दलितों का हो अपना मीडिया

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दलितों की कोई नयी मांग नहीं है कि उनका अपना मीडिया हो। हिन्दुवादी मीडिया में दलितों का अपना कोई व्यापक मीडिया नहीं है और न ही हिन्दुवादी मीडिया की तरह व्यवसायिकता और व्यापकता के साथ भारतीय मीडिया पर काबिज है। कहने के लिए तो सैकड़ों दलित पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं, जो दलितों द्वारा संचालित हो रही है।

पत्र और पत्रिकाओं के मालिक संपादक, सभी दलित हैं। लेकिन आज दलित मीडिया राष्ट्रीय पटल पर स्थापित होने की छटपटाहट में है। यह छटपटाहट हाल-फिलहाल की नहीं है। दलितों के ऊपर उत्पीड़न, शोषण और उनकी खबरों को हिन्दुवादी मीडिया द्वारा अपने तरीके से परोसे जाने को लेकर दलितों के बीच प्रतिरोध है। शुरू से ही भारतीय हिन्दू मीडिया दलितों की खबरों को अपने तरीके से संजोती परोसती और दिखाती रही है। हमेशा से दलित-पिछड़े हिन्दुवादी मीडिया के बीच उपेक्षित रहे हैं। कुछ खबरों को दिखा देने पर यह कतई नहीं माना जा सकता कि हिन्दुवादी मीडिया के दिलों दिमाग पर दलितों को लेकर कुछ जज्बा है। अगर खबरें आ भी जाती है तो ऐसा प्रतीत होता है कि मानों कोई एहसान कर रहे हों। दलित मुद्दों के विशेषज्ञ मानते हैं कि दलितों को हिन्दुवादी मीडिया से शिकायत नहीं करनी चाहिये कि वे उनकी बातों को मीडिया में नहीं रखते हैं बल्कि दलितों को सोचना चाहिये कि उनका अपना खुद का मीडिया हो। खुद अपना मंच तैयार करें और अपनी बातों को समाज-देश-व्यवस्था के समक्ष रखे। दलितों को अपनी हर बात को रखने के लिए अपने अखबार/पत्रिकाएं/टीवी चैनल/अंतरजाल पत्रिका हो। मीडिया के हर माध्यम हो, शर्त हो कि वह अपना हो किसी के भरोसे का नहीं।

हालांकि दलितों का अपना मीडिया हो, इस दिशा में दिल्ली, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों से प्रकाशित दलित पत्र और पत्रिकाओं को राष्ट्रीय फलक पर लाते हुए अपना मीडिया बनाने का प्रयास जारी है। इस दिशा में कई पत्र और पत्रिकाएं अपनी पहचान बनाने की दिशा में हैं। दिल्ली से साहित्य, संस्कृति तथा सामाजिक सरोकारों को लेकर निकाल रहे हिन्दी मासिक ‘बयान’ को इसके संपादक मोहनदास नैमिशराय ने राष्ट्रीय पटल पर लाया है। वहीं अशोक कुमार अंतरजाल की पत्रिका ‘दलितमत’ के माध्यम से दलित मुद्दों की बात करते हुए सक्रिय है, वहीं पिछले कुछ समय से पटल पर उभरी ‘बहुरि नहीं आवना’ प्रख्यात दलित साहित्यकार श्यौराज सिंह ‘बेचैन’ के संपादन में दलितों के बीच में नयी बहस छेड़ते हुए एक आयाम बनाने की दिशा में अग्रसर है।

लंबे समय से अपना, ‘दलित मीडिया’ को लेकर चर्चा है कि दलितों का अपना मीडिया होना ही चाहिए जो दलितों के हक के लिए पूरे जज्बें के साथ, पूरी ईमानदारी के साथ, पूरी निष्ठा के साथ बातों को जोरदार ढंग से राष्ट्रीय पटल रखे। दलितों का अपना मीडिया हो इसे लेकर दलितों के महानायक मान्यवर कांशी राम ने अपनी बात जोरदार ढंग से उठायी थी और नागपुर से प्रकाशित ‘बहुजन नायक’ मराठी साप्ताहिक के बाइसवें स्थापना दिवस के अवसर पर तीस मार्च दो हजार दो को एक भव्य समारोह में जनसमूह को संबोधित करते हुए महानायक के संपादक मान्यवर कांशी राम ने दलितों का अपना मीडिया हो, इसे लेकर पुरजोर वकालत की थी।

