सहारा को बैंकिंग लाइसेंस मिल पाना नामुमकिन!

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अनिल रघुराज: रिजर्व बैंक ‘घुसपैठ’ रोकने को मुस्तैद : सोमवार को रिजर्व बैंक ने नए बैंकों को लाइसेंस देने के नियमों का खाका पेश किया। मंगलवार को सहारा इंडिया समूह की पैरा-बैंकिंग कंपनी सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन लिमिटेड ने घोषणा कर दी कि उसके पास जून 2011 तक जमाकर्ताओं के कुल 73,000 करोड़ रुपए जमा है, जिसे वह इसी साल दिसंबर वापस कर देगी।

उसके बाद उसके ऊपर एक पैसे की भी देनदारी नहीं बचेगी, जबकि रिजर्व बैंक ने उसे इसके लिए 30 जून 2015 तक का वक्त दे रखा है। अगले दिन हर तरफ हल्ला-मच गया कि सहारा समूह अगर एकबारगी 73,000 करोड़ रुपए के डिपॉजिट निकाल लेगा तो सरकारी बांडों के बाजार को झटका लगेगा क्योंकि आरएनबीसी (रेजिड्यूअरी नॉन बैंकिंग कंपनी) होने के नाते सहारा इंडिया फाइनेंशियल सरकारी बांडों या एएए की सर्वोच्च रेटिंग वाले कॉरपोरेट बांडों में ही निवेश कर सकती है। लेकिन इस हल्ले के पीछे की हकीकत यह है कि सहारा इंडिया समूह बैंकिंग में उतरना चाहता है। उसने पिछले कई सालों ने इसकी तैयारी कर रखी है। 73,000 करोड़ की रकम का आंकड़ा उसने सरकार पर परोक्ष दबाव बनाने के लिए किया है, जबकि असल में उसकी कुल देनदारी 9000 करोड़ रुपए से कम है।

असल में रिजर्व बैंक के आदेश के मुताबिक सहारा इंडिया फाइनेंशियल 30 जून 2011 तक जमाकर्ताओं की 9000 करोड़ रुपए से ज्यादा रकम अपने पास रख ही नहीं सकती थी। सहारा समूह जून 2008 में जारी रिजर्व बैंक के इस आदेश का उल्लंघन करने की जुर्रत नहीं कर सकता। इसलिए उसने विज्ञापन में 73,000 करोड़ रुपए के डिपॉजिट्स और चार साल पहले उसे लौटने की घोषणा कर एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश की है। पहला यह कि अनजान जनता और सरकारी अमला उसकी दबंगई का कायल हो जाए और दूसरा यह है कि उसकी यह छवि बने कि वह जमाकर्ताओं के प्रति अपने दायित्व और सरकारी कायदे-कानून की कितनी परवाह और कितना निर्वाह करता है।

वैसे, रिजर्व बैंक के एक प्रमुख सूत्र के मुताबिक सहारा इंडिया की अब तक की जो भी छवि बनी है, उसे देखते हुए उसे बैंकिंग का लाइसेंस मिलना लगभग नामुमकिन है। रिजर्व बैंक को पहले से आभास था कि सहारा जैसे समूह बैंक लाइसेंस पाने की जुगत भिड़ा सकते हैं। ऐसी किसी ‘घुसपैठ’ को रोकने के लिए प्रारूप दस्तावेजों में दस साल के बिजनेस के सफल ट्रैक रिकॉर्ड के साथ ‘गंभीर प्रमाणित छवि’ और ‘विश्वसनीयता व निष्ठा’ की शर्त रखी गई है।

साथ ही कहा गया है कि अगर किसी समूह की आय या आस्तियों का कम से कम 10 फीसदी हिस्सा रीयल एस्टेट से आता है तो उसे बैंकिंग लाइसेंस नहीं मिलेगा। सहारा इंडिया समूह की कम से कम तीन अनलिस्टेड कंपनियां रीयल एस्टेट के धंधे में हैं। समूह के कुल धंधे में इनका ठीकठाक कितना योगदान है, इसका पता सहारा के अंदरूनी लोगों के अलावा किसी को नहीं है। रिजर्व बैंक ने प्रारूप दस्तावेजों में यह भी कहा है कि वह किसी की कंपनी या समूह को बैंक लाइसेंस देने से पहले अन्य विभिन्न नियामकों (जैसे, सेबी), सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय व आयकर विभाग के फीडबैक लेगा। इसके बाद भी लाइसेंस देने का फैसला रिजर्व बैंक के अपने विवेक से तय होगा। दूसरे, शब्दों में रिजर्व बैंक चाहे तो सारी शर्तें पूरी करने के बाद भी किसी कंपनी को बैंक खोलने का लाइसेंस देने से मना कर सकता है।

रिजर्व बैंक के उक्त अधिकारी का कहना है कि सहारा समूह हो सकता है कि अपने राजनीतिक संपर्कों के बल पर वित्त मंत्रालय से दबाव डलवाने की कोशिश करे, लेकिन रिजर्व बैंक ऐसे किसी भी दबाव में नहीं आएगा। गौरतलब है कि सहारा इंडिया समूह ने दो साल पहले ही अंतरराष्ट्रीय सलाहकार फर्म अर्न्स्ट एंड यंग को यह काम सौंपा था कि वह बताए कि सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन को बैंक में कैसे बदला जा सकता है।

लेखक अनिल रघुराज मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई न्यूज चैनलों और अखबारों में प्रमुख पदों पर रह चुके हैं. अर्थकाम डाट काम के संस्थापक और संपादक हैं.


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