अन्ना के बहाने गाँधी की वापसी

E-mail Print PDF

दो अक्तूबर बस आने ही वाला है. तकरीबन पिछले चार-पांच दशक से गाँधी जयंती पर आयोजित होने वाली हर गोष्ठी में एक सवाल हमेशा हावी होता रहा है, यह कि वर्तमान सन्दर्भ और परिवेश में गाँधी किस हद तक प्रासंगिक रह गए हैं और ये भी कि रह गए भी हैं या नहीं. तेजी से बदलती हुई दुनिया के सरोकारों ने राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो शक्ल अख्तियार कर ली है उसे देखते -समझते इस तरह के किसी भी सवाल को अस्वाभाविक भी नहीं माना जा सकता.

विज्ञान और टेक्नालाजी के विकास के साथ ही औद्योगिक उत्पादन में आये बूम ने सभ्यता और संस्कृतिगत सभी मूल्यों को दरकिनार कर दिया है. ऐसे में अगर लोग गाँधी और उनके चिंतन को इस बदलाव की भूमिका में अनुपयोगी मानने लगे तो उनकी इस सोच को खारिज भी नहीं किया जा सकता. बावजूद इस तथ्य के कि लगभग तीन साल पहले अमेरिका ने भी गाँधी की गरिमा को प्रतिष्ठा देते हुए दो अक्तूबर (गाँधी -जयन्ती) को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस' के रूप में घोषित किया.

बहरहाल, गाँधी जयन्ती आने के पहले और स्वतंत्रता दिवस के बाद,  इस महीने के मध्यकाल में जो परिस्थितियां उभरी हैं, उनके ढेर सारे निहितार्थ तलाशे जा सकते हैं, लेकिन अब गाँधी की प्रासंगिकता पर सवाल तो कत्तई नहीं खड़ा किया जा सकता है.  इस में भी कोई संदेह नहीं है कि गाँधी और गाँधी-विचार को पुनर्स्थापित तथा प्रतिष्ठित करने का काम अन्ना हजारे ने किया है. पंद्रह अगस्त को गाँधी की समाधि पर विह्वल, विकल और अभिभूत अन्ना ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी राष्ट्रव्यापी मुहिम शुरू करने से पहले अविरल अश्रुपात करते हुए संभवतः बापू से सत्याग्रह की संजीवनी शक्ति की ही याचना की थी. उसके बाद जो दृश्य सारी दुनिया देख रही है, उसका संकेत स्पष्ट है कि आजादी के बाद जड़-और भ्रष्ट हो गयी व्यवस्था तथा बहुत हद तक राष्‍ट्रीय समाज भी, एक नई चेतना के आगोश में उद्बुद्ध और जागरूक हो रहा है. गाँधी एक अमूर्त चेतना का आकाश बनकर बदलाव की इस नई भूमिका को नए सिरे से गढ़ रहे हैं और अन्ना उनकी आत्मशक्ति का कलेवर धारणकर इस सृजन को एक नई परिभाषा देने की कोशिश में जुटे हैं.

अन्ना की यह परिभाषा गाँधी और उनके द्वारा संचालित सत्याग्रह आंदोलनों की यादों को नए सिरे से, मौजूदा वक्त के फलक पर, बड़ी शिद्दत के साथ, कई-कई रूपाकारों में उकेर रही है. अन्ना के 'जन लोकपाल 'और उसके जरिये राष्ट्र-जीवन की धमनियों में पैबस्त हो चुके भ्रष्टाचार के खात्मे के दावे को सार्थक या निरर्थक कहकर बहसें तो कराई जा सकती हैं, लेकिन इसे किसी भी अर्थ में ख़ारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसने बदलाव की चाहत को सतह पर ला दिया है. इसका फलाफल क्या घटित होगा, इसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, लेकिन कमोवेश यह तो कहना ही पड़ेगा कि देश के हताश, निराश और कुंठित जनमानस में, जिसमें सबसे बड़ी भूमिका युवाओं की है, कुछ नई उम्मीदों के अंकुर जरुर उगाये हैं.

उत्तर-दक्षिण और पूरब-पश्चिम तथा महानगरों से गावों तक युवा चेतना का प्रवाह अप्रतिहत और आलोड़ित हो रहा है. इस वेग को संचालित भले ही अन्ना ने किया हो, लेकिन वेग की शक्ति को गाँधी के अलावा कोई दूसरा नाम नहीं दिया जा सकता. मिस्र, लीबिया और सीरिया सहित ब्रिटेन में भी आज बदलाव की बयार बह रही है लेकिन चूँकि वहां गाँधी की विरासत नहीं है इसलिए वहां क्रांति ने सशस्त्र संघर्ष का रूप ले लिया है, लेकिन भारत की मौजूदा क्रांति, 'विश्वगुरु भारत' का समूची दुनिया को एक सन्देश है.

अन्ना के चलते खादी और गाँधी टोपी का दौर एक बार फिर परवान चढ़ा है,  जिसे पिछले कई दशकों से झूठों, मक्कारों और फरेबियों का परिधान कहकर तिरस्‍कृत किया जाता रहा है. गाँधी ने ही कभी कहा था कि 'खादी वस्त्र नहीं, विचार है' . तो क्या यह माना जाय कि एक बार फिर वह विचार अपने स्खलित हुए केंद्र पर पुनर्प्रतिष्ठित हो रहा है? जाने-अनजाने आकार ले रही इस कोशिश की कशिश को कमतर नहीं आंका जा सकता. खासकर देश की उस युवापीढ़ी के सन्दर्भ में जिसने गाँधी तथा गांधीवाद को ओल्ड फैशन का माडल कहकर ठुकरा दिया था. यह अन्ना का करिश्मा है कि इस उपेक्षित और तिरस्‍कृत माडल को उसी युवापीढ़ी के लिए सर्वाधिक मूल्यवान बना दिया है. कई पीढ़ियों के अंतराल को पाटते हुए 16-18  साल का युवक सत्तर पार कर गए अन्ना के साथ तादात्म्य स्थापित करने में सफल हो रहा है. युवक अन्ना को आत्मसात कर रहे हैं और अन्ना, गाँधी को. प्रासंगिकता का अब इससे बड़ा प्रमाण गाँधी के सम्बन्ध में और दिया भी क्या जा सकता है?

कितनी त्रासद बात है कि जिस देश की दासता-मुक्ति के लिए गाँधी ने अप्रतिम संघर्ष किया और ब्रितानी साम्राज्य के सूरज को अंततः समुद्र की अतल गहराइयों में डुबा दिया, उसी गाँधी को लेकर, उन्ही के देश में एक मुहावरा गढ़ लिया गया था 'मजबूरी का नाम, महात्मा गाँधी'.  अन्ना को धन्यवाद दिया जाना चाहिए  कि उन्होंने इस मुहावरे में एक नया अर्थ भरने की कोशिश की है, भविष्य में गाँधी 'मजबूरी' का नहीं, अपितु 'मजबूती' का नाम होगा.

लेखक रामजी सिंह 'उदयन'  मूलत: साहित्‍यकार हैं. वे हैदराबाद से प्रकाशित डेली हिंदी मिलाप को एक दशक तक सेवा देने के बाद फिलहाल स्‍वतंत्र लेखन में जुटे हुए हैं.


AddThis