मर्डोक की माफी का असर यहां भी!

E-mail Print PDF

पिछली 10 जुलाई को ब्रिटेन का 168 साल पुराना अखबार 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  बंद हो गया. अब खबर यह नहीं है कि रूपर्ट मर्डोक का सामान्यतः 25 लाख प्रतियों वाला यह लोकप्रिय अखबार फोन हैकिंग के मसले में फंसा और अंतिम दिन पहले पेज पर 'अलविदा'  शीर्षक के साथ इसकी लगभग 45 लाख प्रतियां छपीं, बल्कि नए खुलासे यह हैं कि 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  के अलावा भी अनेक अखबार और मीडिया संस्थान फोन हैक करके गुप्त बातें सुन रहे हैं, जिनमें मर्डोक के दूसरे संस्थान भी शामिल हैं और इसे खबर के स्रोत के रूप में प्रयोग कर रहे हैं.

वे सेंसेशन और चटपटी खबरों की तलाश में निजी जांच एजेंसियों, जासूसी संस्थाओं की भी मदद ले रहे हैं. पुलिस और सरकारी कर्मचारियों को घूस देकर जानकारियां जुटा रहे हैं. ऐसी अनेक बातों का खुलासा करते हुए प्रसिद्ध पत्रकार निक डेविस ने 'फ्लैट अर्थ न्यूज'  नामक किताब लिखी है. डेविस ने लिखा है कि पत्रकारों ने अनेक निजी एजेंसियों की मदद से यह पता लगाने की भी असफल कोशिश की है कि राजकुमारी डायना के बेटे प्रिंस हैरी के पिता क्या वाकई प्रिंस चार्ल्स ही हैं? इसके लिए आधार बनाया गया इस्तेमाल टिश्यू पेपर, गिलास पर निशान, डीएनए टेस्ट इत्यादि, लेकिन बात बनी नहीं. इसी तरह पाकिस्तान के राष्‍ट्रपति आसिफ अली जरदारी के क्रेडिट कार्ड के स्टेटमेंट के जरिए यह पता लगाने की कोशिश हुई कि वो पैसा कहां-कहां खर्च कर रहे हैं. नया खुलासा यह भी है कि मर्डोक के अखबार से संबद्ध लोग 9/11 के पीडितों के फोन भी हैक कर रहे थे और अमेरिकी खुफिया एजेंसी इसकी जांच कर रही है.

ऐसे में सवाल है कि अमेरिका, ऑस्‍ट्रेलिया, यूरोप, लैटिन अमेरिका, एशिया और प्रशांत क्षेत्रों में फैले न्यूज कॉर्पोरेशन के व्यापक मीडिया साम्राज्य (जिसमें अनेक अखबार, टीवी, प्रकाशन क्षेत्र इत्यादि शामिल हैं) के मालिक रूपर्ट मर्डोक की फोन हैकिंग को लेकर माफी के क्या अर्थ हैं? ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन की समिति के सामने जब मर्डोक अपने संस्थान और उसमें काम करने वालों की गलती स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि वे खुद को अपमानित और छोटा महसूस कर रहे हैं, लेकिन 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  के साथ ही उनके दूसरे संस्थानों में यह सब जारी रहता है-  तो क्या उनकी बातों पर भरोसा किया जा सकता है? क्या ग्यारह दिनों तक ब्रिटेन में रहकर उन्होंने सिर्फ बयानों के जरिए आग पर पानी डालने का ही काम नहीं किया?

हालांकि 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  की पूर्व संपादक रेबेका ब्रुक्स गिरफ्तार हैं और उनसे पूछताछ हो रही है, पुलिस कमिश्नर सर पॉल स्टीफेन्सन और उनके सहायक जॉन येट्स की नौकरी चली गई है, प्रधानमंत्री डेविड कैमरून का राजनीतिक कैरियर भी इस कांड से प्रभावित हो सकता है क्योंकि उनके मीडिया सलाहकार अखबार के पूर्व संपादक एंडी कॉलसन के जरिए वो भी लपेटे में हैं, कॉलसन की भी गिरफ्तारी हुई और मर्डोक ने अपने दो प्रमुख सहयोगियों की नौकरी ले ली. लेकिन इसी बीच हुआ यह कि कांड का खुलासा करने वाले पत्रकार सीन होर अपने घर में मृत पाए गए- जाहिर है इससे पूरा मामला अब नियंत्रण से बाहर हो गया है. अब भले कैमरून यह कहें कि अच्छा होता कि उन्होंने कॉलसन को प्रधानमंत्री कार्यालय में संचार निदेशक नियुक्त न किया होता और वो अब भले ही इस पूरे कांड की जांच के साथ माफी भी मांग रहे हैं, लेकिन विपक्षी लेबर नेता एड मिलिबेंड अब संतुष्ट होने को तैयार नहीं हैं.

