपी कहते थे....मैं एसपी का चेला हूं....एसपी बराबर पाजीटिव रहने को कहते थे...। अरे बाबा, सब एसपी ही कहते थे तो तुम क्या करते हो। जो वेतन पाते हो, वह एसपी सिंह के घरवालों को भेजते हो क्या। हद कर दी।

दूसरे साहेब एक टीवी चैनल के संपादक हैं। हमारे साथ काम कर चुके हैं पर मैं दावा नहीं करूंगा कि वो मेरे गुरु हैं। मैं आज भी मानता हूं कि मैं उनसे हर मामले में बेहतर हूं। गुरु कैसे मान लूं। गुरु शिष्य की परीक्षा लेता है, शिष्य गुरु की। एडीटर, सब एडीटर या अपने अन्य मातहतों का आई-क्यू चेक करता है तो उसके अन्य मातहत भी उसे चेक करते हैं। खैर...तो यह जो सज्जन हैं, वह एक टीवी के संपादक हैं। उस टीवी का ब्यूरो चीफ मेरा मित्र है, मेरे साथ पढ़ा है। वह बताता है कि जब संपादक महोदय अपने मालिक से डांट सुन कर व्यथित मुद्रा में होते हैं तो कुछ खास चाटुकारों को बुला कर बताते हैं कि वह एसपी से कितनी बार मिले और कब-कब, क्या-क्या कहा। यह संपादक महोदय कभी नहीं कहते कि एसपी पत्रकारिता को कैसे जीते थे और हम सभी को वैसा ही करना चाहिए। इन संपादक महोदय को आपने अनेक स्थानों पर भाषण देते देखा होगा। रस्मी भाषण देने में ये प्रवीण हैं। पहचाना आपने। क्लू दे देता हूं...एक बड़े मीडिया घराने से इन्हें कुछ वर्ष पहले लतियाया गया था। दूसरा क्लू है यह एक नंबर के अहंकारी हैं। दिमाग पर बल दें, नाम और चेहरा सामने आ जाएगा।

एक और पत्रकार हैं। ये कभी एसपी के चेले नहीं रहे पर शो यही करेंगे कि एसपी गोपनीय कार्यों में भी इनकी मदद लिया करते थे। ये सर्वत्र चलायमान हैं। पटना-दिल्ली-रांची-मुंबई एसपी के खास होने के नाम पर घूमते रहते हैं। क्लू है...मुंह में हर वक्त पान। इस किस्म के पत्रकार अजीबोगरीब किस्म से पैदा हो रहे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के एक छात्र से मैंने दो साल पहले पूछा था- सुरेंद्र प्रताप सिंह को पहचानते हो। उसने कहा-जी हां। मैं उनके साथ काम कर चुका हूं। मैं अवाक। मैंने पूछा-कहां काम किये हो भई। उसने कहा-दैनिक जागरण में। वहां वो चीफ सब थे। मैंने बच्चे की उम्र पूछी तो उसने बताया 23 साल। ये एसपी का जादू है या मैनेजमेंट का फंडा या कुछ और। इस तरह की बातें हो रही हैं। कौन कर रहा है ये सब।

एसपी साले-छमासे याद किये जाते हैं। उनके परिजनों में से एक को मैं भी जानता हूं। उनके भतीजे हैं राजेश सिंह उर्फ गोल्डी। आप अभी पूर्वांचल प्रहरी में गुवाहाटी में कार्यरत हैं। उनके कुछ और रिश्तेदार कोलकाता में हैं। कोलकाता के पत्रकार भाईयों का आरोप है कि उनके रिश्तेदार एसपी का नाम भुनाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते। मैं एसपी का यह, मैं एसपी का वह। मैं सारी जिंदगी एसपी साब से मिल नहीं पाया, चाह कर भी। उनका लिखा पोस्टकार्ड है मेरे पास जिसमें उन्होंने लिखा है कि डीलक्स (पूर्वा एक्सप्रेस) कोडरमा से हाबड़ा इतने बजे पहुंचती है और हाबड़ा पहुंचने के बाद तुम रविवार के दफ्तर में फोन करना। कोई आदमी तुम्हें लेने पहुंच जाएगा। मैं मिल न सका, यह दुर्भाग्य ही रहा। काम करना तो अधूरा सपना रहेगा ही।

सभाओं-आलेखों में वक्ताओं-लेखकों को जब एसपी के बारे में बोलते-पढ़ते हुए सुनता-गुनता हूं और वर्तमान में उनका चाल-चरित्र और चेहरा देखता हूं तो पत्रकारिता से संन्यास लेने का विचार मन में पैदा होता है। इस किस्म का दोगला चरित्र 40 की उम्र में पहली बार देख रहा हूं। भला हो इस सूचना क्रांति का जिसके माध्यम से हर किसी की खबर मिल जाती है। संवाददाताओं से दारू पीने के लिए पैसे मांगने वाले संपादक टाइप के लोग जब एसपी का नाम अपने मुंह से निकालते हैं तो लगता है कब धरती फटे और मैं उसमें समा जाऊं। एसपी के नाम का इतना मिसयूज नहीं होना चाहिए। इट्स एनफ। उन घरानों से हाथ जोड़ कर निवेदन है जो हर साल एसपी को याद करते हैं। कार्यक्रम जरूर हो पर प्रार्थना यह है कि उन लोगों को ही बोलने के लिए बुलाया जाए जो वाकई एसपी के साथ थे और जिनमें दूसरा एसपी हम ढूंढ़ सकें। आखिर हमारे आदर्श के साथ खिलवाड़ करने की इजाजत किसने और किसको दे दी?

आनंद सिंह
विशेष संवाददाता
हमवतन
गोरखपुर


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