मीडिया और दो आंदोलनों की दास्‍तान

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मणिपुर वूमेन गन सर्वायवर्स नेटवर्क की संस्थापक बीनालक्ष्मी नेप्राम ने मुझसे अपनी सुपरिचित व्यग्रता के साथ पूछा : ‘आप इरोम शर्मिला के एक दशक से चल रहे अनशन का कवरेज उतनी ही मुस्तैदी से क्यों नहीं करते, जैसा आपने अन्ना हजारे के तेरह दिन के अनशन का किया था?’

एक लाइव प्रोग्राम में स्टेज पर पूछे गए इस सवाल से बच निकलने की कोई गुंजाइश नहीं थी। मैंने एक कमजोर-सा जवाब दिया : ‘शायद इम्फाल की तुलना में रामलीला मैदान टीवी स्टूडियो के अधिक निकट है।’ ‘दूरी की मजबूरी’, यह इस सवाल के लिए महज एक अधूरी सफाई ही हो सकती है कि आर्म्‍ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर्स एक्ट (एएफएसपीए) के उन्मूलन की मांग को लेकर नवंबर 2000 में अनशन शुरू करने वाली एक 39 वर्षीय महिला के संघर्ष की कहानी टीवी चैनलों की सुर्खियां क्यों नहीं बनी।

हां, जब मणिपुरी महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर विरोध प्रदर्शन किया था, तब जरूर राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान कुछ समय के लिए इस त्रासदी की ओर गया था। लेकिन इस मसले को पूर्वोत्तर की परंपरागत उपेक्षा के चश्मे से देखना वास्तव में इस मौजूदा हकीकत की ही उपेक्षा करना होगा कि मीडिया और प्रबुद्ध नागरिकों की नजरों में ‘जनतांत्रिक’ प्रतिरोध के क्या मायने हैं।

एक क्षण के लिए इरोम शर्मिला के साहसपूर्ण संघर्ष को भूल जाएं और मेधा पाटकर के बारे में विचार करें। इसी साल मई में पाटकर ने मुंबई में झुग्गी-झोपड़ियों को हटाए जाने के विरोध में नौ दिन का अनशन किया था। उनके अनशन ने स्थानीय अखबारों का ध्यान जरूर खींचा था, लेकिन टीवी कैमरे इफरात में नजर नहीं आए थे।

झुग्गी-झोपड़ियों को हटाना एक ऐसा मसला है, जो शहरी मध्य वर्ग को असहज कर देता है। यह वर्ग मेधा पाटकर को एक ‘ट्रबल मेकर’ की तरह देखता है, फिर चाहे बांध परियोजना प्रभावितों के पुनर्वास की मांग हो या सिंगुर में टाटा नैनो प्लांट का विरोध। लेकिन जब वे ही मेधा पाटकर टीम अन्ना के मंच पर खड़ी होकर तिरंगा फहराती हैं तो वे साहस व आदर्शवाद की प्रतिमूर्ति बन जाती हैं।

या फिर वकील-सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण के बारे में ही विचार करें। चंद माह पूर्व जब वे कथित माओवादियों के लिए केस लड़ रहे थे या अरुंधती राय की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का समर्थन कर रहे थे तो मीडिया के एक वर्ग ने उन्हें ‘राष्ट्रविरोधी’ करार दे दिया था। आज वही मीडिया उन्हें भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष कर रहे एक योद्धा की तरह देख रहा है। जब भूषण और पाटकर ने यथास्थिति को चुनौती दी तो उन्हें निशाना बनाया गया, लेकिन जब वे धारा के साथ बहने लगे तो उन्हें नायकों-सा सम्मान दिया गया।

वास्तव में तथ्य यह है कि ‘भ्रष्टाचार विरोध’ एक ऐसा लोकप्रिय ब्रांड है, जो बहुतेरे लोगों को आकर्षित करता है। अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता की वजह थी उसका सरल और समावेशी चरित्र। यह एक ऐसा आंदोलन था, जो मेधा पाटकर, श्रीश्री रविशंकर और ओम पुरी के साथ ही लाखों अनाम भारतीयों को एक मंच पर ला सकता था। और यही अन्ना और इरोम शर्मिला के आंदोलन का भेद भी है।

