यह डिब्बा बंद नहीं होगा नेताजी

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आज़ादी मिलने के कुछ दिनों बाद पंडित जवाहरलाल नेहरु ने कहा था कि अगर हमें एक स्वतंत्र प्रेस जो अराजक होकर नकारात्मक भूमिका निभा रहा हो और एक ऐसा प्रेस जो नियंत्रित हो, के बीच चुनाव करना हो तो मैं पहले विकल्प को चुनूंगा। लगभग 64 साल बाद जदयू के नेता शरद यादव ने संसद में अपने भाषण में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को डिब्बे की संज्ञा देते हुए बंद करने की वकालत की।

उनका कहना था कि 13 दिन से डिब्बा केवल अन्ना और आंदोलन दिखा रहा हैं, चौबीसो घंटे। उनका आरोप था कि इस देश में 20 लाख लोग भूखे सो जाते है तो मीडिया के कान पर जूं नहीं रेंगती लेकिन अन्ना 13 दिन से आंदोलन करते हैं तो इतना हंगामा बरपा। यह समझ में नहीं आया कि शरद यादव का ऐतराज किस बात पर था? उन्हें शायद तर्कशास्त्र के मूल सिद्धांत और कार्य-कारण संबंध की जानकारी नहीं है। अगर होती तो उनका अपना ही तर्क वाक्य मीडिया की वर्तमान भूमिका को सही सिद्ध करता है। क्यों इस डिब्बे को चौबीसों घंटे बगैर खाए–पिए उस ज़िम्मेदारी को निर्वहन करना पड़ा जो मूलरुप से शरद यादव जैसे राजनीतिक लोगों की ज़िम्मेदारी थी? 20 लाख लोग भूख सोते है तो इसका कारण मीडिया नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्ग है। नीति मीडिया नहीं बनाती है सरकार और संसद बनाते हैं।

भारत का प्रजातंत्र एडवरसेरियल है। इसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष मुद्दे पर जनता के सामने जाते है और एक–दूसरे को चुनौती देते हैं। शरद यादव अपने राजनीतिक जीवन में अधिकांशत: विपक्ष में रहे हैं और कुछ साल सत्ता में। कितनी बार उन्होंने भ्रष्टाचार, गरीबी, आर्थिक विषमता पर या ऐसे ही अन्य सामाजिक मसलों पर इतना व्यापक जनआंदोलन किया? दरअसल सुविधाभोगी राजनीतिक वर्ग ने यह सुनिश्चित किया कि उनका सुविधाभोगी जीवन निर्बाध चलता रहे और मुद्दे संसद के दहलीज पर जाकर दम तोड़ दें। ऐसे में जनता का राजनीतिक वर्ग से मोहभंग हो जाता है तो वह गैर राजनीतिक वर्ग, संस्थाओं और महापुरुषों की तरफ रुख करती है।

प्रजातंत्र में मीडिया की भूमिका से नाराज़ राजनीतिक वर्ग को शायद यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि संविधान बनाने वाले महापुरुषों ने अनुच्छेद 19(1) में प्रावधान किया हैं - अभिव्यत्ति की स्वतंत्रता। उन्हें यह भी मालूम नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता रास्ता केवल विधानसभाओं और संसद के चुने हुए कुछ प्रतिनिधियों की तरफ से नहीं जाता बल्कि एक बड़ा रास्ता रैली, धरना-प्रर्दशन से भी होकर जाता है। और इस प्रक्रिया का शुमार प्रजातंत्र के मूल तत्वों में किया जाता है।

आज से कुछ समय पहले तक जब समाज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर गैर जनउपयोगी कन्टेंट देने का का आरोप लगता था तब इस मीडिया ने इसको सकारात्मक तरीके से लिया। स्वनियंत्रण के प्रयास के तहत हमने रेगुलेटरी आथॉरिटी बनाई। संपादकों की एक संस्था ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के रुप में आई और सभी संपादक चैनलों को और जनोपयोगी बनाने का सार्थक प्रयास कर रहे हैं।

तब आज किस बात पर ऐतराज है? क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ हर जिले, हर शहर, हर प्रान्त में जनआंदोलन चल रहा हो तब हमें राखी सांवत का डांस दिखाना चाहिए था? क्या भारतीय मीडिया ने ऐलान किया था कि अगर शरद यादव सरीखे तथाकथित समाजवादी अन्ना के पहले या अन्ना के साथ एक समानांतर आंदोलन छेड़ें तो वह इसे कवरेज नहीं देगा? क्या मीडिया ने इस दौरान राजनीतिक वर्ग की बाईटें लेना बंद कर दिया था? क्या शरद यादव, लालू यादव या राहुल गांधी जब लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे थे तो क्या इन्हें इस डिब्बे ने नहीं दिखाया?

