मीडिया ही तय करे, क्‍या हो इसकी आचार संहिता?

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मीडिया की आजादी और मीडिया की आचार संहिता की बहस काफी पुरानी है। जिस पर कोई निर्णायक राय अभी तक सरकार, समाज और मीडिया में से कोई भी नही बना सका। स्व. जवाहरलाल नेहरू, प्रथम प्रधानमंत्री के कार्यकाल में उनके विरुद्ध ब्लिट्ज नामक साप्ताहिक अखबार के तत्कालीन संपादक रूसी करंजिया ने एक प्रकार का वैयक्तिक अभियान शुरू किया था। स्व. नेहरू ने करंजिया के आरोपों को लेकर न कभी कोई गंभीरता व्यक्त की न ही कोई विशेष प्रतिक्रिया व्यक्त की।

हालांकि उन्हों ने कुशल प्रबंधन अवश्‍य किया और कुछ समय पश्‍चात नेहरू और करंजिया की मुलाकात में शिकवे शिकायत दूर हो गये। उसके पश्‍चात न तो करंजिया ने अपने आरोपों को लेकर किसी कार्रवाई की चिंता की और अपने विरूद्ध उनके अनुसार झूठे आरोपों को लेकर नेहरू ने भी किसी कार्रवाई की पहल नहीं की। कुछ लोग इसे नेहरू की पत्रकारिता के प्रति आजादी के विचार का प्रमाण मानते हैं और कुछ लोग इसे सत्ता और पत्रकारिता के बीच र्स्वाथपरक रिश्‍तों की शुरुआत मानते हैं।

आजादी के पहले भी जो अखबारी मीडिया था और विषेशतः जो बड़े अखबार कहलाते थे, वे किसी न किसी उद्योगपति समूह के द्वारा ही आरंभ किये गये थे। हिन्दुस्तान बिड़ला का था तो टाइम्स ऑफ इंडिया बेनेट कोलमेन का था,  जो बाद में साहू शांतिप्रसाद जैन का हो गया। इसी प्रकार और भी अखबार थे। बिहार के पटना से प्रकाशित होने वाले दो अखबारों को दरभंगा नरेश ने आरंभ कराया था। हालांकि उस समय के अखबार आजादी के आंदोलन के अनेक कारणों से सर्मथक थे तथा अखबारों के मालिक निस्संदेह अखबारों का इस्तेमाल अपनी पूंजी और धंधे की रक्षा कवच के रूप में करते थे,  परन्तु संपादक और संवाददाता बहुत हद तक अपनी स्वतंत्रता को कायम रखते थे।

उस जमाने के बड़े अखबार भी व्यापारिक घरानों के ही थे और उनके व्यापार का ही अंग थे। परन्तु इसके साथ साथ देश में जो क्षेत्रीय अखबार निकलना आरंभ हुए थे, वे कमोवेश राष्‍ट्रीयता से ओतप्रोत थे और उन्हे मीडिया का अर्थ पूंजी की रक्षा नहीं वरन राष्‍ट्र और समाज था। आजादी के बाद ऐसे मिशनरी अखबार जिन में, महात्मा गॉंधी के यंग इंण्डिया से लेकर हरिजन तक थे, क्रमश:  समाप्त होते गये। जिन व्यक्तियों के नाम और व्यक्तित्व से ये मिशनरी अखबार चलते थे उनके ना रहने के बाद उनकी भूमिका भी बदल गई और कालांतर में उनके नये मालिक या नये संपादक भी सत्ता, संरक्षण, पूंजी संवर्धन और निजी हैसियत के निर्माण के हथियार बन गये। आज इन अखबारों का उनके पुराने गौरवमय इतिहास तथा उन महान व्यक्तियों के नाम के साथ जुड़ने लायक कार्य संबंध नही बचा।

फिर भी आजादी के बाद के तीन दशकों तक संपादकों की आजादी बहुत हद तक कायम थी। जहॉं एक तरफ अखबार के मालिक भी अखबार के दैनंदिन कामों में हस्तक्षेप नहीं करते थे, वहीं संपादक और अखबारनवीस भी अपनी आजादी और सम्मान की कीमत पर वेतन और सुविधाओं के लिये हासिल करने को तैयार नहीं थे। अनेकों अवसरों पर संपादकों ने मालिकों की इच्छाओं के विपरीत समाचारों और समाचार देने वाले संवाददाताओं के साथ खड़े होकर न केवल उनकी आजादी की रक्षा की बल्कि प्रेस की आजादी को कायम रखने के बेमिसाल उदाहरण प्रस्तुत किये। कुछ संपादकों ने तो अपनी गरिमा को इस सीमा तक कायम रखा कि वे अखबार के मालिक को भी मिलने का समय देते थे और मालिकों को भी उनसे मिलने के लिये उनके चैम्बर में समय लेकर जाना होता था।