एक निजी जांच एजेंसी के इस खुलासे ने भी आग में घी का काम किया है कि उसके पास चार हजार आवेदनों में से तीन सौ पत्रकारों के हैं और 31 विभिन्न प्रकाशनों के हैं. गुप्त बातों की जानकारी के लिए सबसे ज्यादा आवेदन डेली मेल अखबार से हैं. इसके बाद नंबर है संडे पीपुल और डेली मिरर का. जाहिर है अब राजनीति, पुलिस तंत्र, मीडिया संस्थानों और निजी डिटेक्टिव्स की पोलपट्टी खुल रही है और परत दर परत उघड़ रही है. जांच के लिए स्कॉटलैंड यार्ड ने पुलिस अफसरों की संख्या भी 45 से 60 कर दी है.

दरअसल, मर्डोक के अखबार 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  के कारनामों का खुलासा सिर्फ बारूद के ढेर पर बैठी सनसनीखेज पत्रकारिता की छिपी परतों का ही उघड़ना नहीं है, इसका असर विश्व स्तर पर होना है. यह साम्राज्य के दरकने का ही असर है कि मर्डोक अब माफी मांगते नहीं थक रहे और यह कहकर बचना चाह रहे हैं कि इस एक अखबार की हैसियत मेरे कारोबार की सिर्फ एक फीसदी है. हजारों लोग हमारे यहां काम करते हैं, मैं सबकी जिम्मेदारी कैसे ले सकता हूं. लेकिन इन सबके बीच ब्रिटेन के उपप्रधानमंत्री निक क्लेग ने हवा का रुख भांपते हुए पूरे कांड से यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि मैंने कॉलसन को लेकर हमेशा ही कैमरून से शंका जताई थी.

उधर कैमरून ने भी बचाव में ये तर्क दिया है कि मर्डोक का ज्यादा करीबी रिश्ता हमारी कंजर्वेटिव सरकार से नहीं, पहले की लेबर पार्टी की सरकार से रहा है. तभी तो मर्डोक की सबसे खास रेबेका ब्रुक्स को पूर्व लेबर प्रधानमंत्री गार्डन ब्राउन की पत्नी सारा ने 2008 में आयोजित खास मीडियाकर्मियों की पार्टी में भी बुलाया था, जबकि मैंने ऐसा कोई कार्य कभी नहीं किया. दरअसल, यह कांड सबसे पहले 2006 में तब उछला था जब 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड'  में खबर छपी कि प्रिंस विलियम के घुटने में भारी दर्द है. तब इस बात को सिर्फ दो-तीन लोग ही जानते थे. इस खबर के खुलासे से साफ हो गया कि फोन पर हैकिंग के जरिए यह अखबार खबर बनाता है.

नैतिकता की आड़ में हो रहे काले धंधों का दिवाली के पटाखे 'चटाई'  की तरह फूट कर बाहर आना अब शुरू हो रहा है. भारत में भी इसका असर हो तो कोई ताज्जुब नहीं. वैसे तो देश में अनेक सरकारें पहले भी पत्रकारों को मिलाने-फुसलाने का काम करती रही हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में 1990 के दशक में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव पर पत्रकारों को विवेकाधीन कोष से पैसे बांटने के आरोप लगे थे. तभी 1990 के लगभग ही देश के अनेक बडे़ अखबारों ने एक नई प्रवृत्ति शुरू की. मार्केटिंग, सर्कुलेशन के आधार पर विज्ञापन बटोरने का काम शुरू हुआ. अनेक अखबारों में प्रबंधन के प्रभावी होने से संपादकीय नैतिकता, मूल्यों और संस्कारों में क्षरण हुआ. लाभ की बंदरबांट में टीवी चैनलों की भी बाढ़ आ गई. इसके असर में कंटेंट का कलेवर भी बदला. लेकिन कोई ताज्जुब नहीं कि अब इन खुलासों के बाद नई बहस मीडिया के मूल्य, कंटेंट और सरोकारों की शुरू हो. मर्डोक ने तो जैसा बोया था वैसा काटा भी और वहां आगे और भी गुल खिलने हैं. लेकिन यह भारतीय पत्रकारिता के हित में ही होगा यदि यहां मीडिया के मूल्यों को लेकर नई चर्चा शुरू हो, जिसमें भारतीय प्रेस परिषद को मजबूत करने की पहल हो, तो साथ ही भारतीय लोकतंत्र की प्राणवायु- यानी चौथे खंभे और उसकी कलम के मूल्य-संस्कारों को ऊर्जाकृत करने पर भी विचार हो.

गिरीशजीलेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा 'लोकमत समाचार' में प्रकाशित हो चुका है. गिरीशजी से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


AddThis
Comments (0)Add Comment

Write comment

busy