64 साल में राजनीतिक वर्ग ने अपने मूल कर्तव्य का पालन नहीं किया और सड़े सिस्टम के सहारे गरीबों का मांस नोच कर खाते रहे और दोषपूर्ण चुनाव व्यवस्था के ज़रिए ए.राजा और कलमाड़ी पैदा करते रहे, क्या इसमें भी मीडिया का दोष था? आज से कुछ वर्षों बाद जब भ्रष्टाचार से पनपे आंदोलन का विश्लेषण होगा, भारतीय मीडिया को विश्लेषक मानक के रूप में प्रस्तुत करेंगे। जहां तक इस डिब्बे को बंद करने का सवाल है शरद यादव यह भूल रहे है कि यह किसी राजनेता के एहसान का प्रतिफल नहीं है। यह भारतीय प्रजातंत्र का आपरिहार्य उत्पाद है और इसे बंद करना किसी भी संसद की ताकत से बाहर है। 13 दिन से ज्यादा चौबीसों घंटे आंदोलन दिखाने से मीडिया को आर्थिक नुकसान ही हुआ होगा। अन्ना हज़ारे कोई कॉर्पोरेट नहीं हैं जिन्हों ने विज्ञापन दिया और ना ही यह खबरें पेड न्यूज़ थीं, जिसके बारे में राजनीतिक वर्ग हंगामा खड़ा कर रहा है।

अगर यह आंदोलन गलत था, अगर मीडिया ने इसे अतिरंजित करके पेश किया तब क्यों झुकी पूरी संसद और क्यो नहीं किसी शरद यादव या किसी लालू यादव ने संसद से इस्तीफा दे दिया? तस्वीर का एक दूसरा पहलू देखिए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने किसानों की ज़मीन अधिग्रहण के खिलाफ धरना दिया। देश के 32 ओ.बी वैन ने पूरे धरने को कवर किया। अंतिम दिन अलीगढ़ में केवल कुछ हज़ार आदमी ही जुट पाए। अगर मीडिया के कवर करने से जनआंदोलन बनता होता तो देश में राहुल गांधी का यह आंदोलन भी महज एक स्थानीय घटना ना बना होता बल्कि एक जनआंदोलन के रूप में खड़ा होता। राजनीतिक वर्ग ने जनता में अपनी विश्वसनीयता खो दी है जिसकी वजह से जनता गैर राजनीतिक संस्थाओं व व्यक्तियों को अपना रहनुमा मानने लगी है।

दरअसल पिछले कुछ वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अपने कर्तव्य को पूरी तरह पहचानते हुए एक सश्क्त भूमिका निभायी है इसमें दो राय नहीं है। विश्व के किसी भी प्रजातंत्र में एक स्टिंग ऑपरेशन के वजह से लगभग एक दर्जन सांसद एक झटके में नहीं निकाले गए। यह भारत की मीडिया ने ही संभव करके दिखाया है। निठारी में कंपकपाती ठंड में भारतीय मीडिया ही दिन-रात जनता को हकीकत से रूबरू कराता रहा जबकि पुलिस वाले भी ठंड ना बर्दाश्त करके अपनी ड्यूटी से गायब हो गए। मुंबई हमले और अयोध्या फैसले पर भारतीय मीडिया ने जिस शालीनता का परिचय दिया वह किसी से छिपा नहीं है। और यह सब करने में कहीं भी कोई कॉर्पोरेट इंट्रेस्ट नहीं था बल्कि कर्तव्य के प्रति निष्ठा थी।

आज जरूरत इस बात की है कि प्रजातंत्र की गुणवत्ता बेहतर करने के लिए राजनीतिक वर्ग अपने गरेबान में झांके और अपने को जनता के प्रति उपादेय बनाए, बजाय इसके कि भारतीय मीडिया पर नकेल डालने की कोशिश करे और वह भी इसलिए कि उसने एक सार्थक जनआंदोलन को जनता तक पहुंचाने का पुनीत कार्य किया है।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख दैनिक भास्‍कर में छप चुका है. वहीं से साभार लेकर इसे प्रकाशित किया गया है.


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