न्‍यूज चैनलों के भी तारणहार बन गए अन्‍ना

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भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन ने भले ही सरकार के माथे पर श्रंखलाबद्ध सिलवटें पैदा कर दी हों, लेकिन खबरिया चैनलों की बांछें तेरह दिन, चौबीसों घंटे, ट्वेंटी फोर बाय सेवन खिली रहीं। घंटों तक किसी लचर-सी खबर पर चिपके रहने को अभिशप्त तमाम चैनलों के लिए भी अन्ना तारणहार बनकर आए।

इतने दिनों में अन्ना ने देश को एकजुट करने के साथ ही चैनलों के स्लॉट का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया था। जब तक अन्ना का अनशन चला, तब तक इन चैनलों को न तो गुड मॉर्निग शो का ख्याल रहा और न ही दोपहर में सास-बहू ने साजिश की।

शाम को फिल्मी खबरों से गूंजने वाले गॉसिप के गलियारे भी नीमखामोशी की जद में रहे। हंसोड़ कलाकार कहीं कोने में छिपे बैठे रहे। चौबीस घंटे प्राइम टाइम था और एक ही आवाज थी अन्ना। लाइव प्रसारण की हालत तो ये रही कि कई कोणों से दिखने वाला एंकर का चेहरा घंटों दिखाई ही नहीं दिया।

केवल वीडियो और वॉइस ओवर से काम चलाया गया। फुटेज के लिए माथा पीटने वाले चैनलों को तेरह दिन तक जमकर जिंदा (लाइव) तस्वीरें मिलीं। सरकार के अलावा इस आंदोलन से हर कोई खुश रहा। यहां तक कि ब्रिटेन में बैठी टीम इंडिया और उनका सरपरस्त बोर्ड भी।

क्या लगता है, टेस्ट में इंग्लैंड के हाथों मिली करारी हार के बाद मास्टर ब्लास्टर, कैप्टन कूल, वेरी-वेरी स्पेशल वगैरह को क्या इतनी आसानी से छोड़ दिया जाता? एक-एक गेंद और हर एक रन का हिसाब लिया जाता। मैच के मुजरिम और हार के गुनहगार गिनाए जाते।

बस चलता तो टीम से विश्व चैंपियन का तमगा भी छीन लिया जाता। स्टूडियो में बैठकर जीव (एंकर) और बुद्धिजीव (विशेषज्ञ) छाती कूट रहे होते। लेकिन भला हो अन्ना का। बचा लिया। लोगों के कोप से भी और चैनल वालों से भी। मैच की सारी खबरें चपटी होकर पट्टियों (स्क्रॉल) में समा गईं। लेकिन अब हमारे चहेते चैनल खबरों के लिए फिर कंगाल हो जाएंगे।

मामूली खबरें तरह-तरह की ध्वनियों के साउंड इफेक्ट के साथ ब्रेकिंग न्यूज बनेंगी। एक गॉसिप पर आधे घंटे तक विशेष कार्यक्रम आयोजित होंगे। इसीलिए अब इंग्लैंड के खिलाफ वन-डे सीरीज में टीम इंडिया सावधान हो जाए, क्योंकि अब कैच टपकाने पर भी खूब हाय-तौबा मचेगी। लोग फिर जीत-हार पर शर्ते लगाएंगे। भले टेस्ट मैचों में शर्ते लगा-लगाकर वे लुट-पिट चुके हों।

चैनल बोलेंगे, भले खबर कोई भी हो। बस उनकी टीआरपी की पल्स ऊपर जाने की गारंटी होनी चाहिए। नहीं तो क्या बुराई है मणिपुर की इरोम शर्मिला के अनशन में? फौलादी इरादों वाली यह महिला पिछले 11 सालों से आमरण अनशन पर है। शर्त है सरकार उनके राज्य से आम्र्ड फोर्स एक्ट हटाए।

सरकार उन्हें मना नहीं पाई तो गिरफ्तार कर नली ठूंस दी नाक में। अब इसी से तरल खाना दिया जाता है। लेकिन कितनी बार इस महिला का चेहरा टीवी या अन्य जगह दिखाई दिया? अन्ना के आंदोलन में पूरे देश के साथ असम, अरुणाचल और मणिपुर जैसे राज्य कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। रैलियां कीं। कैंडल मार्च निकाले।

लेकिन शर्मिला की खबरों ने मीडिया में सिर्फ उस समय सांस ली थी, जब आज से एक साल पहले उनके अनशन को दस साल हुए थे। अन्ना ने भी छह महीने पहले सरकार को खूब चेताया था। लोकपाल बिल लाओ, नहीं तो आमरण अनशन होगा। लेकिन सरकारों के कान नहीं होते।

सरकारें अमूमन बहरी होती हैं, लेकिन पिछले दिनों सरकार के बेबुनियाद बयान सुनकर ख्याल आया कि काश वे गूंगी भी होतीं। बहरहाल, अन्ना का अनशन समाप्त होने के बाद जहां सरकार ने राहत की सांस ली होगी, वहीं चैनलों की चिल्लपौं फिर शुरू होने वाली है। साभार : भास्‍कर


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Comments (1)Add Comment
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written by Sareen Chandra Goyal Raj Express Bhopal Repoter, August 29, 2011
जमाना आजकल भीड़ तंत्र का है साथ ही अपने आन्दोलन को आम जनता तक पहुँचाना है तो दो बातों का ध्यान रखे पहला आपके पास भीड़ इकट्ठी करने की ताकत और दूसरा आपका आन्दोलन किसी बड़े शहर से संचालित हो फिर आप देखेगे कि आपकी खबर दिन मैं कई बार दिखाई देगी

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