इंडिया गेट टू जंतर-मंतर : अगस्त 2011 - ए लव स्टोरी... कुछ दृश्य

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1-वो इंडिया गेट से जंतर-मंतर के बीच किसी चौराहे पर मिली. चेहरे पर खुशी-उल्लास. वही नारे लगा रही थी, जो लोग लगा रहे थे. अत्याचारी बंद करो. भ्रष्टाचार बंद करो. वो छुटकी रोजाना मसाले, सुर्ती, तंबाकू, सिगरेट, चने, मूंगफली बेचती है. उसके साथ उस जैसे कई बच्चे भी यही काम करते हैं. रोज कुआं खोद पानी पीने वाले हैं ये. स्कूल नहीं जाते क्योंकि सांसों की डोर के लिए ज्ञान की नहीं बल्कि चंद सिक्कों की जरूरत होती है.

छुटकी की नारेबाजी, उठने ही वाला है हाथ...

ये लो, वो झंडा अभी संभाल रहे हैं, इधर लग गया नारा और उठ गई बंद मुट्ठी

अभी वे लोग झंडा-मोबाइल में फंसे हैं, इधर छुटकी ने गला फाड़कर अत्याचारी मुर्दाबाद कह दिया.

बाबू, इधर ले आओ तिरंगा झंडा, जरा हम भी तो देखो... अरे अरे नहीं दोगे... साले चश्मा वाले, ये तिरंगा तुम्हारी बपौती नहीं है, और तुम लोगों ने अभी कहां तिरंगा हमें थामने दिया, पर चल निकल, फिलहाल तो हम भी तेरे साथ हैं ...

2-इंडिया गेट से जंतर मंतर जाने वाले इतनी बड़ी संख्या में थे कि लग रहा था कि इंडिया गेट से जंतर मंतर के बीच कई किलोमीटर की सड़क सिर्फ और सिर्फ भारत के लाडलों से भरी पड़ी है. मैं भी इसी भीड़ का हिस्सा था. कभी कक्षा आठ दस बारह के बच्चों का हुजूम दिख रहा था जो स्कूली ड्रेस और बस्ते के साथ आंदोलन में शरीक हुए थे, स्कूल से बंक मारकर. ये किशोर उम्र विद्यार्थी सबसे ज्यादा जोरशोर से नारे लगा रहे थे. कभी बुजुर्ग दिख रहे थे जो खाए पिए घरों से थे लेकिन उन्हें करप्शन और महंगाई के मुद्दे परेशान करते हैं. महिलाओं का रेला भी नारा लगाता चल रहा था. सुंदर सजीली जींसधारी लड़कियों का समूह भी इसमें था. नए फिल्मों के हीरो माफिक युवाओं की भरपूर मात्रा इस पैदलमार्च में शामिल थी.

3-तरह तरह के नारे लग रहे थे- सोनिया जिसकी मम्मी है, वो सरकार निकम्मी है. मनमोहन जिसका ताऊ है, वो सरकार बिकाऊ है. जिसने देश को बेचा है, राहुल उसका बेटा है. इंडिया अगेंस्ट करप्शन के वालंटियर ऐसे नारे लगाने से मना कर रहे थे पर भीड़ कहां मानने वाली. भीड़ का सरकार के प्रति गुस्सा तीखे रूप में नारों के जरिए प्रकट हो रहा था. खासकर स्कूल से भागकर आंदोलन में शामिल होने आए किशोरों को तो ऐसे ही नारे भा रहे थे और यही नारे वे शुरू से आखिर तक लगाते रहे.

4-एक लड़की जंतर मंतर से फोन पर अपने किसी दोस्त को अपनी लोकेशन बता रही थी. यह प्रेमी जोड़ा भटक गया था. लड़का इंडिया गेट के इर्दगिर्द भीड़ में नारे लगाते हुए घूम रहा था और साथ ही अपनी गर्लफ्रेंड को भी तलाश रहा था. लड़की रेले के साथ बहते हुए, नारे लगाते हुए जंतर मंतर आ पहुंची थी. दोनों कुछ देर में शायद मिल जाएंगे यहीं कहीं जंतर मंतर के आसपास, रिजर्व बैंक आफ इंडिया के करीब. ऐसी संभावना थी. लव स्टोरी में विचारधारा थी. लव स्टोरी में देश की चिंता भी थी. यह मेच्योर लव स्टोरी थी. ऐसों की संख्या काफी दिखी. और जब ''अगस्त 2011 - ए लव स्टोरी'' में आंदोलन पार्ट हो तो आंदोलन की गहनता को समझा जा सकता है. और, यह आंदोलन सचमुच लवस्टोरी है, देश के प्रति प्यार की स्टोरी.