मान्यवर कांशी राम जी ने अपने संबोधन में कहा था कि ‘बहुजन नायक’ को चलते हुए पूरे बाइस साल हो गए हैं, जिसके बारे में आप सब लोगों को जानकारी है। आप लोगों के सहयोग से बाइस साल यह पेपर चला है। इस पेपर को चलाने वाले लोग, इस पेपर में विचार रखने वाले लोग, इस पेपर को पढ़ने वाले लोग, इस पेपर को बगैर किसी विज्ञापन के चलाने वाले लोग-इन सबके सहयोग से ये काम आज तक हुआ है, इसलिए मैं इसकी सराहन करता हूं। जिस दिन यह पेपर शुरू हुआ था, मैं नागपुर में, कई दिन-कई रात के लिए दिल्ली से चलकर आया था। किस किस्म की हमें मेहनत करनी पड़ी थी, उसकी जिक्र भालेराव ने कुछ इधर किया है, और उस वक्त के हमारे साथी अच्छी तरह से जानते हैं। उस दिन से लेकर आज तक जो हम लोगों ने मेहनत की है, उसके बारे में भी बहुत कुछ कहा जा चुका है, लेकिन समय अभाव के कारण मैं उसकी ज्यादा चर्चा नहीं करूंगा। मैं इतना जानता हूँ कि मुझे हिंदी भाषा भी अच्छी नहीं आती है पढ़ने और लिखने के लिए मराठी का तो सवाल ही पैदा नहीं होता, इसलिए मैं इंग्लिश भाषा में ही आज तक सोचता रहा हूं, सोच बनाकर उसको आग बढ़ाने का प्रबंध करता हूं और मैं लिखता रहा हूं, जब हमारे पास साधन नहीं होते थे, थोड़े-थोड़े साधन इकट्ठे करके मैं बुलेटिन निकाला करता था। पहले उन्नीस बुलेटिन जो मैंने निकाले हैं, उनमें क्या लिखा हुआ था, वो आज हमारे पास उपलब्ध नहीं है उसके बाद के कुछ बुलेटिन आज हम लोगों ने सुरक्षित किए हैं। उसके बाद एक पाक्षिक भी मैंने शुरू किया ‘आप्रेस्ड इंडियन’ नाम का ‘स्पोक्समैन आफ दी आप्रेस्ड एण्ड एक्सप्लायटेड’, ‘दलित-शोषित समाज का मुखपत्र’।

मैं इसे काफी लंबे अरसे तक खुद एडिट (संपादन) करता रहा हूं, खुद उसके लिए सारा प्रबंध करता रहा हूँ और उसको इस्तेमाल करके मूवमेंट को आगे बढ़ाता रहा हूँ। उसी वक्त से मैं सोचता रहा हूँ कि इंग्लिश जानने वाले लोग बाबा साहेब अंबेडकर की मेहरबानी से एक नई क्लास (वर्ग) इस देश मैं पैदा हुई है। पढ़-लिखकर नौजवान साथी, कुछ अंबेडकर से प्रभावित हुए है, जैसे मैं प्रभावित हुआ। मुझे लगा कि अगर मैंने प्रभावित होकर अपने आपको इस काम के लिए डेडिकेट (समर्पित) किया है, तो समाज में दूसरे लोग भी जरूर मिलेंगे, जो मेरे जितना नहीं, तो कुछ न कुछ योगदान देने के लिए जरूर मिल सकेंगे। इस बात को सोचकर पढ़े-लिखे कर्मचारियों को ढूँढ़कर, अपनी बात कहकर, उनकी बात सुनकर, उनको बाबा साहेब अंबेडकर की मूवमेंट  पर चलाने के लिए प्रभावित करने का काम मैंने शुरू किया। ‘बामसेफ’ नाम का एक संगठन बनाया ‘बामसेफ’ के नाम पर एक छोटी सी किताब लिखकर उसका उद्देश्‍य क्या है उस उद्देश्‍य को हम कैसे पूरा कर सकते हैं, यह बताया। पढ़े-लिखे कर्मचारी होने जिनके बारे में बाबा साहेब डा. अंबेडकर ने अठारह मार्च उन्नीस सौ छप्पन को आगरा में कहा था कि इन्होंने (पढे़-लिखे कर्मचारियों ने) मुझे धोखा दिया है, ऐसे धोखा देने वाले समाज के अंग को, समाज के हित में संगठित करने का काम मैं ने शुरू किया। ‘बामसेफ’ का जन्म होने के बाद समाज में पढ़े-लिखे कर्मचारी बहुत कुछ कर सकते हैं, अतः उनके लिए मैंने स्क्वैड्स बनाई। मुझे मालूम है कि मैंने बीस स्क्वार्ड्स बनाए-बामसेफ ब्रदरहुड, बामसेफ अडॅप्श्‍न, बामसेफ को-ऑपरेशन इत्यादि। इस किस्म के बीस स्क्वार्ड्स बनाकर मैंने पढ़े-लिखे कर्मचारियों को संगठित करके फूले-शाह-अंबेडकर की विचारधारा को आगे बढ़ाने काम शुरू किया। ये जानते हुए भी कि पढे़-लिखे कर्मचारियों के लिए लिमिट (मर्यादा) है, सिविल सर्विस कंडक्ट रूल की लिमिट है, ये लोग समाज को अपने पैरों पर खड़ा कर सकते हैं समाज को मूवमेंट को आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन वो भी सिविल सर्विस कंडक्ट रूल को ध्यान में रखकर। इसलिए मैं ने सारी योजना बनाई, सारा प्रोग्राम बनाया लेकिन उसकी लिमिटेशन को ध्यान में रखकर। बाद में डी.एस.-4 (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) बनाई। बगैर संघर्ष के मूवमेंट आगे नहीं बढ़ सकती।

