अन्ना समर्थक सांसदों की बढ़ती तादाद

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मुमकिन है कि मंगलवार को संसद के अंदर-बाहर अजीब दृश्य नजर आए। हालात से सहमे सांसद संसद की कार्यवाही में शिरकत करने से पहले और बाद में मीडिया कैमरों के सामने जा जाकर बयान देना शुरू कर दें कि वो भी अन्ना के साथ हैं। अन्ना के जनलोकपाल बिल के समर्थन में हैं। सिर झुकाकर आंधी के निकल जाने का इंतजार कर रहे कई सांसदों ने रविवार से ही पल्टी मारना शुरू कर दिया है।

जाहिर हैं संसद के अंदर भी उनकी भूमिका अचानक से बदली नजर आएगी। यह सब उस भजन का नतीजे होता दिख रहा है जिसे अन्ना हजारे ने भोजन से भी बड़ा बना दिया है। अन्ना के अनशन के आकर्षण में फंसे लोगों के लिए अन्ना हजारे का आदेश है कि अब वो अपने- अपने सांसदों और मंत्रियों के घरों पर  जाकर 'रघुपति राघव राजा राम,सबको सन्मति दे भगवान' के भजन का जाप करें। जाप का नतीजा इतनी जल्दी दिखने लगा है कि सब भौंचक हैं। राजनीति का राशन पानी बंद हो जाने से भय से क्या कांग्रेस क्या विरोधी दल सभी के सांसद एकजुट होकर अन्ना की हां से हां मिलाने लगे हैं।

अन्ना की यह लीला कई मायने में संयोगों की लीला है। जिससे हठात लग रहा है कि यह आंदोलन क्रांति में बदल गया है। देश बदलाव के लिए करवट बदल रहा है। आजादी के बाद चौंसठ सालों में यह सबसे बड़ा संयोग है। संयोगों के मिलन ने ही अन्ना हजारे को रामलीला मैदान के मंच पर ला बिठाया है। संयोग ने ही सबसे बडे़ जनसैलाब को सड़कों पर उतार दिया है। रामलीला मैदान में ऐतिहासिक भी़ड़ जुटाया है। लोग बदलाव की उम्मीद की धुन पर नाच-झूम रहे हैं। आम भारतीयों में 'अभी नहीं, तो कभी नहीं' के भाव की कसमासहट पैदा हो गई है। जन्म से मरण तक के सभी संस्कारों में भ्रष्टाचार का सामना कर रहा समाज उद्वेलित है। यह संयोग में शामिल सबसे बड़ा कारक है। आंदोलन के क्रांति में बदलने के संकेत के संयोगों की बात करें तो इसके एक नहीं, कई कारण हैं।

अगर नैसर्गिक संयोग की बात करें तो अन्ना हजारे में अप्रैल में अनशन खत्म करते वक्त ऐलान किया था कि वो 16 अगस्त को जंतर मंतर से दूसरी आजादी की लडाई छेड़ेंगे। बौखालाई सरकार ने अनशन के लिए जंतर मंतर से भी छोटी जगह जयप्रकाश नाराय़ण पार्क देने का फैसला सुनाया। अन्ना ने हामी भर दी। लेकिन इससे भी संतोष नहीं हुआ तो 16 अगस्त को अन्ना को अनशन के लिए तिहाड़ जेल में जगह दी गई और वहां से ही बडे़ रामलीला मैदान में अनशन जारी रखने का रास्ता खुल गया। दिल्ली के रामलीला मैदान को आजादी से पहले से ही देश में आए बडे़ बदलावों का गवाह बनने का मौका लगा है। रामलीला मैदान के गवाही के फेहरिस्त में प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के जय जवान, जय किसान के जयघोष से लेकर इंदिरा गांधी के बंगलादेश बनाने और जयप्रकाश नारायण के इमरजेंसी हटाओ जैसी रैलियां शामिल हैं। यही वजह है कि हर साल दशहरा पर बुराई पर अच्छाई की जीत के संकल्प को दोहराने के लिए देश के प्रधानमंत्री रावण दहन के लिए खुद यहां मौजूद होते हैं।

