यूं भी जीया जाता है

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उमेश चतुर्वेदीमेरे अपने के आदर्शों से प्रेरणा पाकर लिख रहा हूं। दुनियादारी के पैमाने पर गढ़े रिश्तों में से कोई छोर ढूंढ़ने की कोशिश करेंगे तो आप कहीं और उलझ जाएंगे और जिस मुद्दे पर आपको लाना चाहता हूं वो हाशिए पर चला जाएगा। स्वार्थ को आधुनिक सभ्यता से जोड़ कर समाज को पहचान देने वाले मेरे महानगर दिल्ली में एक न्यारा परिवार है, जो स्वार्थों से कोसों दूर समाज को कुछ देने की चाह में मुसलसल काम कर रहा है।

इस परिवार से दिसंबर 1972 से नाता है। 39 साल पहले मुझे इस शहर में पांव जमाने के लिए मेरी बड़ी बहन के अलावा इसी नातेदार परिवार ने हर वक्त संबल दिया। इस परिवार और इसकी धुरी करुणा और दया की साक्षात प्रतिमूर्ति रेणु जैन के कामों पर कभी विस्तार से लिखूंगा। अब यहां उस संवाद का जिक्र करूंगा जो टेलीफोन पर हुआ और जिससे मैं बेहद मुतास्सिर हूं। इस संवाद का जिक्र इसलिए भी करना चाहता हूं कि किसी एक व्यक्ति ने भी प्रेरणा पा कर यह राह पकड़ ली तो मेरा लिखना सार्थक हो जाएगा।

त्रिनगर के देवाराम पार्क में एक उच्च प्राथमिक विद्यालय, जिसे मिडिल स्कूल कहते हैं, कई वर्षों से चल रहा है। सरकार से कई वर्षों पहले मान्यता का मान पा चुका महावीर इंटरनेशनल स्कूल सिर्फ नामभर नहीं है, इसने कई आदर्श उदाहरण पेश किए हैं इसलिए यह स्कूल इलाके में बच्चों के सुनहरी भविष्य का प्रतीक बन गया है। इस स्कूल को इस मुकाम तक पहुंचाने में रेणु जी ने 27 वर्ष अथक परिश्रम किया है। त्याग, निष्ठा और ईमानदारी के साथ परिश्रम का मेल होने पर ही महावीर इंटरनेशनल जैसा स्कूल तैयार होता है।

स्कूल की ख्याति को देखते हुए हर मां-बाप यह चाह रखता है कि उनके बच्चे का महावीर इंटरनेशनल स्कूल में दाखिला हो। लेकिन, सीटें सीमित होने के कारण स्कूल प्रबंधन की भी मजबूरियां हैं-सभी को दाखिला नहीं दिया जा सकता। हर अच्छा स्कूल इस मजबूरी को झेलता है। असली बात अब कहूंगा। अभी तक जो भूमिका तैयार की उसका एक ही मकसद था कि आप मेरी असली बात का मर्म समझ सकें। स्कूल प्रबंधन ने 27 साल के इतिहास में 27 पैसे का भी डोनेशन नहीं लिया। डोनेशन देने वाले आते हैं और उन्हें हाथ जोड़ कर वापस भेजा जाता है।

चारों ओर आपाधापी, लूटखसोट, बेइमानी और छल प्रपंच का माहौल है; धन तरक्की का मापदंड हो गया है; विद्या के तथाकथित मंदिर अभिभावकों को लूटने का कोई मौका नहीं चूकते; बिना डोनेशन दाखिला देना अपराध समझते हैं। ऐसे माहौल में इस तरह के आचरण की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। मैं थोड़ा बहुत मनोविज्ञान समझता हूं, उस आधार पर कह रहा हूं कि आपको भी यकीन नहीं हो रहा होगा। आपकी भी गलती नहीं है। ऐसे माहौल में कोई इतने बड़े सच की उम्मीद कैसे कर सकता है। जब सच खांटी सच हो, स्याह सच हो तो उस पर आसानी से यकीन नहीं होता। पर यह सच वैसा ही सच है जैसे सचमुच सच होता हैं; मां की ममता जैसा सच।

दिल्ली के सभी स्कूल यानी सभी स्कूल सरकार से जमीन लेते समय कई वायदे करते हैं, सभी शर्तें मानने का वचन देते हैं लेकिन किसी स्कूल ने आज तक उन वायदों को पूरा नहीं किया; एक प्रतिशत भी नहीं। अगर स्कूलों की बुनियाद झूठ और फरेब पर टिकी हो तो वो बच्चों को क्या सिखाएंगे। महावीर इंटरनेशनल स्कूल इन सबसे हटकर है। माफ कीजिए, आप भूल से भी यह मत समझ लेना कि मैं तुलना कर महावीर इंटरनेशनल स्कूल को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश कर रहा हूं। तुलना कर सिर्फ यह बताना चाहता हूं कि थोड़ी बहुत शर्म बची है तो बाकी स्कूलों को सबक लेना चाहिए और अपना रवैया सुधारना चाहिए। बाकी स्कूल क्या सबक लें, यह बताने के लिए फिर महावीर इंटरनेशनल स्कूल की ओर रूख करता हूं। इस स्कूल ने सरकार से एक रुपए की मदद नहीं ली जबकि सैकड़ों गरीब बच्चों को मुफ्त (मुफ्त का मतलब मुफ्त) शिक्षा दे चुका है। आज भी 65 गरीब बच्चे मुफ्त शिक्षा पा रहे हैं। निहायत गरीब परिवार में जन्मे सेल्वराज ऐसे ही भाग्यशाली बच्चों में एक था जिसकी नींव इसी स्कूल में तैयार हुई और वो भी मुफ्त। रेणु जी ने बताया कि आज सेल्वराज एक कंपनी में 85 हजार रुपए तनख्वाह पा रहा हैं। रेणु जी सेल्वराज की कामयाबी की कहानी बताते हुए बेहद खुश थीं, शायद अपने बच्चों की तरक्की पर भी इतनी खुश नहीं हुई होंगी।

रेणु जी का मानना है कि मौजूदा शिक्षा प्रणाली ही दोषपूर्ण हैं। घिसेपिटे ढर्रे पर बच्चों को पढ़ाया जाता है। बच्चों का मनोविज्ञान समझे बिना किताबें रटवा दी जाती हैं। उन्हें सिर्फ नौकरी पाने लायक बनाया जाता है। मानवीय मूल्यों को दरकिनार कर दिया जाता है। कितनी दुखद स्थिति है कि स्कूलों में मोरल साइंस जैसे अहम विषय को सबसे कम तवज्जो दी जाती है जबकि गिरते सामाजिक मूल्यों को देखते हुए इस विषय को सबसे अधिक अहमियत दी जानी चाहिए। अफसोस है कि स्कूल दुकानों की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं। इन्हें विद्या मंदिर कहना बेमानी होगा। गली गली में स्कूल खुल गए हैं जहां कम तनख्वाह पर काम करने वाले अयोग्य अध्यापक बच्चों का भविष्य बिगाड़ते हैं। बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करना सबसे बड़ा अपराध है और इस अपराध को रोकना सरकार और अभिभावकों की जिम्मेदारी है।

लेखक उमेश जोशी वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. जनसत्‍ता, टोटल टीवी समेत कई बड़े संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. तीन दशक से पत्रकारिता में सक्रिय उमेश जोशी इन दिनों हरियाणा न्‍यूज में वरिष्‍ठ पद पर कार्यरत हैं.


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