दलित शोषित समाज का संघर्ष अपने पैरों पर खड़ा होकर अपने समाज की बात को आगे बढ़ाने का प्रबंध डी.एस.-4 के माध्यम से शुरू किया। इस सारे समय में सोच-विचार करके कि बाबा साहेब अंबेडकर की मूवमेंट आगे क्यों नहीं बढ़ सकी, उससे सबक सीखकर मैंनें एक सेमिनार, दस सिवोजियम, आप्रेस्ड इंडियन में एक लेख लिखकर, उसके बारे में चर्चा शुरू की। लोगों के दिमाग में उथल-पुथल हो सके, वह सोचने के लिए समाज मजबूर हो, मैंने वो आर्टिकल (लेख) लिखा था, क्योंकि अंबेडकरवाद को हमें रिवाइव (पुर्नजीवित) करना है, जो उस वक्त तक लगभग खत्म हो चुका था। अगर उसको रिवाईव करना है, तो जिन लोगों ने उसको रिवाइव करना है, उनकी जिम्मेदारी है कि उसको सरवाईव (टिका कर रखना) भी करें, लंबे अरसे तक चलाने का प्रबंध भी करें। क्या ये हो सकता है। ऐसा लोगों के सामने मैंने विचार रखा। इस प्रकार मैंने मीडिया की जरूरत हो समझा। चाहे बुलेटिन के माध्यम से हो, ‘आप्रेस्ड इडिंयन’ के माध्यम से हो, जो हमारे समाज के पढे़-लिखे कर्मचारियों का एक क्लास (वर्ग) पैदा हुआ था, उनके लिए एक साधन पैदा किया। लेकिन मुझे यह मालूम था कि ये साधन तो पढ़े-लिखे नौजवान कर्मचारियों के लिए तो ठीक हैं। वे इंग्लिश भाषा में इसे पढ़कर, सीखकर कुछ समझ सकते हैं, लेकिन हमारा समाज तो ज्यादा इंग्लिश नहीं जानता है। बहुत बड़े हिस्से में हिंदी जनता है। बहुत से प्रदेशों में, जिसमें सिर्फ लोकल (भाषा) भाषा जानते हैं, इसलिए इन सब भाषाओं हमें अपना मीडिया बनाना चाहिए। अपने मीडिया का प्रबंध करना चाहिए। उसके लिए मैं ने बहुत पहले शुरुआत की। बहुत सी भाषाओं में शुरुआत की। हिंदी का ‘बहुजन संगठन’ सबसे पहले शुरू किया। वो आज तक चल रहा है। बाइस साल से ज्यादा समय हुआ, अभी तक चल रहा है। बाइस साल पहले ‘बहुजन नायक’ शुरू किया। खुशी की बात है कि वो भी आज तक चल रहा है। लेकिन मुझे इस बात का ज्ञान था कि हमें डेली न्यूज पेपर (दैनिक पत्र) की जरूरत है। मूवमेंट को आगे बढ़ाने के लिए एक इंग्लिश और हिंदी में दिल्ली से पढे़-लिखे कर्मचारियों को सगंठित करके मैंने इंग्लिश और हिंदी में दैनिक पेपर की कोशिश शुरू की और नागपुर से मराठी पेपर की। लेकिन हम उस कोशिश में कामयाब नहीं हो सके। लेकिन जो शुरू कर सके, उसे हम सर्वाइव नहीं कर सके।

