करोड़ों रुपये हर माह सेलरी पाने वाले इन भारतीय मालिकों को क्या कहें?

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आप सबने खबर पढ़ी होगी. भारती एयरटेल के मालिक सुनील मित्तल की सेलरी 70 करोड़ रुपये सालाना तय कर दी गई है. माने, महीने में साढ़े पांच करोड़ रुपये के आसपास वे सेलरी उठाएंगे. जरा सोचिए, साढ़ें पांच लाख नहीं, साढ़े पांच करोड़ रुपये प्रति महीने सेलरी वे पाएंगे. और, अपनी मीडिया इंडस्ट्री में पत्रकारिता की शुरुआत करने वाला कोई होनहार अगर महीने में साढ़े पांच हजार रुपये तनख्वाह पर कहीं रख लिया जाता है तो अपने करियर की शुरुआत को सफल मानता है.

माना कि सुनील मित्तल मालिक हैं, इसलिए किसी एक ट्रेनी, या प्रशिक्षु या छात्र से उनकी तुलना नहीं की जा सकती. पर उन्हें यह भी तो हक नहीं है कि वे हर महीने साढ़े पांच करोड़ रुपये सेलरी लें. भले अपना भारतीय कानून उन्हें यह सेलरी पैकेज लेने को एलाऊ करता हो, पर किसी आम भारतीय का दिल कभी नहीं कहेगा कि इस देश का कोई एक बंदा हर महीने साढ़े पांच करोड़ रुपये सेलरी पाए. बात सिर्फ मित्तल की नहीं है. आप गुप्ताज, अग्रवाल्स, जैन्स आदि को ले लें. ये लोग जो अखबार मालिक हैं और इन दिनों मीडिया इंडस्ट्री पर राज करते हैं.

टाइम्स आफ इंडिया समूह के जो मालिकान जैन बंधु हैं, उनकी तनख्वाह पता करिए कितनी है. दैनिक भास्कर के मालिकन जो अग्रवाल्स हैं, उनकी पता करिए सेलरी कितनी है. दैनिक जागरण के मालिकान जो गुप्ताज हैं, पता करिए उनकी सेलरी कितनी है. लाखों-करोड़ों रुपये सेलरी उठाने वाले ये मालिकान किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होते. वे जाते हैं दूर प्रदेश किसी मंदिर में दर्शन करने, सपरिवार, और बना लेते हैं आफिसियल टूर. पर कोई बेचारा उनका कर्मी अगर छुट्टी मांग ले तो देखा जाता है कि वह कहीं झूठ बोलकर तो छुट्टी नहीं ले रहा. और ज्यादा दिन छुट्टी पर रह गया तो उसकी फाइनल छुट्टी करने की तैयारी कर ली जाती है. इन्हीं मीडिया मालिकों की नानी मर रही है अपने कर्मियों को वेजबोर्ड के हिसाब से सेलरी देने में. पर खुद वे इतनी ज्यादा तनख्वाह लेते हैं कि हम आप इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते.

इस देश में जो दो देश तेजी से बनते जा रहे हैं और दोनों देशों के बीच खाई बढ़ती जा रही है, वह दिन दूर नहीं जब गांव-देहात के लोग पगलाकर शहरों पर धावा बोलेंगे और इन धन्ना सेठों की तिजोरियों से धन निकालकर बांटना शुरू कर देंगे. यह जो सिस्टम है, फौज फाटा है, पुलिस है, व्यवस्था है, इस तरह निर्मित है कि यह सब अंततः आम आदमी के खिलाफ और धन्ना सेठों के पक्ष में खड़ा होता है. पर व्यवस्था बहुत दिनों तक आम जन की बोलती नहीं बद कर सकता. दुनिया का इतिहास गवाह है कि लुटेरों को एक दिन भगोड़ा बनना पड़ता है और इन करोड़ों रुपये पाने वाले मालिकों को अगर हम लोग लुटेरा कहें तो कतई गलत नहीं होगा.

लूट-खसोट और भ्रष्टाचार के कारण देश में आम जन का जीना मुहाल है. महंगाई चरम पर है. नेता, नौकरशाह, कारपोरेट घरानों के स्वामी मजे ले रहे हैं. सब पैसे बटोरने में लगे हुए हैं. जनता मरे तो मरे. पता नहीं आप लोगों का खून खौलता है या नहीं पर मुझे तो लगता है कि एक बार फिर से आंदोलनों का दौर शुरू करने की जरूरत है जो व्यवस्था को पंगु कर दे, सब कुछ ठप कर दे, धन्ना सेठों को सबक सिखाए और भ्रष्टाचारियों को चौराहों पर फांसी पर लटका दे. अन्ना के आंदोलन से बहुत उम्मीद तो नहीं की जा सकती है लेकिन इस आंदोलन के जरिए देश के सिस्टम को दिखाया जा सकता है कि उबे, सताए और बेचारे लोग अपने हक के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.

