बबलू की हाफपैंट सरकारी लोकपाल बिल की तरह खिसक जमीन पर आ गिरी

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अन्ना का जादू भी ग़ज़ब का है। और-तो-और के.जी. में पढ़नेवाले मेरे पुत्र बबलू तक के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। आज तो उसने धमकी ही दे डाली कि जब तक अन्ना की मांगें पूरी नहीं होती वो स्कूल नहीं जाएगा। यह कहते हुए उसने स्कूल बैग से अन्ना टोपी निकाली और इतने जोश से पहनी कि उसकी हाफपैंट सरकारी लोकपाल विधेयक की तरह खिसककर जमीन पर आ गिरी।

मामला अत्यंत संवेदनशील देखकर मैंने भी मनमोहन सिंह की तरह तेजस्वी और ओजस्वी वाणी में आमजनता की तरह अपने बेटे को समझाया- बेटा, यह बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस मामले में मेरी क्या औकात। जो भी करेगी सरकार करेगी। वह बोला- आदमी की तरह व्यवहार कीजिए, सरकार की तरह नहीं। अन्नाजी ने सात दिन से खाना नहीं खाया। उनका छह किलो वजन कम हो गया है। देश दूसरी आजादी की लड़ाई लड़ रहा है और आप लालूप्रसाद यादव की तरह बयान दे रहे हैं। आखिर आप भी सिविल सोसायटी के जिम्मेदार नागरिक हैं।

मुझे लगा कि मेरा लड़का रातोरात अब बेटे से खबरिया चैनल में तब्दील हो गया है। जिसकी बात मैं सुन तो सकता हूं, मगर अपनी बात उससे कह नहीं सकता। पिता-पुत्र की धांसू डिवेट सुनकर अचानक पड़ोस के मंगतूरामजी जो कि यूरिया और शैंपू मिलाकर दूध बनाने के शानदार कारोबार के इज्जतदार व्यवसायी थे और सरकारी खंभे पर कटिया डालकर घर को रोशन करने की खानदानी परंपरा का निष्ठापूर्वक पालन-पोषण कर रहे थे,  चेहरे पर सूफियाना हंसी लाकर बोले- बेटा ठीक ही तो कह रहा है। अगर आज हमने अन्नाजी का साथ नहीं दिया तो देश भ्रष्टाचार से कैसे मुक्त होगा। हम सब का फर्ज़ है कि हम अन्नाजी को अपना नैतिक समर्थन दें।

मैंने घिघयाते हुए कहा- मंगतूरामजी आप जैसा नैतिक बल मुझमें कहां। अन्नाजी के जनलोकपाल विधेयक को लाना न लाना संसद का और सरकार का काम है। हम काहे को दाल-भात में मूसल चंद बनें। वे बोले- आप बुद्धिजीवियों में यही बुरी आदत होती है कि वे कुतर्क बहुत करते हैं। अरे आपसे कोई सर्टीफिकेट मांग रहा है क्या कि आप समर्थन देने योग्य हैं या नहीं। हम चलेंगे तो सरकार पर तगड़ा दवाव बनेगा। कुछ तो लगाम लगेगी भ्रष्टाचार पर। हमारे साथ चलिए रामलीला मैदान। घर पर पडे-पड़े भी क्या करेंगे। चलिए थोड़ा चेंज हो जाएगा। ऑटो रिक्शा भी फ्री चल रहे हैं। और वहां खाना भी फ्री बंट रहा है। देश को भ्रष्टाचार फ्री करना है तो फ्री सर्विस से क्या परहेज़।

मंगतूरामजी ने आंख दबाते हुए अपनी शराफत जताई- अरे देश के लिए कुछ तो त्याग हमें करना ही पड़ेगा। हमारी तो पूरी फेमली ही छह दिन से वहां डटी हुई है। अन्नाजी का वजन छह किलो कम हो गया है। और आप तो जानते ही हैं कि सरकार हर महत्वपूर्ण मुद्दे पिछले दरवाज़े से ही निबटाती है। सुना है अन्ना से भी पिछले दरवाजे समझौते की बात चल रही है। समझौता हो गया तो क्या तब जाओगे रामलीला मैदान। अरे आपसे तो आप का बेटा ही ज्यादा समझदार है। मंगतूराम ने महत्वपूर्ण रहस्योदघाटन किया और भ्रष्टाचार मिटाने रामलीला मैदान की ओर कूच कर गए। मैं नासमझ अपने बेटे को क्या समझाऊं, यह समझ नहीं पा रहा हूं।

इस हास्य-व्यंग्य के लेखक जाने-माने पत्रकार पंडित सुरेश नीरव हैं.


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