अन्ना के अनशन स्थल के नैसर्गिक संयोगों के बीच सफलता की पहली वजह, बीते दशक भर से देश में कायम नेतृत्व शून्यता है। ग्लोबल विलेज के लिए कथित आर्थिक तरक्की की लाग में सरकार का कल्याणकारी रुख खत्म सा होता नजर आ रहा है। सच तो ये है कि अटल बिहारी वाजपेयी को सत्ता शिखर पर पहुंचाने वाले के बाद से ही राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए आमजन में से किसी शख्स की तलाश शुरू हो गई थी। वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनाने में अहम भूमिका अदा करने वाले खास तबके ने ही 2002 में ही मान लिया था कि अटल जी उनके मकसद को पूरा करने में विफल हो गए हैं। अटल सरकार से उम्मीद की विफलता का ही नतीजा था कि गुजरात में राजधर्म का निर्वाह नहीं करने वाली नरेंद्र मोदी की सरकार का प्रधानमंत्री रहते भी वो बाल बांका नहीं कर पाए थे। वाजपेयी को सत्ता शिखर पर पहुंचाने वाली ताकत के दुविधा में फंसी और उसी दुविधा का नतीजा रहा कि इंडिया साइनिंग के मु्द्दा उल्टा पड़ गया। बगैर किसी ठोस आधारभूत ढांचा के कांग्रेस पार्टी दनदनाती हुई सत्ता की कुर्सी पर आ धमकी। सोनिया गांधी ने डा. मनमोहन सिंह जैसे मोहरे के सहारे राजधर्म के निर्वाह का फैसला कर लिया।

वामपंथी दल भी जनभावना का आदर करते हुए अपनी जमीनी जरूरतों को नजरअंदाज कर कांग्रेस के साथ हो लिए। गैर दक्षिण पंथी राजनीतिक दल संसद में कांग्रेस नेतृत्व को तब तक इज्जत देती रही जबतक अमेरिका के समर्थन में कांग्रेस बीजेपी की एका की बात खुलकर सामने नहीं आ गई। अमेरिकी हित में संसद का साझा सत्र बुलाकर आणविक संशोधन बिल का पारित करना राष्ट्रीयता की बारीक समझ रखने वालों के लिए आत्मग्लानी पूर्ण था। फिर भी विपक्षी ताकत की विकल्पहीनता ने 2009 में मनमोहन सिंह को दोहराने पर मजबूर किया। यह मजबूरी भी किसी संयोग से कम नहीं है।

दूसरा, संयोग बीते सात साल से सरकार सोनिया गांधी या डा. मनमोहन सिंह में से कौन सरकार चला रहा है? इसका किसी को पता नहीं। देशवासियों में दुविधा कायम है। खतरनाक भ्रम की स्थिति का नजारा है कि मनमोहन सिंह से 24 अकबर रोड में नाराज नेताओं की तादाद बढ़ती जा रही है। अब खुलेआम मनमोहन सिंह को कांग्रेस की मिट्टी पलीद करवा देने का गुनहगार ठहराया जा रहा है। प्रणव मुखर्जी के कोलकाता में खीझकर ये कहना कि अन्ना के बारे में उनसे नहीं चिदम्बरम से पूछा जाय। इसकी एक मिसाल भर है। मनमोहन सिंह को निशाने पर लेते हुए कांग्रेस दफ्तर में आम चर्चा है कि जिसने कभी चुनाव लड़ा नहीं और आगे जिसे कभी चुनाव लड़ना नहीं वो भला मतदाताओं के दुख दर्द और जरूरतों से बाबास्ता कैसे हो सकता है?

