मीडिया की भी लक्ष्मण रेखा है

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शशि शेखरलक्ष्मण रेखा के उस पार सफलता का उजाला नहीं बल्कि असफलता का जिल्लत भरा अंधेरा है। क्या हमारे देश के पत्रकार और मीडिया संस्थान 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  के अंजाम से कुछ सबक लेंगे? एक चौथाई से ज्यादा सदी बीत चुकी है। उन दिनों मैं नया-नया पत्रकार हुआ था और जमीन-आसमान एक कर देने का जोश तन-मन में हर दम हिलोरें लेता रहता था। उन्हीं इलाहाबादी दिनों में एक किताब हाथ लगी- द आलमाइटी।

उस समय इसे 'बेस्ट सेलर'  के खिताब से नवाजा जा रहा था। कुछ उत्सुकता और बहुत कुछ रोमांच के साथ मैंने उसे पढ़ना शुरू किया। इरविंग वालेस की कलम और कल्पना का जादू अद्भुत था। कहानी एक ऐसे अखबार मालिक की थी, जो खबरें छापने से पहले उन्हें गढ़ता है। अपना प्रसार बढ़ाने की इस जुगत में वह पतन की सीढ़ियां फिसलता जाता है। उपन्यास यकीनन बहुत अच्छा था, पर उसे खत्म करते-करते चेहरे पर व्यंग्य भरी हंसी आ गई थी। भला समाचारों को कोई गढ़ सकता है? उन दिनों अखबारनवीसों की दुनिया निश्छल हुआ करती थी।

तब किसी ने सोचा भी न था कि तीन दशक बीतते न बीतते इस तरह के किस्से सामने आएंगे कि लोग इरविंग वालेस की कल्पना की दाद देने लगेंगे। 1953 में ऑस्ट्रेलियाई अखबार 'एडीलेड न्यूज' में काम करनेवाले पत्रकारों ने भी नहीं सोचा था कि उनका नौजवान मालिक एक दिन ऐसे लोगों को प्रश्रय देगा, जिन्हें पत्रकारिता के विद्यार्थी आनेवाली सदियों में अलग ध्रुव की तरह देखेंगे। मैं रूपर्ट मर्डोक की बात कर रहा हूं। संसार के सबसे ताकतवर मीडिया मुगल, जिनका साम्राज्य महाद्वीपों की सीमाएं नहीं पहचानता। संसार के प्राय: हर देश में लोग उनके चैनल देखते हैं या अखबार पढ़ते हैं।

मर्डोक को 'टाइम'  मैगजीन तीन बार सौ सर्वाधिक शक्तिशाली लोगों में गिन चुकी है। 'फोर्ब्स' ने पिछले साल ही उन्हें 13वें ताकतवर शख्स के तौर पर पहचाना था। एडीलेड से शुरू हुआ सफर यहां तक पहुंचेगा, इसकी कल्पना पता नहीं खुद मर्डोक ने की थी या नहीं? औरों के लिए कभी यह नितांत अकल्पनीय रहा होगा, पर सच यही है कि मर्डोक मीडिया जगत के 'आलमाइटी'  हो चुके हैं। उन्होंने मीडिया की ताकत को पहचाना और उसे मजबूत करने के लिए अनेक युगांतरकारी कदम उठाए। उनके इशारे पर सरकारें बनती और गिरती हैं। खबर गर्म है, 2008 में मौजूदा ब्रिटिश प्रधानमंत्री समंदर लांघकर उनसे 'डील' करने गए थे।

इंग्लैंड में मर्डोक के अखबार जब पिछले चुनाव में खुलकर घोषणा कर रहे थे कि कैमरन जीतने वाले हैं, तब नीति और नैतिकता में यकीन रखने वाले तमाम लोगों की भौंहें तनी थीं। समूची दुनिया में शोर था कि क्या अखबारों को नजूमी की भूमिका निभानी चाहिए? मीडिया इस तरह के दावे कर खुद पार्टी बन जाएगा, तो तटस्थता का क्या होगा? सत्य कहां शरण लेगा? पत्रकारिता की मर्यादा का क्या होगा? इन सवालों की परवाह इस मीडिया मुगल ने कभी नहीं की। वह अपने मानक खुद तय करने और मिटाने के आदी हैं।

खुद मर्डोक ने गर्व के साथ कई बार कहा है कि जब मैं पहली बार बहैसियत मालिक अपने अखबार के दफ्तर में गया था, तो वहां सिगरेटों का धुआं था और टाइप-राइटरों की खटखट। पत्रकार एक तय फ्रेम में सत्य, तथ्य और समाज को देखने के आदी थे। वे चुक गए सिद्धांतों को जीते थे। मर्डोक के लिए यह स्थिति नाकाबिले बर्दाश्त थी। जब उन्होंने इसे बदलने की कोशिश की, तो हंगामा बरपा हो गया, पर रूपर्ट रुकने वाले नहीं थे। उन्होंने हर बार नए प्रतिमान गढ़े। इंग्लैंड के पिछले आम चुनाव ने भी उन्हें विजेता साबित किया। उनके अखबार जैसा बोल रहे थे, वैसा ही हुआ। मर्डोक की यही ताकत पाठकों और दर्शकों को अपनी ओर खींचती रही है। इससे नैतिकता के मारे पत्रकार और राजनेता नाक-भौंह सिकोड़ते हैं। सिकोड़ा करें।