पत्रकारिता की आजादी का यह सुखद दौर 1969 के बाद तेजी से बदलना शुरू हुआ। 1971 की श्रीमती इंदिरा गॉंधी की भारी जीत के बाद बहुत हद तक संपादकों ने अपने आपको ही बदलना शुरू कर दिया। 1975 में आपातकाल लगने के बाद और प्रेस सेंसरशिप की घोषणा के बाद अपवाद स्वरूप ही संपादक व अखबारनवीस बचे थे,  वरना मालिकों और संपादकों दोनों ने सरकार के सामने घुटने टेक दिये। 1977 में श्रीमती गॉंधी की हार एवं जनता पार्टी के आने के बाद पुनः प्रेस की आजादी की एक ताजी बयार आई थी जो 80 के बाद फिर से नये प्रकार की बीमारियों का शिकार हो गई। 1979 और उसके बाद कुछ वर्षों तक मीडिया ने जाति और पूंजीपति वर्ग के पक्ष में अभियान चलाया था। 1979 में मीडिया ने स्‍व. चौधरी चरण सिंह, मधु लिमये और राजनारायाण को जनता पार्टी के तोड़क की संज्ञा से विभूषित और आरोपित किया और मध्यवर्ग में उनके खिलाफ घृणा फैलाई परन्तु जून 1980 में जब अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्‍ण अडवाणी आदि ने पुनः जनता पार्टी से हटकर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया,  तब उन्हें किसी ने भी न तोड़क कहा और न अपमानित किया। 1988-89 के बाद भी मीडिया का यह स्वपक्षीय चरित्र कायम रहा और 1989 के बाद के खंडित जनादेशों ने उन्हें दिल्ली की सरकारों को बनाने और बिगाड़ने के गर्व से भर दिया।

पिछले दो दशकों में प्रिट मीडिया के साथ साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भारी इजाफा हुआ है और देश की बड़ी आबादी तक उसकी पहुंच हुई है। निस्संदेह प्रिंट  मीडिया का अपना महत्व और स्थान है और जो कभी समाप्त नहीं हो सकता,  परन्तु इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की पहुंच - प्रत्यक्ष प्रसारण, घटना के घटते ही चंद मिनटों में सूचना और प्रसारण की क्षमता बहुत व्यापक हुई है,  जो देश के आम आदमी को प्रभावित और प्रवाहित करने की क्षमता रखती है। मीडिया पर अब बाजार का प्रभाव बहुत अधिक है और विज्ञापनदाताओं तथा पूंजीवादी शक्तियों का प्रभाव भी। 1980-81 में बिहार में तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने प्रेस को नियंत्रित करने के लिये बिहार प्रेस बिल बनाने का प्रयास किया था,  परन्तु समूचे देश की मीडिया की ओर से उसके प्रतिकार की वजह से उन्हें उसे वापिस लेने को बाध्य होना पड़ा था। तब भी लगातार यह बात चर्चा में आई थी कि मीडिया के लिये खतरा बाहर से नहीं है। बाहरी हमले का मुकाबला मीडिया कर सकता है अगर कोई खतरा हो सकता है तो वह अपने ही भीतर से है, मीडिया के अंदर से है। जिस दिन मीडिया स्वतः अपनी आजादी को बेचने और छोड़ने को तैयार हो जायेगा वह दिन मीडिया की परतंत्रता का दिन होगा और लोकतंत्र के लिये भी खतरा होगा।

