...और उस लड़की ने रोते हुए जर्नलिज्‍म छोड़ दिया

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सर...एक आप ही हैं जिन्हों ने मुझे इस दलदल से बाहर निकालने में मदद की, वरना मैं तो इसमें धंसती ही चली जा रही थी। चार साल हो गए सर लेकिन मेरी इंक्रीमेंट तो छोड़ो आने-जाने तक का नहीं दिया जाता...चार साल में चार जगह रही पर सभी जगह हालात एक जैसे हैं...इतनी पॉलिटिक्स होती है कि मैं बयां नहीं कर सकती...शुक्र है कि आपने मेरी मदद की और अब मैं शायद अच्छी और सुकून वाली ज़िदगी गुज़ार सकूंगी.

एक ही सांस में न जाने कितनी बात बोल गई वो और उतनी बार शुक्रिया अदा भी किया, उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट के साथ-साथ मीडिया और इससे जुड़े लोगों से मिली कड़वाहट साफ़ नज़र आ रही थी। जितना दुख उसे इस फील्ड को अलविदा कहने का हो रहा था उतनी ही खुशी उसे अपने भविष्य को लेकर हो रही थी। पिछले साल ही वो यहां काम करने आई थी...एक साथ पूरा प्रोग्राम संभालने के साथ कई दूसरे काम में भी महारत हासिल थी उसे... मेहनती और काम को लेकर जुनूनी भी... कभी-कभी काम को लेकर सीनियरों से भी भिड़ जाती...उसे देखकर लगता था कि वो अपनी ज़िदगी में एक अच्छी जर्नलिस्ट साबित होगी.

मुझसे मिलती तो हमेशा सुख-दुख की बात किया करती न जाने क्यों अक्सर मुझे चाय पिलाने के बहाने अपनी बातें और प्रोग्राम को और बेहतर करने से लेकर अंदरखाने की पालिटिक्स के बारे में बतियाया करती... वक्त गुज़र रहा था लेकिन कहीं न कहीं उसे अंदर से एक डर सताता रहता था, और वो डर था कभी भी नौकरी से निकाले जाने का... लड़की जात होने और घर से दूर होने की वजह से भी कभी-कभी सीनियरों के कहे मुताबिक़ काम करती मग़र उसी रोज़ बैचेन भी हो जाती थी... उसकी बैचेनी का असर उसके चेहरे पर साफ़ पढ़ा जाता था.

सर पता है कल मेरी शिकायत कर दी किसी ने एडिटर से... और एडिटर बिना सच्चाई जाने मुझे काफ़ी सुना रहा था... सर चार साल हो गए हैं मुझे काम करते हुए... क्या बुरा है और क्या भले मैं भी समझने लगी हूं... पर समझ नहीं पा रही हूं कि अच्छा काम करने पर कुछ लोगों को जलन किस बात की होती है... मैं चुपचाप हैरान उसकी बातों को सुन रहा था... उसकी बातों में मुझे अपना अक्स नज़र आ रहा था... कभी मैं भी... पर आज हालात ने मुझे कितना बदल दिया मेरे सामने कुछ भी हो जाऐ मुझे कुछ असर जैसे होता ही नहीं...हैलो...सर कहां खो गए आप...कहीं नहीं...हां...बताओ..सर मेरा पैसा बढ़ाया नहीं अभी तक जब मैं जॉब पे आई थी तो कहा गया था कि जल्द ही पैसा बढ़ा दिया जाएगा मग़र अभी तक कोई रिस्पांस नहीं मिला बस आश्वासन ही मिल रहा है.

अरे कैसी हो इतनी उदास क्यों हो क्या हुआ...चलो चाय पीने चलते हैं... नहीं सर मेरा मन नहीं है... अरे चलो तो सही... मुझे कुछ बात करनी है तुमसे... बुझे मन से मेरा दिल रखने के लिए चाय की दुकान तक आ गई वो मग़र आज चाय जैसे उसे ज़हर लग रही हो... अरे क्या हुआ... कुछ बताओ तो सही... सर मैंने जर्नलिज्म छोड़ने का फैसला कर लिया है... पर क्यों... नहीं सर मुझे लगता है कि मैं आगे नहीं बढ़ पाउंगी... जिस सोच को लेकर मैने इस फील्ड में क़दम रखा था... वो शायद कभी पूरी नहीं हो पाएगी... आप चाहे जितना भी अच्छा काम कर लो... यहां के लोग आपको जीने नहीं देंगे... और रही सही कसर पूरी कर देते हैं वो लोग जो दिन भर सीनियरों के तलवे चाटकर अपनी नौकरी बचाने में लगे रहते हैं.