एक आंदोलन को संगठित करने वाला माना जाता है तो दूसरे को विभाजित करने वाला। अन्ना का आंदोलन महज जनलोकपाल बिल के ब्योरों के बारे में ही नहीं था, भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन-मन में पैठे आक्रोश का एक सशक्त प्रतीक भी था। मध्य वर्ग के लिए अन्ना का तपश्चर्यापूर्ण आंदोलन उनकी अपनी उपभोक्तावादी जीवनशैली से विपरीत था, इसलिए अन्ना टोपी पहनने का मतलब था, कुछ देर के लिए ही, लेकिन एक संतुलन स्थापित करना। इस आंदोलन ने आर्थिक रूप से समृद्ध लोगों को सहसा राजनीतिक रूप से भी सशक्त होने का अहसास कराया।

इसके विपरीत इरोम शर्मिला आम नागरिकों के समक्ष एक अधिक जटिल विकल्प प्रस्तुत करती हैं। मणिपुरियों के लिए वे एक स्थानीय नायिका हैं, जो सेना द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन के विरोध की प्रतीक हैं। लेकिन देश के अन्य भागों के लोग उनके आंदोलन को एक ऐसे संघर्ष के रूप में देख सकते हैं, जो भारतीय राज्यसत्ता की संप्रभुता को प्रश्नांकित कर रहा है। मणिपुरी लोग एएफएसपीए को बुनियादी स्वतंत्रता का हनन करने वाली इकाई के रूप में देख सकते हैं, लेकिन ऐसे लोग भी कम नहीं होंगे, जो उसे उग्रवाद से ग्रस्त क्षेत्र के लिए आवश्यक मानें।

इन अर्थो में इरोम शर्मिला के अनशन को राष्ट्रवादियों द्वारा ठीक उसी तरह भारतीय राज्यसत्ता को एक चुनौती माना जाएगा, जैसे वे जम्मू-कश्मीर के किसी लोकप्रियतावादी आंदोलन को भारतीय संप्रभुता के लिए एक खतरा मानते हैं।

लेकिन विडंबना है कि अन्ना और इरोम शर्मिला दोनों में ही कई समानताएं भी हो सकती हैं। जहां दोनों ही अनशन का इस्तेमाल प्रतिरोध के एक शांतिपूर्ण शस्त्र की तरह कर रहे हैं, वहीं वास्तव में वे राज्यसत्ता के दुरुपयोग पर सवालिया निशान भी लगा रहे हैं। सत्ता के दुरुपयोग की वजह है कुप्रशासन। जहां सुप्रशासन विफल हो जाता है, वहीं भ्रष्टाचार की विषबेल पनपती है। चाहे मणिपुर हो या जम्मू-कश्मीर, एएफएसपीए जैसे कठोर कानून को लागू करना वास्तव में एक प्रशासनिक संकट को दर्शाता है। वस्तुत: मणिपुर और जम्मू-कश्मीर ने हिंसा के कारण उतना कष्ट नहीं सहा है, जितना कि भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र के कारण।

इसीलिए हर वह व्यक्ति, जो एक सशक्त लोकपाल बिल की मांग कर रहा है, उसे एएफएसपीए के उन्मूलन की मांग का भी समर्थन करना चाहिए। और इसीलिए अन्ना हजारे को गंभीरतापूर्वक इरोम शर्मिला के इस अनुरोध पर विचार करना चाहिए कि वे मणिपुर आएं और उनके संघर्ष के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करें। यह पूरी तरह एक प्रतीकात्मक यात्रा हो सकती है, लेकिन इससे यह जरूर होगा कि टीवी कैमरे मणिपुर की त्रासदी की ओर रुख करने को भी विवश हो जाएंगे, चाहे एक दिन के लिए ही सही।

आईबीएन7 के प्रमुख राजदीप सरदेसाई का यह लेख दैनिक भास्‍कर में छप चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे प्रकाशित किया जा रहा है.


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