इंदिरा गांधी के यहां से कोई पूछने तो आएगा नहीं

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बात काफी पुरानी है। एक राजनीतिक दल के नेता जो आजमगढ़ के लीडराबाद (कचहरी के पास का स्थान जहां स्थानीय नेता टाइप के लोग इकठ्ठा रहते हैं)  के श्री राम होटल से साथियों के साथ चाय पीकर बाहर आ रहे थे, पहले से तैयार एक प्रेस विज्ञप्ति पाकेट से निकाली और मुझे पकड़ा दी। उसे विनम्र भाव से छापने के लिए कहा।

विज्ञप्ति में श्रीमती इन्दिरा गांधी से प्रधानमंत्री पद छोड़ने की मांग की गयी थी। '' प्रधान मंत्री पद छोड़ने की मांग तो आपके दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष या किसी बड़े नेता को करना चाहिए तब पाठक गंभीरता से लेते'' , मैंने कहा। उस वक्त दैनिक 'आज'  में दो पंक्ति समाचार छपने की बात ही कुछ और थी। मैंने आगे बढ़ते उनको सलाह दी कि यहां के विधायक, सांसद जनता से किए गए वादे की अनदेखी कर रहें हों तो उन मुद्दों को उठाइए। सरकारी दफ्तर तहसील से ब्लाक तक समाज कल्याण, शिक्षा विभाग, ठेके देने वाले विभाग जहां लूट मची है, वहां की खबरें कोशिश करके निकालिए तो खूब बढ़ियां से छपेंगी। इसमें आप मेरी मदद कर देंगे और आपका भी नाम होगा। बातचीत चल ही रही थी इसी बीच उनके ही साथी ने तपाक से कहा कि आप ऐसी राय दे रहे हैं कि उसको करने पर दूसरे दिन ये अस्पताल में भर्ती मिलें। इन्दिरा गांधी के यहां से तो कोई उनके बयान को पूछने नहीं आएगा।

इधर दो-तीन दशक से स्थानीय स्तर की समस्याओं को लेकर आन्दोलन, प्रदर्शन लगभग बंद हो चुके हैं अब यह सब दल के नेताओं के उपर है कि कब वह सभी जिला मुख्यालयों पर धरना-प्रदर्शन करने का निर्देश देते हैं। अब संघर्ष के नाम पर केवल औपचारिकता रह गयी है। महात्मा गांधी ने राजनीति को जनसेवा का सशक्त माध्यम माना था। उस दौर में जो आए वही वास्तव में जन नेता थे। 70 के दशक  तक देखा जाता रहा कि विरोधी दल आम जन की समस्या, जिस भी सरकारी विभाग या थाना कोतवाली को लेकर रही हो वहीं डेरा डाल देते और जम कर विभागों और थानों के सामने भाषण करते तब जनता का हौसला बढ़ता था, उसको लगता था इतने लोग उसके साथ हैं। अब वो सब बीते दिनों की बातें हों चुकी हैं।

पहले किसी दल के नेतृत्व की औकात नहीं थी कि पार्टी के स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी करके विधान सभा या संसद का टिकट दे दे। जिला कमेटियों की संस्तुति जरूरी होती रही। अब तीन दशकों से लोग आकाश मार्ग से टिकट लेकर चले आ रहे हैं। क्षेत्र के हिसाब से बिरादरी, उसकी माली हालत, दबंगई में औकात अब उम्मीदवार की योग्यता मानी जाती है। उसकी पृष्‍ठ भूमि का मतलब नहीं रह गया। यही सब कारण है कि विचारों से लैश लाई चना चबाकर रात दिन खटने वाले कार्यकर्ताओं का सभी दलों में लोप हो चुका है।

सरकार या उसके अधिकारी कितना भी डींग हांकें सरकारी ठेकों पर जनप्रतिनिधियों का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नियंत्रण चल रहा है। सड़क एक बरसात झेल ले तो बड़ी बात। सरकारी भवनों के बनते देर नहीं प्लास्टर उखड़ने शुरू हो जाते हैं। बच्चों के मध्यान्ह भोजन रजिस्टर पर दर्ज संख्या पर ही बनते हैं चाहे बच्चे आवें आधा ही। खुद कई अध्यापकों ने बताया कि 15 से 20 प्रतिशत अध्यापक स्कूल जाते ही नहीं। कोई दूसरे शहर में अच्छी नौकरी के लिए कोचिंग कर रहा है तो कोई दूसरा धंन्धा। विडम्बना यह है कि कार्रवाई उन्हीं को करना है जो उनसे महीना लेते हैं।

