'दलाली' नहीं ये दर्द की लाली है

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'दलाल'  कहलाना किसे अच्छा लगता है लेकिन क्या करें। मीडिया के ग्लैमर ने उसे इतना चकाचौंध कर दिया है कि वो जो भी कर रहा है। वह उसके लिए अच्छा ही है। मीडिया का अर्थ ही होता है माध्यम। अर्थात वह किसी भी कार्य को पूर्ण करने का माध्यम बन जाता है। जिसे हम अपने शब्दों मे दलाली कहते हैं। इसी दलाली से लोगों की जिंदगी ग्लैमरस हो जाती है। जिससे देखकर हर कोई वहां पहुंचने की कोशिश करता है। मीडिया के इसी ग्लैमर को देखकर हर कोई उसके साथ जुड़ना चाहता है।

मीडिया में दलाली का दौर चलने लगा है। इसका सबसे बड़ा कारण हमारा समाज है और उससे एक कदम आगे बढ़कर मीडिया हाउस भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं। आज भी मीडिया हाउस या तो किसी राजनीतिक व्यक्ति का है या फिर किसी व्यवसायिक घराने का। ये लोग मीडिया हाउस को पैसा छापने की मशीन समझते है और अपने काले कारनामों को भी इसकी आड़ में बेफिक्र होकर अंजाम देते हैं। हमें लगता है इसके लिए कोई उदाहरण देने की आवश्‍यकता नहीं है क्योंकि आप सभी लोग इसको जानते हैं।

किसी भी प्रतिष्ठित अखबार में काम करने वाले व्यक्ति को जितनी तनख्वाह मिलती है उतनी तनख्वाह राज्य सरकार का चपरासी और नगर निगम का एक सफाईकर्मी पाता है। इन अखबारों या चैनलों के संवादसूत्र को कितना पैसा मिलता है इसका अंदाजा सभी को होगा। इतना सब कुछ होने के बाद अगर कोई इन व्यक्तियों से ईमानदारी की उपेक्षा रखता है तो मेरी समझ में यह बेवकूफी है।

आप सब लोगों को जानकर आश्‍चर्य होगा कि देश की सबसे प्रतिष्ठित एक न्यूज एजेंसी के स्ट्रिंगर को केवल इतना पैसा मिलता है कि वह अगर पान अथवा गुटखा खाये तो भी महीने का खर्च न चल सके। इसके बावजूद आप उन लोगों से उम्मीद रखते हैं कि वो ईमानदार बनें। ये कैसे हो सकता है। आज किसी भी मीडिया हाउस में उसी व्यक्ति को नौकरी मिलती है अथवा उसकी नौकरी पूर्ण रूप से सुरक्षित हैं जो अपने संपादक से लेकर मालिक तक की 'गणेश परिक्रमा'  करता है। उसे इसके लिए कोई भी पत्रकारिता की डिग्री नहीं चाहिए। बस उसने गणेश परिक्रमा करने में 'पीएचडी'  किया हो।

इतना सब कहने के बाद इसका यह कतई मतलब नहीं है कि मैं पत्रकारों के दलाली करने के पक्ष में हूं। लेकिन मेरा सिर्फ इतना ही कहना है कि जो अपने जान को जोखिम में डालकर समाज की बुराइयों को साफ करने का काम करता है तो क्या उसके परिवार को समाज में सम्मानपूर्वक जीने का हक नहीं है क्या? क्या एक पत्रकार के बेटे को प्रतिष्ठित स्कूल, कालेजों में पढ़ने का हक नहीं है। अगर आप पत्रकारों से इस बुराई को निकालना चाहते हैं तो उन्हें समाज में सम्मानपूर्वक अपना जीवन जीने के लिए उपर्युक्त सम्मान दें।

