इन्हें प्रेस क्लब आफ इंडिया में घुसते हुए डर लगता है

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विजेंदर त्यागी: पीसीआई और मेरी यादें - पार्ट एक : बात 1978 की है. वीएम सलूजा "पाना इंडिया" नाम की एक फोटो एजेंसी चलाते थे. मैं न्यूज़ की तस्वीरें लाकर उनको देता था. एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि 11:30 बजे प्रेस क्लब आ कर मिल लो, कोई ज़रूरी काम है. मैं निर्धारित समय पर प्रेस क्लब पहुंच गया, लेकिन क्लब के अंदर जाने की हिम्मत नहीं बटोर सका.

मैं वापस अपने ठिकाने 3 साउथ एवेन्यू लेन पंहुच गया. यह पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर जी का निवास था, जहां मैं उनके सौजन्य से रहता था. करीब 2 बजे मैं सलूजा जी के कनाट प्लेस वाले दफ्तर में पहुंचा. वहां सलूजा साहब के पीए मोहन ने मुझे कुछ काम दिया और कहा कि यह दो असाइनमेंट आपको करनी है. आप को 4 बजे सलूजा साहब ने प्रेस क्लब में बुलाया है. मैंने दोनों काम करके मोहन को दे दिया. फिर अपना स्कूटर लेकर प्रेस क्लब पहुंचा. ग्रामीण परिवार का होने की वजह से मन में संकोच था कि कहीं कोई कुछ सवाल-जवाब करने लगेगा तो क्या करूंगा. हिम्मत अंदर जाने की नहीं पड़ी और मैं फिर वापस आ गया.

लखनऊ प्रवास के दौरान मैं दिल्ली के कुछ कैमरामैनों से परिचत हो गया था. यह वे लोग थे जो काम के सिलसिले में अमेठी, रायबरेली, वाराणसी और इलाहाबाद जाया करते थे. उसी में से इंडिया टुडे की फोटोग्राफर मन्दिरा पुरी थीं, जो बहुत खूबसूरत थीं. उनके रिपोर्टर सुनील सेठी ने उनसे मेरा परिचय करवा दिया था. दूसरे युवक सुरेन्द्र कपूर से भी मेरी घनिष्टता हो गयी. वे उन दिनों प्रेम प्रकाश जी की कंपनी के लिए काम करते थे. उनका दफ्तर उस समय जनपथ पर अजंता फोटो और एशियन फिल्म के नाम से चलता था. मैं उनसे मिलने चला गया और बताया कि ''सलूजा साहब ने मुझे बुलाया है लेकिन प्रेस क्लब में घुसने की हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी'', तब सुरेन्द्र जी ठहाका मार कर हँसने लगे और कहा कि आइये आपको मैं प्रेम जी से मिलवाता हूँ. उन्होंने प्रेम जी से बताया कि इन्हें प्रेस क्लब में जाने से डर लगता है. मेरे लखनऊ के दोस्त हैं, कैमरामैन हैं और चंद्रशेखर जी के साथ रहते हैं. प्रेम प्रकाश जी भी इन बातों को सुनकर हंसने लगे. उन्हों ने मुझे बताया कि तुम्हारा बैकग्राउंड गाँव का है इसलिए तुम शहरी व्यवस्था से घबराते हो. घबराना छोड़ों और अपने प्रोफेशन के लोगों से ज्यादा से ज्यादा मिलते रहो, सब हिचक निकल जाएगी.

सुरेन्द्र कपूर से मिलने के बाद मैं सीधा प्रेस क्लब पंहुचा, लेकिन इस बार भी अंदर जाने की हिम्मत नहीं हुई. वापस लौट गया. जब दूसरे दिन सलूजा साहब से प्रेस क्लब के पास मिला तो उन्होंने कहा कि जब प्रेस क्लब में बुलाया था तो आये क्यों नहीं. मैं ने उन्‍हें सारी बात बतायी और कहा कि साहब वहां तो बहुत-बहुत बड़े-बड़े लोग होते होंगे, मेरी हिम्मत अंदर जाने की नहीं पड़ती. वे भी हंस पड़े और कहा कि चलो अभी तुम्हें लोगों से मिलवाता हूँ. उनके साथ पहली बार मैं प्रेस क्लब में क़दम रखा. उन्होंने मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया के मलिक साहब से मिलवाया. वे आजकल लन्दन में रहते हैं. बात में चमन भारद्वाज और विजय जाली आये, बाद में पता चला कि चमन भारद्वाज आपातकाल में संजय गांधी के नज़दीकी आदमी थे। बाद में लोगों ने  बताया कि उन्होंने संजय के साथ रहकर बहुत पैसा बनाया था. हालांकि बाद में संजय गांधी ने उन्हें बेइज्ज़त करके निकाल दिया था. यहीं से मुझे पत्रकारों के कारनामों के बारे में पता चलना शुरू हुआ. उसके बाद जब भी सलूजा साहब ने बुलाया, मैं प्रेस क्लब जाने से नहीं चूका.

...जारी...

लेखक विजेंदर त्यागी देश के जाने-माने फोटोजर्नलिस्ट हैं और खरी-खरी बोलने-कहने-लिखने के लिए चर्चित हैं. पिछले चालीस साल से बतौर फोटोजर्नलिस्ट विभिन्न मीडिया संगठनों के लिए कार्यरत रहे. कई वर्षों तक फ्रीलांस फोटोजर्नलिस्ट के रूप में काम किया और आजकल ये अपनी कंपनी ब्लैक स्टार के बैनर तले फोटोजर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय हैं. ''The legend and the legacy : Jawaharlal Nehru to Rahul Gandhi'' नामक किताब के लेखक भी हैं विजेंदर त्यागी. यूपी के सहारनपुर जिले में पैदा हुए विजेंदर मेरठ विवि से बीए करने के बाद फोटोजर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय हुए. विजेंदर त्यागी को यह गौरव हासिल है कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से लेकर अभी के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तस्वीरें खींची हैं. वे एशिया वीक, इंडिया एब्राड, ट्रिब्यून, पायनियर, डेक्कन हेराल्ड, संडे ब्लिट्ज, करेंट वीकली, अमर उजाला, हिंदू जैसे अखबारों पत्र पत्रिकाओं के लिए काम कर चुके हैं. विजेंदर त्यागी से संपर्क 09810866574 के जरिए किया जा सकता है.


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