आप लोगों से अपील है कि मीडिया के मालिकों की असली तनख्वाह पता करके उसे नीचे कमेंट के रूप में प्रकाशित करें या फिर This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर भेजें ताकि इन बेशर्म मीडिया मालिकों को बताया जा सके कि तुम जो अपने कर्मियों का खून पी रहे हो, वह ठीक नहीं है. अगर पैसे हैं तो सबको दो, खुद काहें को छुपकर घी पी रहे हो और दूसरों को भुखमरी का शिकार बनाकर रखना चाहते हो. जो मी़डिया कंपनियां लिस्टेड हैं, सेबी में, उनके निदेशकों की तनख्वाह संभवतः सेबी की साइट पर मिल जाए. थोड़ी छानबीन की जरूरत है. उम्मीद है कोई न कोई बहादुर इस काम को जरूर करेगा कि वह मीडिया के मालिकों की तनख्वाह के डिटेल निकालकर पब्लिक डोमेन में डालेगा.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

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Comments (7)Add Comment
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written by S GAUTAM, August 05, 2011
Maaliko ke kuch chamchon ne bhi comment kiya hai.Saalon ki gaand Jal gai.
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written by Dr. Vishnu Rajgadia, August 03, 2011
अगर एक कंपनी के मालिक की सैलरी सालाना 70 करोड़ हो सकती है तो एक अखबार के चपरासी को 45 हजार और वाहन चालक को 55 हजार क्यों ना मिले? अगर जनता को बेहतर लोकतंत्र और पत्रकारों को बेहतर जिंदगी चाहिए तो मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार चपरासी को 45 हजार और वाहन चालक को 55 हजार देने की मांग पर ही जोर देना चाहिए। कारण कि इसी को अखबार मालिकों ने विज्ञापन का विषय बनाया है। हम भी इसी पर जोर दें।
जैसे को तैसा। जहर को जहर काटेगा।
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written by Ankit Khandelwal, August 03, 2011
is lekh ka matlab kya hain?? Aaoko yeah nahi dikhta ki inhi businessman ne laakhon logo ko rojgar diya hua hain.. pehli baar lag reha hain... ki bhadas4media apne mool lakshya se bhatkar vahi baajari channels ki rah per chal nikala hain.. jinka sirf ek hi kaam hota hain.. negative soch ko aage lana.. achi cheezon ko ignore karna..
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written by Ravi Kumar, August 03, 2011
मुझे भी एक अदद नौकरी की तलाश है अब चाहे वह 5000 की हो या 50000000 की हो। जिस दिन मिलेगी उस दिन का पता नहीं कैसे स्वागत करूंगा। इतना ही कह सकता हूं बहुत खुशी जरूर होगी और मेरे शुभचिंतकों को भी।
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written by R^ahul, August 03, 2011
Pagal Ho Gaya Hai..... Mujhe Samajh main Nahi aata hai.. Inhen JALAN kyo ho rahi.... Vo Malik Hai... Hum Apani Tulna Usase Kaise Kar rahe hai... Yeshwant aap bhi aapana Khud kas Business Start kijiye.. Karodo-arabo Rupaya Lagayen.... Aur Lijiye Salary...

Aap Un Logo main se Hai... Jo Khud ke dukh se Dukhi Nahi Hote.. Balki Dusare ke SUKH se Dukhi hote Hai....
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written by R. Rana, August 03, 2011
Sir,

I applaud it. A very good analysis. Almost everywhere, be it is Media(Print Houses) or offices, there is (so called) catatorization.......? Once u r holding position, then u r entitled for each N every benefit. Norms & Rules can be flexible for such people and evev they can get the benefit of deviation. But at the same time Aam Aadmi can't xpect for any relaxtion, be he is in much need. He might get a prompt reply that u don't deserve for it, keep mum.

What would be the future of L'pal...? Who cares the interest of Daily Labourers N street vendors ? How can they manage the rising prices of the commodities? This is a complete exposure of corrupt system.

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written by Aneeta, August 03, 2011
Vakai, maine bhi apne carrier ki shuruaat 3000 ki naukri se ki thi. aur main bahut khush thu job pakar.

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