मेरा छोटे से शहर बनारस में पत्रकारिता का काफी थोड़ा ही अनुभव है लेकिन मैंने जितना अनुभव किया है उससे हमें काफी निराशा होती है। मैं आपको अपना अनुभव बताना चाहूंगा। बात पिछले लोकसभा के चुनाव की है। देश के प्रतिष्ठित अखबार एक राष्‍ट्रीय नेता की कई दिनों तक खबर नहीं छापता है। बाद में जब मुझे इसके कारण के बारे में पता चलता है तो मैं आश्‍चर्यचकित रह जाता हूं। खबर न छपने का कारण है कि उस नेता ने उस अखबार को विज्ञापन नहीं दिया है। अब आप ही बताइये क्या इस तरह का फैसला कोई रिपोर्टर कर सकता है..... नहीं न।

दूसरा वाकया तो और दिलचस्प है। मैं उस पत्रकार से बहुत अच्छी तरह से परिचित हूं। वह ऐसा शख्स है जो खबरों के लिए कहीं भी पहुंच सकता है और वह अकेले ही हर कार्यक्रम का कवरेज भी कर लेता है। एक बार यहां के एक चर्चित विश्‍वविद्यालय में होने वाली प्रेसवार्ता के लिए इस पत्रकार को आमंत्रण नहीं मिलता है। उस पत्रकार को अपने साथी पत्रकार से इस बात की जानकारी मिलती है। किसी तरह वह विश्‍वविद्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता में पहुंच जाता है। पत्रकार वहां के जनसम्पर्क अधिकारी से इसकी शिकायत करता है। यह बात जनसम्पर्क अधिकारी को नागवार गुजरती है और वह अखबार के संपादक से उस पत्रकार की शिकायत कर देता है। सोचिए आगे क्या होता है...

सम्पादक उस पत्रकार को इस बात के लिए फटकार लगता है और जनसम्पर्क अधिकारी से माफी मांगने के लिए कहता है। इन सब घटना के पीछे कौन सी ताकत है जरा सोचिए...। इसके पीछे का कारण है विज्ञापन। इस घटना के लिए उस अखबार को विश्‍वविद्यालय से विज्ञापन नहीं मिलता। अब आप ही बताइये की जब विज्ञापन के लिए बिना किसी कसूर के एक पत्रकार को विश्‍वविद्यालय के जनसम्पर्क अधिकारी के सामने झुकने के लिए कहा जाता है तो वह स्वच्‍छंद होकर कैसे किसी के खिलाफ लिख सकता है।

आज के युवाओं में मीडिया के क्षेत्र आने को लेकर काफी क्रेज बढ़ा है। जिसका फायदा मीडिया हाउस उठा रहे है। आज लगभग सभी बड़े मीडिया हाउसों ने पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए अपना संस्थान खोल दिया है। जिसमें युवाओं को 100 प्रतिशत जॉब की गारंटी देकर प्रवेश दिया जाता है। इसके बाद क्या होता है वो किसी से छुपा नहीं है। आज से लगभग दस वर्ष पूर्व पत्रकारिता के लिए इतने संस्थान थे क्या? नहीं न। इसका कारण क्या है? जरा सोचिए...

लेखक मनोज कुमार सिंह पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


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Comments (4)Add Comment
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written by dinesh prajapati, August 31, 2011
bat yah hai ki glamour mai sachai najar nahi ati hai.
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written by sudhir awasthi, August 31, 2011
सर आपने बहुत अच्छा लगा दलाली करने वाले देशद्रोही हैं पत्रकारिता संसार में कलंक हैं यह तो त्याग और समर्पण का कार्य है सुधीर अवस्थी पत्रकार बघौली हरदोई उत्तर प्रदेश
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written by Naman, August 30, 2011
Manoj jee dunia ko sacchiye batane ke liye dhanywad par ye baat media se juda hua har aadmi jaanta hai chaye wo chaprasi ho ya chief editor sabhi is baat se parichit hai per ismen thoda bahut doshe media ke glamour ko lekar patrkarita ke jangal mein kudne wale tarun mitron ka bhee hai jo sirf status simbal ke liye ghar se paisa lagake press reporter banne nikal padte hain. jaihind
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written by mini sharma, August 30, 2011
Yeh too sahee hai..... aaj ke date mai media house kamai kaa jaria bane hue hain. per sirf marliko ke liye. karamcharee too bechare kisee naa kisee tarah apne din nikal rahe hain....

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