अन्ना की आक्रमकता के शिकार कांग्रेस के नेता बेहिचक कहते हैं कि सोनिया गांधी अमेरिका में रहकर स्वास्थ्य लाभ नहीं कर रही होती। अगर वो दिल्ली में होती तो अन्ना हजारे को लेकर सरकार की बुरी गत नहीं होती। मिसाल दिया जा रहा है कि अप्रैल में भी अन्ना हजारे से बीच का रास्ता बनाने में सोनिया गांधी की अहम भूमिका रही थी। राहुल गांधी को मां सोनिया की निष्क्रियता में सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा का सामना करना पड़ रहा है। महाराष्ट्र सरकार की ओर से पुणे के किसानों पर गोली चलाने से पैदा हुई चिंता के समाधान की कोशिश में वो दौड़कर पुणे तो चले जाते हैं पर नाक तले दिल्ली के रामलीला मैदान से पैदा हुई चुनौती पर मौन साध लेते हैं।

गांधी परिवार की पतली हालत ही नहीं एक बड़ा संयोग यह भी है कि बीते आठ साल से भारतीय संसद प्रतिपक्ष के नेता के बिना चल रहा है। जिन्ना के बयान के बाद से धाराशायी हुई लालकृष्ण आडवाणी की छवि सम्हाले नहीं सम्हल पाई। संसद में वह मूर्ति की तरह बने रहते हैं और बीजेपी कैडरों के बीच नापसंद सुषमा स्वराज को मजबूरी वश सदन का नेता बनाकर काम चलाना पड़ रहा है। फिर सुषमा स्वराज और अरूण जेटली में बनी प्रतिद्वंदी संसद के दोनों सदनों-लोकसभा और राज्यसभा, में प्रमुख प्रतिपक्षी दल बीजेपी के अंदर की मतभिन्नता को निरंतर दर्शा रहा है। इससे संसदीय व्यवस्था के प्रति निराशा गहराती जा रही है। बीते संसदीय सत्रों में विपक्ष के हंगामे से संसद के नहीं चल पाने ने भी संसदीय व्यवस्था को बेमानी साबित करना शुरू कर दिया है। लोगों ने सोचना समझना शुरू कर दिया कि जब संसदीय सत्र नहीं चल पाने के बाद भी देश चल रहा है। तो संसद के होने या ना होने से क्या फर्क पड़ता है। पिछले सत्र में संसद के दोनों सदनों से सांसद विकास निधि कोष में भारी इजाफा और उससे पहले के संसदीय सत्र में एक आवाज से सांसदों की पगार बढ़ा लेने के फैसले ने भी हैरान-परेशान लोगों में संसदीय व्यवस्था के प्रति कुढ़न पैदा कर रखी है।

सांसदों के आचरण से पैदा हुई नाराजगी का हवाला देते हुए अन्ना हजारे के अनशन के समर्थन में पहुंचे संसद के कमर्चारियों के जत्थे में शामिल एक शख्स का कहना है कि हालात विकट है। संसद के कर्मचारियों में गुस्सा है। दुर्भाग्यवश आज अगर कोई 2001 सरीखा आतंकी हमला होता है तो अंदर से गेट बंदकर सांसदों को बचाने के लिए जान कुर्बान करने वाले कर्मचारी तक पल्टी मार जाएंगे। अन्ना के आह्वान पर पागल हुई जा रही जनता के पीछे एक कारण सरकार से कल्याणकारी छवि पर लग रहा बट्टा है। 1991 से चले कथित विकासवादी चक्के में सरकार का कल्याणकारी स्वरूप को नफा नुकसान की तराजू पर तोलकर नुकसान पहुंचाया जा रहा है। सहकारिता की सफलता पर खडे देश में सहकारिता सेक्टर के पैसों का टोटा पड़ता जा रहा है। आर्थिक सुधार की गति ने सरकार के कल्याण तंत्र का प्राण सा ले लिया है। लोंगों में सूचिता की कमी के साथ भ्रष्टाचार के बढ़ने की एक बड़ी वजह सरकार के कल्याणकारी विभागों में कर्मचारियों की निरंतर घटती आबादी है।