यह भी र्निविवाद है कि पिछले 2 दशकों में बड़े पैमाने पर मीडिया ने अपनी सुख सुविधाओं के लिये समझौते किये। बड़ी-बड़ी तनख्वाहों के लालच में बड़े मीडियाकर्मियों ने मालिकों के तकनीकी परिवर्तन के नाम पर छंटनी अभियान को सर्मथन दिया और अपने ही मीडिया परिजनों के रोजगार की कीमत पर अपनी सुविधाओं को बढ़ाया। इसके दो तरफा परिणाम हुए - एक तरफ मीडिया की संगठित शक्ति कम हुई और दूसरी तरफ भारी वेतन और सुविधाओं के लालच ने बड़े मीडिया कर्मियों को मन से कमजोर कर दिया तथा स्वतः अपनी आजादी को बेचने का अभ्यस्त बना दिया। इसी के परिणामस्वरूप कालांतर में मीडिया में तीन प्रकार की विकृतियॉं और पैदा हुई -

01. अतिरेकी सर्मथन और प्रचार

02. अन्यायपूर्ण उपेक्षा और

03. पैसे के बदले में समाचार

इन विकृतियों के बारे में देश में बुद्धिजीवियों, आम लोगों में तो चिंता है ही परन्तु सुखद पहलू यह है कि स्वतः मीडिया के भीतर से इसके विरूद्ध आवाज उठ रही है। चुनाव मे समाचार के बदले में पैसा,  जिसे ''पेड न्यूज''  कहा गया, के विरूद्ध भी अभियान मीडिया के भीतर से ही शुरू हुआ। मुम्बई के महानगर नामक अखबार के पुराने संपादक अनुराग चतुर्वेदी ने बिहार के बांका के चुनावों के अपने अनुभवों को डॉयरी में दर्ज किया और इसके आधार पर प्रभाश जोशी ने वाजाफ्ता पेड न्यूज के विरूद्ध अभियान शुरू किया। हालांकि यह अभियान दैनंदिन पेड न्यूज के विरूद्ध नहीं था। आज अधिकांश समाचार पत्रों में संवाददाता के स्तर पर एक प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष दैनंदिन पेड न्यूज का चलन चल रहा है। कुछ समाचार पत्रों के मालिकों ने तो अपने अखबारों में फोटो छापने के दाम तय कर दिये हैं। संवाददाताओं को तनख्वाह देने की बजाय विज्ञापनों की आय में से कुछ प्रतिशत कमीशन दिया जाता है।

जाहिर है कि जब संवाददाता या संपादक या ब्यूरो चीफ को विज्ञापनों के लिये घूमना होगा तो इसका प्रभाव उनके समाचार और लेखन पर पड़ेगा। जो पत्रकार विज्ञापन मांगने के लिये और फिर विज्ञापनों का पैसा वसूल करने के लिये जिसमें स्वतः का हिस्सा भी शामिल है, चाहे स्वेच्छा से चाहे लाचारी से, बाध्य होगा, उसे अपनी पत्रकारिता की आजादी को, सत्य को कुछ न कुछ दबाना होगा। कस्बाई या नगरीय स्तर पर काम करने वाले संवाददाताओं को इतना कम वेतन या लगभग नगण्य वेतन मिलता है कि विज्ञापन का कमीशन ही उनकी आय का मुख्य स्रोत बन जाता है। और इसके परिणामस्वरूप उन्हें विज्ञापनदाताओं, जो अमूमन ठेकेदार, बिल्डर या दो नंबर के पैसे के मालिक होते हैं या भ्रष्‍ट अधिकारी या भ्रष्‍ट राजनेता होते हैं,  के दबाव में चलना होता है या फिर उन पर दबाब बनाने के लिये गुटीय या पीत पत्रकारिता को बाध्य होना होता है।

राजधानियों के स्तर पर (विषेशतः मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश के बाद) संपादकों की वेतन और सुविधायें लाखों रुपये प्रतिमाह पहुंची है और अब इन सुविधाओं का अभ्यस्त बनकर उन्हों ने अपनी आजादी का स्वतः सर्मपण कर दिया है। नीरा राडिया के टेप कांड में जिस प्रकार वीर संघवी, प्रभु चावला और अनेकों बड़े बड़े अखबारनवीसों या मीडिया के संपादकों के नाम आये हैं,  वह मीडिया के उच्च स्तर पर पूंजी और सत्ता के समक्ष आत्म सर्मपण तथा कारपोरेट दलाली के उदाहरण है। ऐसा नहीं है कि आज भी अपवाद नहीं है। आज भी मीडिया में अच्छी खासी संख्या में वे पत्रकार हैं जो न केवल ईमानदार हैं और जिन्हों ने अपने मालिकों या पूंजी से कोई समझौता नहीं किया है। वे अपनी आजादी पर अडिग हैं। परन्तु उनकी संख्या क्रमश:  घट रही है। स्व. गणेश शंकर विद्यार्थी, माखन लाल चर्तुवेदी, विष्‍णु पराडकर और जीवित लोगों में दिनकर शुक्ला, सुभाष निगम जैसे लोग विरले ही हैं।