उनकी मिल्कियत में एक नाम 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड' भी है, जिसकी सीईओ रेबेका ब्रुक्स सीखचों के पीछे हो आई हैं। उनका शुमार इंग्लैंड में सबसे दुस्साहसी पत्रकारों में होता है। सहयोगियों का कहना है कि ब्रुक्स को कतार में पीछे खड़ा होना पसंद नहीं। वह चाहती थीं कि लाइन वहीं से शुरू हो, जहां वह खड़ी हों। उनकी इस प्रवृत्ति ने मर्डोक की विजय यात्रा में रोड़े अटका दिए हैं। ध्यान दीजिए। अकेली ब्रुक्स ही इतनी शक्तिशाली नहीं थीं। उनके सहयोगी एंडी काल्सन ब्रिटिश प्रधानमंत्री कैमरन के मीडिया सलाहकार तक बन गए थे। फोन हैकिंग के कारण उन्होंने कुरसी तो गंवाई ही, साथ में हवालात की हवा भी खाई। सिर्फ दो हफ्ते पहले तक ब्रिटेन के राजनेता और शक्तिशाली लोग उनसे कांपते थे। खुद ब्रुक्स ने कभी टोनी ब्लेयर तक को अंगुलियों पर नचाया था। मौजूदा प्रधानमंत्री के बारे में कहा जाता है कि वह जनता नहीं, मर्डोक के वोट से जीते, पर दो हफ्ते पहले तक चुप्पी साधे रखनेवाले कैमरन के सहयोगी खुलकर कह रहे हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। हम तो जीत ही रहे थे। राजनीतिज्ञ संकट में किसी का साथ नहीं देते।

मतलब साफ है। आप तभी तक ताकतवर हैं, जब तक पाठक या दर्शक आपकी सुनते हैं। इस स्वीकार्यता के लिए सबसे जरूरी चीज है साख। मर्डोक और उनके मीडिया साम्राज्य की साख पर इस घटना ने सांघातिक असर डाला है। खतरा पैदा हो गया है कि कहीं उनको ब्रिटेन से अपना बोरिया-बिस्तर न समेटना पड़ जाए। अगर ऐसा होता है, तो उनके प्रतिद्वंद्वी इसे उनके ताबूत में जड़ी जानेवाली कील की तरह मानेंगे। उन्हें ऐसा मानने का हक है। रूपर्ट मर्डोक हमेशा अपने व्यावसायिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए बेहद निर्मम साबित हुए हैं। टेप कांड को उजागर करनेवाले 'द गाजिर्यन'  के संपादक का कहना है कि अगर 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  का बस चलता, तो वह हमें नष्ट ही कर देता। दूसरों के विध्वंस की कीमत पर अपना निर्माण मर्डोक की नीति रही है। कहीं वह खुद इसका शिकार तो नहीं होने जा रहे हैं?

उनका जो हो सो हो, पर सवालों से घिरे भारतीय मीडिया को इस दुर्घटना से सबक लेना चाहिए। पिछले दो दशकों के दौरान हमारे मीडिया ने भी लक्ष्मण रेखा को निरंतर लांघा है। मीडिया को व्यवसाय मानने में कोई हर्ज नहीं है, पर हर पेशे की अपनी नैतिकता होती है और नैतिकता के अपने मानदंड। इनका निर्वाह ऑक्सीजन की तरह है, जिसके बिना जिया नहीं जा सकता। ये मानदंड इधर के सालों में लगातार टूटे हैं। यह चिंता की बात है।

मर्डोक के मामले को देखें, तो साफ है कि मुनाफा, मोनोपॉली, नेटवर्किग और खुद अपने लिए गढ़ी गई महानता किस तरह सरेराह रुसवा कर देती है। 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  ने यही किया। नौकरशाहों, प्रभावशाली लोगों, राजनेताओं और मीडिया का गठबंधन समाज के इस चौथे स्तंभ के लिए खतरनाक है। हमें सबसे पहले चिंता अपनी साख की करनी चाहिए। भारत में भी साख का संकट गहराता जा रहा है। मांग उठ रही है कि सरकार मीडिया के लिए सख्त कानून बनाए। ऐसी बातें तभी उठती हैं, जब हम लक्ष्मण रेखा लांघते हैं। अगर मीडिया और न्यायपालिका को राजनीति के हवाले कर दिया जाए, तो लोकतंत्र कुछ धूर्त और ताकतवर लोगों की कठपुतली होकर रह जाएगा। इसे बचाना है, तो हमें अपनी सीमाएं खुद तय करनी ही होंगी। साथ ही सीमा रेखा लांघनेवाले को बिरादरी से बाहर का रास्ता भी दिखाना होगा।

याद रखिए। लक्ष्मण रेखा के उस पार सफलता का उजाला नहीं, बल्कि असफलता का जिल्लत भरा अंधेरा है। क्या हमारे देश के पत्रकार और मीडिया संस्थान 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड' के अंजाम से कुछ सबक लेंगे?

लेखक शशि शेखर हिंदुस्‍तान के प्रधान संपादक हैं. उनका यह लेख हिंदुस्‍तान में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.


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