बढे़ वेतनमान के बीच सरकारी खर्च कम करने के बहाने कर्मचारियों की संख्या निरंतर कम की जा रही है। जबकि बढ़ती आबादी की वजह से नगर निगम व नगर परिषद जैसे तमाम कल्याणकारी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारी नहीं के बराबर बचे हैं। कम्प्यूटरीकरण के नाम पर करोड़ों बहा देने वाले दफ्तरों की हालत ऐसी है कि कम्यूटर पर दर्ज होने वाली शिकायतों का अंबार लगा है। कंम्प्यूटर से ही शिकायतों को हल करने के लिए जारी होने वाले आदेशों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है पर जमीन पर हल करने वाले कर्मचारियों का टोटा पड़ा है। दुर्दशा का आलम है कि सबसे दक्ष कार्यालय भी हर दिन जारी होने वाले सौ में से चालीस शिकायतों का हल कर पा रहा है। साठ लोगों की शिकायतें जस की तस बनी हुई है। कर्मचारियों का यह टोटा भ्रष्टाचार और दलाली की वजह बन रहा है। इससे लोग आहत हैं।

अन्ना के आंदोलन के क्रांति में बदलने और सजीवता की एक वजह हाल के दिनों में गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) की साख में सुधार है। सिर्फ अन्ना हजारे के साथ खडे़ लोगों ने ही नहीं बल्कि कांग्रेस के साथ डटी अरूणा रॉय और हर्षमंदर जैसे लोगों ने भी एनजीओ की साख बहाली का काम किया है। दस साल पहले एनजीओ कहने का मतलब होता था कि सरकारी मदद के दम पर चलने वाले वो संगठन जो भ्रष्टाचार के बूते सरकारी धन लेते हैं और गटक जाते हैं। जमीन पर कुछ नहीं कर पाते हैं। लेकिन आज सोनिया गांधी का एनएसी का दफ्तर भी इन्हीं एनजीओ सेक्टर के हवाले चल रहा है। मतलब सरकार चलाने वाली सबसे बड़ी ताकत सोनिया गांधी ने भी मान रखा है कि सरकारी तंत्र की तुलना में गैर सरकारी संगठनों के साख के सहारे बेहतर काम हो सकता है।

सूचना के अधिकार में लगे संगठनों की तरफ से किए गए अभूतपूर्व काम ने आम जन में एनजीओ की साख बढ़ाई है। यह दीगर है कि सरकार के करीब जाने वाले कुछ एनजीओ पर भ्रष्ट तरीके से संसाधन जुटाने का आरोप बरकरार है। साथ ही यह भी सच है कि साखपूर्ण एनजीओ की मदद से राजनीति व्यवस्था के समानांतर एक बड़ा समाजिक तंत्र खड़ा हो गया है। मिसाल के तौर पर आज भ्रष्टाचारी को एक सांसद से ज्यादा उस आरटीआई कार्यकर्ता से खौफ है जो सरकार से जानकारी मांगकर भ्रष्टाचार की पोलपट्टी खोल सकता है। पहले ऐसी जानकारी पाने का हक सांसद, विधायको, पार्षदों और पंचवर्षीय योजना निगरानी कमेटी में शामिल सामाजिक कार्यकर्ताओं तक ही सीमित था। सक्रियता की वजह से लोगों की जान तो जा रही है पर आरटीआई मूवमेंट ने जड़ता की इस सीमा को तोड़ा  है। सरकार के भ्रष्ट अधिकारियों के लिए भ्रष्टाचार से समाजिक तंत्र को मैनेज करना कठिन होता जा रहा है। इससे काफी हद तक सरकारी तंत्र में अकर्मण्यता की हालत पैदा हुई है। सिर्फ आरटीआई ही नहीं आर्थिक तरक्की की वजह से सरकार के बेरुखेपन ने कल्याण के प्रति जो रिक्तता पैदा की है,  उसे गैर सरकारी लोगों और संगठनों ने अपने स्तर से भरने का काम किया है। यही काम अब इस आंदोलन को हवा देने के काम आ रहा है। आम जन में भरोसा पैदा हुआ है कि अगर वो चाह लें तो अपने स्तर पर भी बहुत कुछ कर सकता है।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने 'आज', 'देशप्राण', 'स्पेक्टिक्स इंडिया', 'करंट न्यूज', होम टीवी, 'माया', दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.


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