मैं हैरान उसे देखता रह गया... जो लड़की जर्नलिज्म के लिए मरने-मिटने को तैयार रहती थी वो ऐसा फैसला क्यों ले रही है... क्या ये मेरे लिए संकेत तो नहीं... क्योंकि मुझे भी अंदर से ये इसकी कड़वी सच्चाई और नंगेपन के बारे में मालूम है... आख़िर इन सात सालों में क्या हासिल कर पाया मैं... क्या मैं भी सीनियरों के तलवे चाटूं या फिर गंदी पालिटिक्स शुरु कर दूं... मग़र ये तो मेरी फ़ितरत नहीं... अंदर से सहम गया मैं... सर एक बात और है इस फील्ड में... आप चौबीसों घंटे तनाव में जीते हैं... क्या फ़ायदा ऐसी नौकरी का... कभी छुट्टी लेने का मन हो तो नहीं मिलती... संडे को जब दुनिया आराम और इंज्वाय करती है तो हमें उस दिन भी काम करना होता है... मैं तो ठान चुकी हूं सर... बहुत हो गया... उब चुकी हूं मैं... क्या सोचकर आई थी मैं... पर कितना... उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे.

लेखक इंतिखाब आलम अंसारी नोएडा में टीवी पत्रकार हैं.