अखबार के मालिकों ने अपने उद्देश्‍य और प्रभावों को तथा उसके लिये कसावट को मजबूत रखने के लिये संस्करणवाद शुरू किया है। जिस विचार को पनपने नहीं देना है, उसे संस्करणों में और स्थानीय खबरों में सिकोड़ दिया जाता है और जिसे फैलाना है उसे राष्‍ट्रीय या नये पद ''कारपोरेट एडीटर''  के जिम्मे कर दिया जाता है। आजकल तो कौन से लेख प्रकाशित हो इसका फैसला संपादक के हाथ से लेकर एक नये पदासीन '' ब्राण्ड एडीटर''  को दे दिया गया है। कई अखबार वाले मित्रों ने यह भी जानकारी दी है कि कुछ नियमित छपने वाले व्यक्तियों के प्रकाशन के लिये किन्हीं संस्थाओं के साथ आर्थिक समझौते होते हैं। यह लेखन उन आर्थिक शक्तियों की नीति और उद्देश्‍यों को पूरा करने वाला होता है और उसके बदले में विज्ञापनों की दर पर सीधा पैसा मालिकों के पास पहुंच जाता है।

इसीलिये मीडिया में अतिरेकी सर्मथन और अतिरेकी उपेक्षा की प्रवृत्ति विकसित हुई है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से कतिपय घरानों या व्यक्तियों के प्रचार के लिये अखबार को खबर बनाया जाता है। कुछ लोगों के लिये ( नियमित प्रचार के लिये ) सेलिब्रिटी की संज्ञा स्वंयभू दे दी जाती है। और इन सेलिब्रिटीज की हर छोटी से छोटी सूचना समाचार पत्रों या टी.वी. चैनल के माध्यम से प्रचारित कर उन्हें आकर्षक व्यक्तित्व बनाया जाता है। फिल्म के अभिनेताओं, क्रिकेट खिलाड़ियों आदि के प्रचार के पीछे पूंजी और पैसा दोनों ही होते हैं। पूंजीपतियों के लिये माल बेचने के लिये विज्ञापन चाहिए और विज्ञापन के लिये ग्लैमर चाहिए। कुछ पत्रकारों के लिये अपने सुखभोग के लिये लिफाफे चाहिए और इसीलिये सत्य को दबाकर प्रचार दिखाया और बताया जा रहा है। सनसनीखेज समाचारों और उनके माध्यम से टी.आर.पी. बढ़ाने की होड़ ने इस बीमारी को और गंभीर बना दिया है। पूंजीवादी जगत यह चाहता है कि एक ऐसा विकृत समाज रहे जो मन से आपराधिक हो, जो पूंजी और मुनाफा प्रधान हो ताकि उनकी पूंजी के लिये कोई वैचारिक खतरा न हो। इसलिये अपराधों को इस ढंग से लगातार प्रचारित किया जाता है कि वे अपराध के प्रति घृणा के बजाय आकर्षण पैदा करने लगते हैं और एक प्रकार से समाज में नई पीढ़ी को अपराध का प्रशिक्षण देने लगते हैं।

