मुंबई धमाके और शशिशेखर की जमात

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'हिंदुस्तान'  के 17 जुलाई के अंक में शशि शेखर साहब का आलेख 'मुंबई हमले से उपजे कुछ प्रश्न'  खुद में कुछ सवाल पैदा करता है। वे आतंकवाद और आजादी की लड़ाई में फर्क करना भूल गए हैं। जिस तरह से अंग्रेज भारत की आजादी के दीवानों को आतंकवादी की श्रेणी में रखते थे, इसी तरह शशि शेखर साहब ने भी फलस्तीन की आजादी की लड़ाई लड़ने वालों को आतंकवादी ठहरा दिया है।

कम से कम शशि शेखर साहब से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वे यह लिखेंगे कि 'घर में घुसकर उनकी (इस्राइल)  नीति ने उनके घर को हमारे मुकाबले ज्यादा सुरक्षित कर दिया है।'  1948 में इस्राइल नाम का देश जबरदस्ती वजूद में लाया गया था। यह फलस्तीनियों से छीना गया भू-भाग था। तब से आज तक फलस्तीनी आजादी की लड़ाई लड़ते रहे हैं। सवाल यह है कि आतंकवादी फलस्तीन हैं या इस्राइल? बेकसूर लोगों पर बमों से हमला करके उन्हें हलाक करना किस श्रेणी में आता है?

हमने फलस्तीन को हमेशा मान्यता दी। इंदिरा गांधी के जमाने में यासर अराफात को एक राष्ट्राध्यक्ष का दर्जा देकर उनका सम्मान किया जाता रहा। इसकी विपरीत आरएसएस जैसे संगठन इस्राइल के पक्ष में हमेशा खड़े रहे। यदि शशि शेखर आजादी की लड़ाई को आतंकवाद बताते हैं तो मुझे यह कहने दीजिए ब्रिटिश इतिहास में भगत सिंह और उनके साथियों के बारे में जो कुछ लिखा गया है, वह सच है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस्राइल और पाकिस्तान का आका अमेरिका ही है। दोनों का वजूद अमेरिका की वजह से ही है। इस्राइल जो कुछ करता रहा है, अमेरिका की शह पर ही करता रहा है। फलस्तीनियों का दमन एक तरह से इस्राइल नहीं, अमेरिका करता है।

पाकिस्तान को आतंकवाद का गढ़ बनाने में भी अमेरिका की अहम भूमिका रही है। उसने ही तालिबान को अपने स्वार्थ के लिए खड़ा किया था। यह भी अजीब बात रही कि शशि शेखर उन लोगों की जमात में शामिल हो गए, जो भारत में होने वाली किसी भी आतंकवादी कार्रवाई को आंखें बंद करके पाकिस्तान को दोषी ठहरा देते हैं। ऐसे लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि इस देश में अभिनव भारत और सनातन संस्था जैसे आतंकवादी संगठनों का वजूद भी है। यहां पाकिस्तान को पाक-साफ बताना बिल्कुल मकसद नहीं है, मकसद सिर्फ इतना है कि जब सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान पर ही उंगली उठती हैं तो अभिनव भारत और सनातन संस्था जैसे आतंकवादी संगठन अपना काम कर जाते हैं।

यह संयोग नहीं है कि जब से साध्वी एंड गैंग का पर्दाफाश हुआ है, तब से आतंकवादी गतिविधियों में बेहद कमी आई है। भूलना यह भी नहीं चाहिए कि मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस में हुए बम धमाकों में भी पाकिस्तान का ही नाम आया था, गिरफ्तारियां भी मुसलमानों की ही हुई थीं। उसके बाद क्या हुआ, सब जानते हैं। मुंबई के हालिया धमाकों में भी अभी स्पष्ट नहीं है कि इनमें किसका हाथ है, इसलिए कोई भी निष्कर्ष निकालना सही नहीं है।

सामयिक मुद्दों पर कलम के जरिए सक्रिय हस्तक्षेप करने वाले  सलीम अख्‍तर सिद्दीकी मेरठ के निवासी हैं। वे ब्लागर भी हैं और 'हक बात' नाम के अपने हिंदी ब्लाग में लगातार लिखते रहते हैं. इनदिनों दैनिक जनवाणी से जुड़े हुए हैं.


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