आम आदमी का दिल टूट तो चुका है लेकिन उसके पास चारा क्या है। चारों ओर दलदल ही दलदल है परंतु चुप बैठने से तो दर्द बढ़ता ही रहेगा। ऐसे में अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों ने सशक्त जन लोकपाल की मांग को लेकर जो राष्ट्रवापी आन्दोलन छेड़ रखा है वह घनघोर अन्धेरे में एक जलता दिया है। इसी बहाने आमजन यदि जग गया, जाति बिरादरी धर्म मजहब से उपर उठके सड़ी गली व्यवस्था के विरूद्ध सड़क पर आ सका तो देश समाज का भला होगा नहीं तो देश के भ्रष्ट बेईमान नेता उसी तरह नहीं बल्कि पहले से अधिक लूटेंगे। ध्यान रखने की बात है भ्रष्‍टाचार के जिन-जिन मामलों की जांच हो रही है,  वह सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती का परिणाम है सरकार का नहीं। यह आम जन के हित में है कि पकड़ में आए लोग अब एक दूसरे पर आरोप लगाने लगे हैं। वर्तमान में अन्ना के आन्दोलन के बहाने हम पूरी व्यवस्था बदलने की ओर बढ़ सकते हैं। लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है मनमोहन सिंह और कपिल सिब्बल नहीं।

जनता को यह हकीकत भी जान लेना चाहिए कि समाचार पत्र चैनल या तो पूंजीपतियों के हैं या किसी राजनीतिक दल से उपकृत हैं। आज के सम्पादक भूल गए हैं कि अखबार पाठक के लिए छपते हैं न कि सरकार, उसके मालिक और पत्रकारों के लिए। अखबार मालिकान और सम्पादक जिले और गावों में फैले संवाददाताओं का जिस तरह शोषण कर रहे हैं, वैसा जमीनदार भी किसानों के साथ नहीं करते थे। पाठकों के हित की बात कम छपती है। लेकिन जिस दिन किसी अखबार को पाठक लेना कम कर देंगे या बन्द कर देंगे उसे एक कौड़ी का विज्ञापन न तो सरकार देगी और न ही कम्पनियां और उसी दिन वहां ताला लटक जाएगा। यही बात चैनलों के साथ भी है। यहां यह बात समझने की है कि शायद ही किसी समाचार पत्र ने अब तक अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों शांतिभूषण, अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांन्त भूषण द्वारा जन लोक पाल पर प्रस्तुत किए गए मसौदे को पूरा का पूरा छापा हो। ऐसा क्यों यह पाठक के समझने की बात है।

लेखक बनवारी लाल जालान वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा लम्‍बे समय तक दैनिक 'आज' से जुड़े रहे हैं.


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Comments (2)Add Comment
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written by MG Singh, August 07, 2011
I agree with you. Today's politicians are not concerned with the welfare of people, leave aside the country. There is an open loot. Lokpal Bill has become a jokepal. A country like Namibia in Africa, which got libarated in 1990s, got it Ombudsman within a month. All the least corrupt nations in the world have s very strong Ombudsman( Lokpal) system in place. In the present scenario, the only answer is to support Anna'a movement. this is the chance India can not miss.
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written by pramodkumar.muz.bihar, August 05, 2011
sir,janta ki samasyaon ko uthana bite dinon ki bat hai.jab se sansad vidhayak vikas yojana suru hui rajnitik karyakarta thekedar ban gaye.rajnitik karyakarta jab thekedar ban jayega to sawabhik rup se usaki tejaswita samapt ho jayegi.kisi bhi vichardhara ke sansad hon unakke yahan karyakarta se jyada yojana ka paisa prapt karane walon ki bhir rahati hai.yah bheer tab tak rahati hai jab tak aap sansad yavidhayak hain.bihar me ab yah yojana band ho gayee hai ab thekedar gayab ho gaye hain rajnitik karyakartaon ki sakriyata ab badha gayee hai.ab karyakarta vidhayakon par hawi hain.bihar me yah sthiti ban rahi hai.

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