ये हरामखोर बेइमान नेता अन्ना आंदोलन से फायदा उठाने में लग गए

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सुभाष गुप्ता: खून चूसने वाले नेता अभी चेते नहीं... : अन्ना की लड़ाई देश भर के लोगों की लड़ाई  में बदल रही है। इसकी वजह भी है। दरअसल, ये लड़ाई  जन लोकपाल की लड़ाई से बहुत आगे निकल चुकी है। आजादी  के बाद नौकरशाही और नेताओं ने जिस तरह आम आदमी का खून  चूसा है.... ये लड़ाई उसी का नतीजा है।

खास बात ये है कि देश भर में आंदोलन की आग फैलने के बाद भी तमाम भ्रष्ट नेता इसका सियासी फायदा उठाने की जुगत भिड़ाने लगे हैं। वे आजाद हिंदुस्तान के इन तेवरों से सबक लेने को तैयार नजर नहीं आते। बल्कि शायद उनकी सोच ये है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़े हुए देश की पैरवी का ड्रामा करके वे खुद को ईमानदारों की कतार में खड़ा कर लेंगे। लेकिन क्या हिंदुस्तान के लोग इतने भोले हैं कि सियार की खाल में छुपे भेड़ियों को नही पहचानते  ? क्या सिर्फ केंद्र में बैठे बेईमान ही बेईमान माने जाएंगे और राज्य में बैठकर जनता का खून चूसने वालों को जनता माफ कर देगी ? यदि आकंठ भ्रष्टाचार और बेईमानी में डूबा कोई नेता ऐसा मुगालता पाल लेता है, उसकी अक्ल पर तरस ही खाया जा सकता है। अभी एक को निशाना बनाया गया है, कल दूसरों की बारी आएगी।

अन्ना का यह आंदोलन समूचे भ्रष्टाचार और सड़ी गली व्यवस्था के खिलाफ जनता की आवाज है। भ्रष्ट नेताओं और अफसरशाही ने जिस तरह जनता की खून पसीने की कमाई पर डाका डालने और अपनी जेबें भरने को अपना अधिकार समझ लिया है, ये उसके खिलाफ आम आदमी की बगावत है। आम आदमी इस लड़ाई में इसलिए कूदा है कि उसे अन्ना की आवाज में सच्चाई नजर आती है।... और आजादी के बाद पिसते – पिसते नाउम्मीद हो चुके लोगों को अन्ना ने ये दिखा दिया है कि हौसला बुलंद हो, तो जुल्मी के खिलाफ कोई भी लड़ सकता ....  लड़कर जीत सकता है। भले ही जुल्मी का कद सरकार जितना ही क्यों न हो।

अब पानी सिर  के ऊपर से गुजरने लगा है।  अब भी हमने खामोशी ओढ़े रखी, तो भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाही का इलाज करना और मुश्किल हो जाएगा। इसी सोच के साथ  बच्चा, बूढ़ा, जवान हर कोई  सड़क पर आ रहा है। अहिंसा की ताकत एक बार फिर अपना रंग दिखाने लगी है। संसद और कमेटी को आड़ की तरह इस्तेमाल करने वाले ये कैसे भूल जाते हैं कि लोकतंत्र में सारी शक्ति जनता में निहित होती है। कुछ लोगों को अपना नुमाइंदा चुन लेने का अर्थ यह कदापि नहीं हो सकता है कि इससे जनता शक्तिहीन हो गई है। जनता ने किसी को भी चुना है, तो सही तरीके से काम करने के लिए चुना है। हजारों करोड़ के घोटाले करने के लिए नहीं। और न ही घोटालेबाजों को बचाने और आश्रय देने के लिए किसी को चुना या किसी बड़े पद तक पहुंचाया गया है। महज अपने सियासी नफे नुकसान से लिए घोटालों पर पर्दा डालना और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने में आनाकानी क्या कम बड़ा भ्रष्ट आचरण है?

अन्ना की ये लड़ाई  पूरे देश में फैल गई है... ये लड़ाई और ज्यादा फैलेगी।  तब तक फैलती जाएगी, जब तक भ्रष्टाचार की जड़ न उखाड़ दी जाए। इसी विश्वास के साथ देश के लोग अन्ना बन रहे हैं। अन्ना ने जो मशाल जलाई है, उसे और आगे ले जाना, समय की पुकार है ... अपने अधिकारों पर डाकेजनी रोकने के लिए ये एक नितांत आवश्यक उपाय भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इसकी आंच उन सभी सफेदपोशों को बेनकाब करके उखाड़ फेंकेगी, जो जनता के हितैशी होने का ढकोसला करके जनता का खून चूस रहे हैं। भले ही वे किसी भी राजनीतिक चोले में क्यों न हों।

लेखक सुभाष गुप्ता उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.


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