''लिखो ऐसा कि रिक्शा चालक भी समझ जाए''

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श्रीकांतभड़ास के सम्मानित पाठकों, भले ही प्रस्तुत आलेख के शीषर्क में सस्तेपन का तड़का लगा हो, लेकिन परोसे गए रोचक कंटेंट से आपको खासकर कलमकारों को नए तेवर में लेखन का एक बेहतर आइडिया मिल सकता है. ऐसा मेरा मानना है. यदि अच्छा लगे तो प्रतिक्रिया जरूर दीजिएगा.

बात 2006 की है,  तब हिन्दुस्तान फीचर डेस्क, पटना में अवधेश प्रीत की पाठशाला का छात्र था (इसका जिक्र पहले भी ''शर्म करो! 'नियत' नहीं 'नीयत' होगा सुदर्शन न्यूज वालों''  में कर चुका हूं). मैंने अखबार के लिए एक फीचर लिखा और उन्हें दिखाया. फीचर में लिखे दो शब्दों पर उन्होंने कड़ी आपत्ति जताई. इस में पहली पंक्ति 'उनकी शिक्षा-दीक्षा गांव में ही संपन्न हुई' और दूसरी पंक्ति 'उनका स्थानांतरण पटना हो गया' था. इसी को लेकर श्री प्रीत ने जोर की डांट लगाते हुए कहा, यार बार-बार मना करता हूं लेखन में तत्सम या क्लिष्ट शब्दों के प्रयोग को लेकर. समझते क्यों नहीं तुम एक पत्रकार हो, न कि शब्दों के आडंबर से विद्धता झाड़ने वाले साहित्यकार.

उन्होंने कहा, ''अखबार आमजनों की भाषा में उनकी आवाज है. हम वैसे सरल शब्दों को क्यों ना लिखें जिसे रिक्शा चालक या पांचवीं पास भी आसानी से समझ जाए. यदि तुम 'संपन्न हुई' की जगह 'पूरी हुई' व 'स्थानांतरण' के बदले 'तबादला' लिखते तो कितना अच्छा होता!''  कहना चाहूंगा कि यह नसीहत सुनकर मुझे बड़ी कोफ्त महसूस हुई और कुंठित हो गया. क्योंकि पुराने ढ़र्रे को छोड़कर नई चीजें अपनाना किसी को भी बेहद मुश्किल लगता है. और यह मनुष्य की सहज प्रवृति है.

मैं मन ही मन सोचने लगा कि जब भी कुछ अच्छा करके लाओ, सर उसमें कोई न कोई खामी ढूंढ़ ही लेते हैं. फिर मैं ने डरते-डरते पूछा, ''लेकिन सर...इससे तो लेखन का स्तर गिर जाएगा.''  इस पर श्री प्रीत ने कहा, ''सरल शब्दों के प्रयोग का मेरा आशय भाषा के सस्तेपन से नहीं है. लिखते वक्त इसका खास ख्याल रखो कि एक ही शब्द का दोहराव न हो, ताकि लेखन में नयापन, रचनात्मकता व रोचकता की चाशनी बरकरार रहे. कुछ ऐसा कि पाठक एक बार पढ़ना शुरू करे तो उसकी नजर अंतिम पैराग्राफ पर ही ठहरे.''  धीरे-धीरे मैंने इन चीजों को अपने लेखन में अपना लिया और मुझे मजा आने लगा. आज युवाओं के हाट लेखक चेतन भगत के अंग्रेजी उपन्यासों से लेकर नंदन, कादांबनी, सरिता, हंस इत्यादि तमाम पत्र-पत्रिकाओं में यह बदलाव देखा जा सकता है.

लेखक श्रीकांत सौरभ पूर्वी चंपारण में पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


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Comments (5)Add Comment
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written by Sunil Singh Chhattisgarh, August 13, 2011
Sriman
Prashant ji.
Ek sawal hai aapse...
Patrakarita me sabse kathin karya kya hai?
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written by prashant kumaar, August 02, 2011
Lo kar lo baat. Apne Bihar mein ek kahawat hai---Mile Ke Mand Na Aur Beta Khoje Taadi. Are yaar after reading ur write up I have just started scratching my balls. Kyun Hindi ki itni tauheen kar rahe ho mere bhai. Saare rickshaw wallhe aur thela wallhe "Sampann aur Sthanantaran" ki meaning jante hain. Hum patrakaron ki saali jaat hi aisi hai ki jahan phata dekha apni taang ada di. Hindi likha to Urdu kar do aur Urdu likha to kahte hai zyada Mirza Gaalib mat bane. Chalo ab tum hi batao ki ek richshaw wallah apne bete ki shaadi ke card mein agar yah chapwata hai ki --saare vaivahik karyakram hamare niwaas sthan par hi sampann honge-- to kya yeh uske hi samajh ke bahar ki baat hogi aur thela wallahe se agar koi vyakti yeh kahta hai ki---hamare sthanantaran ka samaan dhona hai to kya thela wallah munh baa dega? Yeh sab tum jase logon ke liye hi fit baitha hai ki --Nauwa khoje ...... mein baal.Amitabh Bachchan Ji ki klisht Hindi saare log samajhte hain to kya newspaper ki baat nahi samjheinge?
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written by pankaj srivastava, August 02, 2011
bhai, sahi kaha 2 ya 3 Rs m dekar kya koi gunah karta hai ki vo sabdo k jaal m hi ulagh kar rah jaye.
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written by RAJKUMAR SAHU JANJGIR CHHATTISGARH, August 01, 2011
baat bilkul sahi hai, kyonki patrakarita mein har pathak varg sahitya ka jaankar nahin hota. aise mein koshish saral shabdon ka prayog hona chahiye. kyonki sahitya aur patrakarita mein antar hai. ye alag baat hai ki sahitya tatha patrakarita ko ek-dusre ka purak kaha jata hai, magar aapa-dhapi mein akhbaaron ko padha jaata hai. is sthiti mein shabdon ke upyog par dhyaan jaruri hai. is baat ko har patrakar aur lekhak ko dhyaan dena chahiye. badhaai, saurabh ji, is lekh ke liye.
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written by nitu, August 01, 2011
yes sir I agree with u.Waise mai bhi apne lekhan me kathin sabdo ka prayog karti hun,mera bhi lekhan ke mamle me yahi soch thi ki saral sabdo ke upyog se bhasa me girawat aati hai.lekin ye bhi sach hai ki hum aam janta ki awaj hain to........hume bhi kampadhe likhe logo ka dhyan rakhna chahiye.

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