5-दिल्ली पुलिस के लोग चौराहों पर ट्रैफिक रोककर पैदलमार्च में शामिल लोगों को जाने का रास्ता बना रहे थे. ट्रैफिक रुकने के कारण चौराहों के इधर उधर रुके कारधारी बाइकधारी बससवार लोग रैली को संभावनापूर्ण नजरों से निहार रहे थे. रैली के लोग उन्हें देखकर नारे लगाते- वंदेमातरम, तो रुकी ट्रैफिक में फंसे लोगों के कंठ भी खुल जाते- वंदेमातरम. कांस्टेबल से लेकर इंस्पेक्टर तक खड़े थे चौराहों पर, आधुनिक हथियारों से लैस जवान भी थे. इन्हें देख नारे लगते- अंदर की है ये बात, दिल्ली पुलिस हमारे साथ. इतना भरोसा अपने पर और आंदोलन पर कि पैदलमार्च वालों को लगता कि पुलिस भी उनके साथ है क्योंकि देश की हालत से पुलिसवालों के घर-परिवार भी परेशान हैं.

6-मीडिया के लोगों का हुजूम था. हर चौराहे पर मीडिया वाले खड़े मिलते. थ्री इडियट्स का बैनर लगाए खड़े थे कुछ लोग जिसमें मनमोहन, चिदंबरम और कपिल सिब्बल की तस्वीर थी. एक लड़का इस बैनर पर जूता सटाए खड़ा था. फोटोग्राफरों की भीड़ सीन को कैमरे में कैद करने को बार बार क्लिक क्लिक कर रही थी. कई विदेशी फोटोग्राफर थे. अच्छी तस्वीर बन रही थी उनकी. कैमरे देखकर नारे लगाने वाले बड़ी संख्या में थे. मीडिया आंदोलन के साथ है, यह भाव सबके मन में दिखा. और मीडिया वाले भी कुछ अलग करने की जुगत में अलग-अलग मूड मिजाज के सीन फुटेज जुटा रहे थे, लाइव दे रहे थे. नागरिक पत्रकारिता के इस दौर में ढेर सारे युवा, बुजुर्ग अपने मोबाइलों से तरह तरह के फोटो और वीडियो खींच बना रहे थे.

7-कलाकार भी पैदलमार्च में काफी संख्या में थे. कोई ड्रम बजाता चल रहा था तो कोई गाने गाता. तिरंगा ज्यादातर के हाथों में था. डाक्टरी की पढ़ाई कर रहे छात्र-छात्राएं भी आंदोलन के सपोर्ट में ग्रुप बनाकर आए थे और नारे लगा रहे थे. कई संकोची युवा नारे नहीं लगाते दिखे लेकिन उनसे बात करने पर पता चला कि चाहते हैं कि सड़ा हुआ पानी बदले, नई तस्वीर बने, सुख-चैन का माहौल कायम हो. युवाओं का एक ग्रुप पानी के खाली बोतलों को सड़क पर पीट पीट कर बजा गा रहा था. मैं अन्ना हजारे हूं लिखी टीशर्ट पहने युवा सबसे अलग नजर आ रहे थे. किसी लड़की ने एक टीशर्टधारी से पूछा- ये टीशर्ट मिलते कहां हैं. युवक ने जवाब दिया- मुझे नहीं मालूम, मुझे तो कल शाम तिहाड़ के सामने दिया गया, वहां बांटा जा रहा था, तभी से पहना हूं.

8-जंतर-मंतर पर युवा कांग्रेस वालों ने काफी बड़ा इलाक अपने बैनर और तंबू से घेर रखा था. क्या कि राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी मिलनी चाहिए. इस मांग से जुड़े पोस्टर टेंट में लगे हुए थे पर टेंट पूरा खाली था. कोई भी सज्जन नहीं दिख रहे थे. और जंतर मंतर पूरा अन्ना समर्थकों से भरा था. क्या पता उन्हें डर हो कि सरकार के प्रति नाराजगी के चलते भीड़ कहीं उन पर न टूट पड़े, इसलिए एक बड़ी जगह घेरकर, टेंट तंबू लगाकर वे खुद उखड़ गए थे वहां से.