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Comments (12)Add Comment
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written by Anoop Gupta, September 01, 2011
Print me to ladko ke liye jagah chhod dijiye.. electronic par to kabja ho gaya..
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written by इंतिख़ाब आलम अंसारी, August 25, 2011
मेरे प्यारे दोस्तों और साथियों, मेरे इस लेख को पढ़ने और उस पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए आपका धन्यवाद...ऐसा नहीं है कि इस पेशे में कोई बुराई है या मैं इसे बुरा कहता हूं...जो कुछ भी मेरे आगे गुज़रता है मैं उसे आपसे शेयर कर देता हूं...दोस्तों अगर ये पेशा बुरा होता तो मैं इसमें कभी नहीं आता,मग़र जब मैं इसमें आ ही गया हूं तो हार नहीं मानुंगा...मुझे मालुम है कि आज पत्रकारिता की कई नई-नई दुकानें रोज़ खुल रहीं हैं और दुकानों के बनिए कैसे भी हो पैसा बनाने का खेल खेल रहे हैं लेकिन पत्रकार एक मदारी नहीं है जो किसी भी डुगडुगी पर नाच जाऐ और अपने सिद्धांतों से समझौता कर ले,मुझे परेशानी सिर्फ इस बात से होती है कि एक पत्रकार क्यों दूसरे पत्रकार का दर्द नहीं समझता।आज पत्रकारिता को नौकरी मानने वाले ज़्यादा परेशान हैं,जिस दिन मुझ जैसों ने इसे नौकरी न मानकर अपने कर्मक्षेत्र मान लिया उस दिन पत्रकारिता के मायने ही बदल जाऐंगे।मेरे पिछले लेख में एक महोदय ने मुझे सलाह दी थी कि मैं ब्रांड बनने की कोशिश करुं मग़र आप बेहतर जानते हैं कि आज के ब्रांड पत्रकार क्या कर रहे हैं।मुझे नहीं लगता कि ब्रांड बनने से समस्या का हल हो जाऐगा,मेरे सामने न जाने कितने लोगों ने इस फिल्ड को अलविदा कह दिया चूंकि वो नहीं चाहते थे कि उनकी ज़िदगी बर्बाद हो बस मैं यही कहुंगा कि अपने दिल की आवाज़ सुने...जब भी दिल करे पत्रकारिता की नौकरी को त्याग दें मग़र पत्रकारिता को न त्यागें दूसरी नौकरी करते हुए भी इससे जुड़े रहें लेखन करते रहें,मग़र इसको छोड़ें न...एक बार फिर आपका धन्यवाद...
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written by anshul tiwari, August 23, 2011
चार साल हो गये हैं पत्रकारिता मैं लेकिन आज भी ऐसा लगता है जैसे इस लाइन में रह के जिंदगी के खर्चे चला पाउँगा या नही.जिस जुनून के साथ इस फिल्ड में आया था धीरे धीरे खत्म हो रहा है.दिनों दिन अबसाद से घिरता जा रहा हूँ.पत्रकारिता में जिनको कुछ आता नही है वो तो उच्च पदों पर आसीन हैं और जो मेहनती और काबिल हैं उनके घर की दाल रोटी चलना मुस्किल हो रहा है.सबसे महत्वपूर्ण बात उच्च पदों पर बैठे लोग चापलूस पसंद होते है .मेहनती और काबिल इंसान तो कभी करेगा नही किसी की चापलूसी .इस लिए परेशानिया बनी रहती हैं.
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written by Shashi Ranjan Verma, August 17, 2011
media men achchhe logon ki puchh nahi hai. Waise to ise knowledge base industry kaha jata hai. Lekin yahan knowledge wale jate hain pani badane aur dalal aur chapaloos log karte hain Raj chahe unhen kuchh na yage yahi hai aaj ki media ki kahani. media men bhi kranti ke liye Kisi Anna ki Jaroorat hain hai jo media ko is gulami se azad kara sake.
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written by narottam bhasker, August 16, 2011
larki thi to rokar jarnalism chhor degi, kisi larke se shadi ho jayega apni topi uske sar. Larka kya kare agar woh imandar hai to.aap log bhadaas par is samsasya ke mul vindu ka koi ilaaj nahi karte.
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written by GhanshyamKrishana, August 16, 2011
Dhikkar Hai Media ke aise sammanney haraamkhor officers ka
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written by umang, August 16, 2011
kuch yesi hi dsha h .......media me kam krne vali ldhkiyoki jinka uche odhe pr bethe log hr pl shosdh krte h..... vo ye bhul jate h ki unke bi bhn-bethiya h.......
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written by rajesh, August 16, 2011
saala sabse bekar line hai
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written by Anil Pande, August 15, 2011
बहन रीता दास जी ,

मीडिया में काम करने वाला हर व्यक्ति "भूखा" नहीं होता.

आपने तो सारे पुरुष पत्रकारों को बुरी नीयत वाला बता दिया .

प्रिंट मीडिया में काम करने वाली कुछ औरतें भी कम खिलाड़ी नहीं हैं.

राखी सावंत भी फेल हैं उनके आगे.
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written by Raju, August 15, 2011
Media me koi achha admi nahi aana chahta hai gandi politics harmonium jagah hai.
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written by Ravi Gautam, August 15, 2011
ye hi media m kam karne walo ki sachchai h.jo log
pure junnun se aapne kam ko karte h unko kam karne nai diya jata,hm journalism ki degree lekar internship k liye nikle the tab man m sirf ye hi tha k internship k doran itnin mehnat lagan aur junoon se kam karengee k sab jan jayenge k ek intern b aapni mehnat se aapne mukam ko pa sakta h.Sachchai to ye h k jab tak aap ka ko good father, ya koi bada jugad nai h to aap kitnin h lagan aur junoon aur dedication se kam kar lo nahin jam paog.Desh m ho rahe bhrashtachar aur shoshan ko samaj k samne lane wala journalist b bhrasht logo ka samna karta h aur shoshit hota h.Agar is dauran usko koi god father mil jaye to aachcha h aur nai mile to bechara aapne sapno ko chaknachoor kr wapas aapne ghar laut jata h.kaash ye uupar bethe log hum logo ka b dukh samajhte..............
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written by rita das, August 15, 2011
print media mein mardo ka dabdaba hai...ek akhbar mein kam karke dekh liye ...abhi dusre akhbar mein hu...larki inke nazro mein entertainment ka jaria hai

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