देश के उच्च वर्ग या श्रेष्‍ठ वर्ग के लोगों पर जब कोई अपराध घटता है तब सारा मीडिया उसे अपने वर्गीय चेतना और भय के आधार पर उसके विरूद्ध खड़ा हो जाता है। जेसिका लाल की हत्या या शिवानी की हत्या निस्संदेह घोर निंदनीय है,  परन्तु जिस प्रकार से समाचार पत्रों और टी.वी. चैनलों ने जेसिका और शिवानी की हत्याओं को चुनौती के रूप में लिया, उस प्रकार की प्रतिक्रिया ग्रामीण और कस्बाई बलात्कार और हत्याओं पर व्यक्त नही होती। देश के ग्रामीण और दूरस्थ अंचलों में कितनी ही जघन्य हत्यायें और घटनायें घटती हैं,  परन्तु वे उस प्रकार से चर्चित और प्रचारित नहीं हो पाती। उन्हें एक अपराध की घटना के रूप में एकाध वार छापकर इतिश्री हो जाती है। भ्रष्‍ट राजनेताओं के नाम और चेहरे का इतना प्रचार होता है कि वे गॉंव- गॉंव में जाने जाते हैं,  परन्तु ईमानदार व्यक्तियों की चर्चा नहीं की जाती। मीडिया के लिये भ्रष्‍टाचार और अपराध खबर है,  ईमानदारी और सच्चरित्र, खबर नहीं है। कभी-कभी अपने मालिकों के उद्देश्‍य से मीडिया कुछ व्यक्तियों को प्रतीक बनाने का प्रयास करता है,  क्योंकि वे संपूर्ण बीमारी रूपी व्यवस्था को नष्‍ट कर नई व्यवस्था का निर्माण नहीं चाहते बल्कि फोड़े फुन्सियों का इलाज करके उसे ही क्रांति बताते हैं। हालांकि मुम्बई के जेडे, पाकिस्तान के शहनाज जैसे भी उदाहरण पत्रकारों में है,  जो माफियाओं या कट्टरपंथियों के द्वारा मार दिये गये क्योंकि उन्हों ने झुकने और समझौते से इनकार किया।

अब ऐसे दौर में सुधार का रास्ता क्या हो:-

01. कोई पूंजी का मालिक, बिल्डर या कालोनाईजर, बड़े घराने, किसी धमार्थ के लिये अपना अखबार चलायेंगे, यह कल्पना निरर्थक है।

02. अगर सरकारें, मीडिया को नियंत्रित करें तो यह तानाशाही का उदय होगा और जो अस्वीकार्य है।

03. केवल पाठकों या दश्रकों की शक्ति पर आज कोई अखबार या इलेक्ट्रॉनिक चैनल इतना व्यापक हो सकता है जो आज की मीडिया का मुकाबला कर सके, संभव नजर नहीं आता।

04. पूंजीवादी दुनिया और तकनीक की उन्नत दुनिया में जो नये संपर्क के माध्यम विकसित हुए हैं जैसे - नेटवर्किंग, ट्विटर, फेसबुक सोशल साइट आदि आदि उनका उपयोग भारत जैसे मुल्क में मुश्किल से एक फीसदी लोग ही करने में सक्षम हैं और जो वर्ग इस उन्नत तकनीक का इस्तेमाल कर सकता है वह आमतौर पर या तो अति संपन्न वर्ग है या फिर भ्रष्‍ट तंत्र का हिस्सा है।

05. राजनैतिक दल और उनके संगठन अब इतने व्यापक और प्रभावी नहीं है कि जो अपने संपर्क और संवाद के माध्यम से कोई लहर पैदा कर सकें।

यह अच्छा है कि राज्य सत्ता बहुत ताकतवर नहीं है, इसलिये मन में कितनी भी इच्छायें क्यों न करें परन्तु मीडिया पर वैधानिक नियंत्रण करने का साहस नहीं जुटा सकती इसीलिये एकमात्र रास्ता मीडिया की आचार संहिता का है,  जिसे स्वतः मीडिया को बनाना होगा। परन्तु यह आचार संहिता केवल भाषणों और उपदेशों से नहीं बन सकती। लक्ष्मण रेखा भी तब खिंची थी जब उसे पार करने वाले के जल जाने का खतरा था। अब ऐसी लक्ष्मण रेखा कैसे खींचे, एक महत्वपूर्ण प्रश्‍न है। मैं, समझता हूं कि मीडिया को निम्न कदम उठाना चाहिए:-

01. मीडिया के ग्रामीण, कस्बाई और नगरीय पत्रकारों तथा सभी पत्रकारों को नौकरी या काम आरंभ करने के छह माह के बाद स्थायीकरण का प्रावधान हो तथा उन्हें उपयुक्त वेतन, पेंशन, सुरक्षा बीमा, वाहन और अन्य कार्य की सुविधायें उपलब्ध हों। इसके लिये देश का समूचा मीडिया एक हो।

02. मीडिया को सरकारी सहायता की आवश्‍यकता न पड़े तथा मीडिया के मालिकों के द्वारा ही उसकी पूर्ति हो, यह एकीकृत प्रयास समूची मीडिया के द्वारा हो।