9-अपने जीवन में मैं तरह तरह के प्रदर्शनों और आंदोलनों में शामिल हुआ था पर इस पैदलमार्च के साथ चलते हुए लग रहा था कि ये वही लोग हैं जिनके हम आंदोलन में शामिल होने की कामना किया करते थे पर लोग थे कि सुनते-समझते ही नहीं थे. आज ये सब लोग सड़क पर खुद ब खुद निकल पड़े हैं, अन्ना के नाम पर. उन्हें अन्ना में देवता दिखता है, सादगी दिखती है, ईमानदारी दिखती है, देश का असली नेता होने का स्वरूप दिखता है, गांधी दिखते हैं... तो इस देश की आम जनता को विचारधारा के जरिए नहीं, प्यार और सादगी से जीता जा सकता है, ऐसा महसूस हुआ. और जब आप उन्हें जीत ले, जोड़ लें तब चाहें जैसे शिक्षित करें, वे शिक्षित हो जाएंगे. नेता इससे सबक ले सकते हैं. विचारधारा वाली पार्टियां इससे सीख ले सकती हैं.

10-एक युवा अपनी शर्ट खोलकर उस पर भारत का नक्शा बनवाए था और अन्ना के समर्थन में व करप्शन के खिलाफ नारे लिखवाए थे. उसकी तस्वीर खींचने वालों की भीड़ थी. एक साथी शराब के नशे में इतने नारे लगाते रहे और पैदल चलते रहे कि जंतर-मंतर पहुंचकर उन्हें बेहोशी आ गई. अन्य अपरिचित लोगों ने उनकी इस तरह सेवा टहल की जैसे वे उनके ही घर के हों. अपनापन का एक भाव अजनबियों के मन में था और सब एक दूसरे से जन्मों-जन्मों से परिचित लग रहे थे. ऐसे आंदोलन जनता के दिलों को आपस में जोड़ते भी हैं. और ऐसे आंदोलन देशभक्ति की प्रचंड भावना पैदा करते हैं.

11- इंडिया गेट से जंतर मंतर पहुंचे एक अधेड़ हो रहे सज्जन ने अपनी निकली तोंद और पसीने से डूबी शर्ट को देखते हुए अपने एक दूसरे मित्र से कहा- चलो, अन्ना बाबा की कृपा रहेगी तो अपनी तोंद कम हो जाएगी. बहुत दिन बाद इतना पैदल चला हूं और खूब पसीना निकला है. शरीर से टाक्सिक चीजें बह गई हैं. राजनीति से भी विषैलापन खत्म होना चाहिए. उन्होंने अपने दोस्त को, जो जंतर-मंतर पर पराठे वाली दुकान से एक प्लेट लेकर भकोसने में लगे हुए थे, सलाह दी कि हम लोग मार्निंग वाक छोड़कर रोज अन्ना के आंदोलन में शामिल होंगे और देश की सेहत ठीक करने की प्रक्रिया के साथ अपनी तंदरुस्ती को भी रास्ते पर ले आएंगे.

उपर उल्लखित बातों और पैदल मार्च की झलकियां वीडियो में देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें--

IndiaGate to JantarMantar Part1

IndiaGate to JantarMantar Part2

IndiaGate to JantarMantar Part3

IndiaGate to JantarMantar Part4

IndiaGate to JantarMantar Part5

&

IndiaGate to JantarMantar Part6

... और, पैदल मार्च से जुड़ी कुछ चुनिंदा तस्वीरें यूं हैं...

...अन्ना एंड आंदोलन... अगस्त 2011 - ए लव स्टोरी... जारी है... कुछ सीन अगर आपके भी जेहन में हों तो इसमें जोड़ें और फिल्म को क्लाइमेक्स तक ले जाएं....

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

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इसे भी पढ़ें, क्लिक करें- जनांदोलनों के साथ हूं, इसलिए... मैं अन्ना हजारे हूं - बयान दर्ज करें


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