राहुल गांधी नहीं मधु लिमये को याद कीजिए

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आज जब सोनिया गांधी की बीमारी के बरक्स राहुल गांधी की ताजपोशी की खबर मीडिया, खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में धुआंधार तरीके से चलाई जा रही तो बरबस मधु लिमये याद आ गए। सन 1985 में मधु लिमये एकमात्र आवाज थे जिन्होंने दल बदल विरोध कानून का विरोध किया था। उस वक्त बिल के समर्थकों ने यही दलील थी कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के लगातार दल बदल से संविधान की मूल आत्मा की हत्या हो रही है...एक ऐसी राजनैतिक अपसंस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है जो सिर्फ और सिर्फ सत्ता को लक्ष्य में रखकर काम करती है।

जिस में सांसदों या विधायकों की खरीद-फरोख्त हो रही है। देश के मतदाताओं के साथ धोखा हो रहा है, किसी दल या व्यक्ति विशेष को मत के मार्फत अपना समर्थन देता है देश का मतदाता। यह एक ऐसा आवरण था, दलीलों की ऐसी श्रृंखला थी जिसकी बुनियाद में बार-बार संविधान की मूल आत्मा का प्रश्न उच्चारित हो रहा था।

आखिर में वही हुआ, सत्ता का बहुमत जिसके पक्ष में था। संविधान में 52वां संशोधन कर दल बदल के विरोध में कानून पारित कर दिया गया। नतीजा क्या हुआ? सियासी दलों से लुप्त आंतरिक लोकतंत्र क्या संविधान की रूह की हिफाजत कर पा रहा है? क्या सियासी दलों में कुनबों और परिवारों का वर्चस्व लोकतंत्र के हित में है? सौ में 66 आवाज उठाएं तो बात बने वरना गए काम से। ना तौ नौ मन तेल होती है और ना ही राधा नाचती है। नतीजतन, दलों में कुनबों या परिवार की वर्चस्व स्थापित हो चुका है। शायद ही कोई दल इस से बरी है।

भले आरोप सत्ता में रहने की वजह से कांग्रेस पर ज्यादा चस्पा हो पर क्या समाजवादी पार्टी या दूसरा कोई दल, दल में आंतरिक लोकतंत्र का दावा कर सकता है। क्या भारतीय जनता पार्टी यकीनी तौर पर कह सकती है कि उसके नेतृत्व के फैसले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई दखल नहीं रहता? क्या नीतीश कुमार स्वीकार करेंगे कि जनता दल यूनाइटेड को बिहार में अपने मर्जी से नहीं हांक रहे? मुखालिफ आवाज को बाहर का रास्ता नहीं दिखा रहे हैं? आज हर पार्टी में एक गैरमौजूद शक्ति हुक्म चलाती है, जिसे आला कमान कहा जाता है। जो पार्टी के पदाधिकारियों से लेकर हर फैसलों पर मुहर लगाता है, मर्जी चलाता है।

आज राहुल गांधी के बहाने देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया फिर से एक बड़े सवाल का सतही हल तलाशने की कोशिश में जुटा हुआ है। बेवजह चीख रहा है। हालांकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि 1985 में तो दूरदर्शन का सेटेलाइट वर्सन भी महज तीन साल का था। पर बुजुर्ग पत्रकारों को क्या हो गया है? जो चैनल्स के रहनुमा बने हुए हैं। राहुल गांधी को लेकर हायतौबा इसी बात को लेकर है क्या यह कवायद राहुल बाबा की सियासी जमीन को अंदाजने की पहल भर है?

अलबत्ता तो राहुल गांधी को लेकर सवाल इस वक्त तो कम से कम नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वक्त बेहद नाजुक है। सवाल तो यह है कि इतिहास के भ्रमों से कब देश का मीडिया बाहर निकलेगा? कब समझेगा अपनी जिम्मेदारी को? यदि सवाल उठाया भी जाना चाहिए तो सवाल ये हो कि क्यों सियासी दलों में किसी परिवार, व्यक्ति या कुनबे का वर्चस्व स्थापित हो चुका है? क्या यह वक्त एक बार फिर से मधु लिमये की आवाज को उठाने का नहीं है? क्यों ना बात की जाए, दल बदल कानून से देश में लोकतंत्र ने क्या पाया और क्या खोया?

लेखक सुमंत भट्टाचार्य न्‍यूज एक्‍सप्रेस चैनल में एक्‍जीक्‍यूटिव प्रोड्यूसर हैं.


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Comments (1)Add Comment
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written by Anil Pande, August 06, 2011
राजमाता सोनिया गाँधी को क्या भारत के डाक्टरों पर भरोसा नहीं था ? क्या भारत में उनका इलाज नहीं हो सकता था ?

मतलब , अब भी इस देश के डाक्टरों पर भरोसा नहीं किया जा सकता .

UPA अध्यक्ष को अपनी बीमारी देश को बताने में क्या तकलीफ थी ?

सार्वजनिक पद पर रहने वाली इतालवी मूल की इस महिला को इतनी गोपनीयता की आवश्यकता क्यों पड़ रही है ?

क्यों सोनिया गाँधी को अब भी भारतवासियों पर विश्वास नहीं हो रहा है ?

२८ फ़रवरी १९३६ को switzerland के लोकार्नो में नेहरु जी की पत्नी कमला नेहरु पंडित की टीबी से मौत हुई. उनके इलाज के बारे में पूरा देश जानता था .

धन्य हैं वो लोग जो उनके स्वास्थ्य की कामना किये जा रहे हैं , जिन्हें पता नहीं कि सोनिया जी को हुआ क्या है .

महान हैं इस देश के अख़बार और चैनल चलाने वाले, जो इन सवालों को नज़रंदाज़ कर "अन्दर की खबर दिखाने" का ढोल पिटते रहते हैं .

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