03. अगर मीडिया के मालिक सबको उपयुक्त वेतन, सुविधायें देने में समर्थ नहीं है तो राजधानियों के बड़े मीडिया कर्मियों को अपनी स्वेच्छा से अपना वेतन और सुविधाओं को कम कराकर अपने सहकर्मियों की मदद के लिये आगे आना चाहिये ताकि वे उनके नेतृत्व के लायक बन सकें।

04. मीडिया यह निर्णय करे कि विज्ञापन, अपराध और समाचार के अलग-अलग खण्ड होंगे।

05. वरिष्‍ठ और सेवानिवृत्त आर्दशवादी पत्रकारों की अनुशासनात्मक समिति बने जो मीडिया के लिये आचार संहिता का निमार्ण करे और विनियमन करे। इस समिति को समूचा मीडिया जगत यह अधिकार दे कि अगर किसी मीडिया कर्मी को वह आचार संहिता के उल्लंघन को दोषी मानते हैं तो उसे मीडिया जगत से अलग किया जाये।

06. मीडियाकर्मी अपने काम शुरू करने के पहले अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा करें और उसे अखबारों और मीडिया में प्रकाशित किया जाये ताकि उनकी ईमानदारी सुनिश्चित रहे।

07. मीडिया नकारात्मक, उपेक्षात्मक, अतिरेकी और प्रचारक की भूमिका की बजाय सत्य और आर्दश के पहियों को अपना वाहन बनाये। पूंजी और भोग के चार चक्रीय वाहनों के बजाय समाज और राष्‍ट्रहित के दुपहिये वाहन पर चलें।

08. मीडिया के मालिक या उनके परिजन उक्त मीडिया के संपादन समूह में न रहें, इसका कानून बने।

और अंत में, मैं, देश के पाठकों और दर्शकों से भी अपील करूंगा कि वे विचार और ज्ञान, सत्य और सूचना पाने के लिये अपनी आय का कुछ पैसा भी खर्च करना शुरू करें। मुफ्त पाठन, विज्ञापन और बाजार पर ही निर्भर करेगा। स्वखर्च पर आधारित पाठन - आजाद और ईमानदार होगा, मीडिया को प्रोत्साहित करेगा। मीडिया मिशन रहे - व्यापार न बने, इसलिये मीडिया के साथ साथ, समाज को भी आगे आना होगा। मीडिया समाज का ही अंग है। अतः अगर शरीर सड़ेगा तो एक अंग को बचाना मुश्किल होगा। शरीर रूपी समाज को भी बचायें ताकि अंग रूपी मीडिया भी बच सके।

आजकल, लंदन के 164 वर्ष पुराने अखबार ''वर्ल्ड ऑफ द न्यूज''  के बंद होने, आखिरी संपादकीय में जनता से माफी मांगने तथा उनके मालिक रुपर्ट मरडोक के स्वतः को निर्दोष बताकर माफी मांगने और प्रधानमंत्री कैमरन द्वारा भी खेद व्यक्त करने की चर्चा, भारतीय मीडिया में भी प्रमुखता से आ रही है। कुछ बुद्धिजीवी इस घटना को निजता के उल्लंघन के अपराध के रूप में निरूपित कर रहे हैं। निस्संदेह, निजता की रक्षा होनी चाहिये पर निजता की परिभाषा क्या हो? स्टिंग आपरेशन के दौर में, वर्ष 2006 व उसके बाद निरंतर पर निजता की चर्चा देश में हुई है। किसी व्यक्ति के पारिवारिक जीवन में झांकने का प्रयास या उसे नग्न कर बाजार में बेचने का प्रयास, निस्संदेह दंडनीय अपराध हो,  परन्तु समाज के हित में, भ्रष्‍टाचार के मामलों की जॉंच व खुलासे के लिये किये गये स्टिंग आपरेशन्स या प्रयास, निजता का उल्लंघन नहीं माने जाना चाहिये। रिश्‍वत खाना - अय्याशी करना आदि निजता नहीं है। बल्कि ये समाज के प्रति अपराध है। ऐसे खुलासे करने वाले पत्रकारों को संरक्षण - सुरक्षा व पुरस्कार दिये जाना चाहिये। आचार संहिता, आचार के लिये होगा न कि अनाचार, दुराचार या कदाचार की रक्षा के लिये। प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया दंतविहीन है। चूंकि यह प्रेस का ही अंग मानी जाना चाहिये, अतः उसे भी ताकत देने के कानून बनाये जाना चाहिये।

लेखक रघु ठाकुर मध्‍य प्रदेश के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.


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