मान्यवर कांशी राम जी के संबोधन से साफ है कि उन्होंने दलितों के लिए अपना मीडिया हो इसे लेकर वे चिंतित रहे। ऐसा नहीं कि यह चिंतन केवल मान्यवर कांशी राम जी की हैं, बल्कि इस दिशा में बयान के संपादक व चर्चित लेखक-पत्रकार मोहनदास नैमिशराय जी ने पहल करते हुए ‘बयान’ को राष्ट्रीय पटल पर लाया है। साथ ही बहुजनों का अपना मीडिया हो, इसे स्थापित करने की दिशा में काम जारी है लेकिन यह काम अभी भी नहीं के बराबर में है। एक भी पत्र-पत्रिका-चैनल-अंतरजाल नजर नहीं आता जिसने राष्ट्रीय पटल पर स्थान बनाते हुए दलितों के अपने सिर्फ अपने मीडिया की वकालत करता दिख रहा हो। इस दिशा में दलित चिंतकों, पूंजीपतियों और मध्यवर्ग को आगे आना होगा और दलितों के अपने मीडिया को स्थापित कर, एक अपनी आवाज को बुलंद करना होगा। हालांकि देखा जाता है कि कई दलित पत्र-पत्रिकाओं को अपनी पत्नियों के नाम से कुछ लोग निकालते हैं। ऐसे में पत्र-पत्रिकाएं तो निकल जाती है लेकिन वह स्वरूप नहीं मिल पाता जो मिलना चाहिये। बस भड़ास या फिर कहने के लिए दलित हित के लिए पत्र-पत्रिकाओं को प्रकाशन करते हैं। दलित पत्र-पत्रिकाओं निकलती तो हैं लेकिन एक-दो या कुछ अंक के निकलने के बाद बंद हो जाते हैं। दलितों का अपना मीडिया हो को लेकर मान्यवर कांशी राम हो या मोहनदास नैमिशराय या फिर डा.श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, सभी ने हिन्दुवादी भारतीय मीडिया के चरित्र को समझ कर ही अपनी अलग मीडिया की वकालत करते हुए इसे खड़ा करने की बात कही है, जिस तरह से दलित मुद्दों/तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है या उन्हें आने नहीं दिया जाता है, उसे देख कर सवाल उठना लाजमी है।

सबसे बड़ा सच यह है कि मीडिया निजी हाथों का खिलौना है और ऐसे में दलित प्रतिनिधित्व की उससे अपेक्षा करना उचित नहीं। मीडिया से उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह दलित मसले को सकारात्मक ढ़ग से उठाये। वह तो बाजार व अपनी हिन्दुवादी मानसिकता को तरजीह देता रहा है। हाल में ही मायावती सरकार के शासन को मीडिया ने निरंकुश शासन बता दिया। एक जाने माने टीवी पत्रकार ने आधे घण्टे के कार्यक्रम में मायावती सरकार को गरियाते ही रहे। वहीं बिहार सरकार ने अपने अहम फैसले में राज्य में 30 अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति थाना खोलने का निर्णय लिया तो बिहार की मीडिया में लीड समाचार पत्रों ने इसे अंदर के पेज में जगह दी जबकि अंग्रेजी अखबार ने मुख्य पृष्ठ पर छोटी खबर चिपका दी। दलितों को गोलबंद करने और उनकी बातों को रखने के लिए अपना मीडिया ही एक मात्र विकल्प बचता है। यह भी सच है कि यह काम दलितों को खुद करना होगा। उन्हें केन्द्र और राज्य सरकारों पर दबाव बनाना होगा कि विज्ञापन के रूप में दलितों का हिस्सा तल्काल उनकी पत्र पत्रिकाओं को जारी किया जाये। यह भी सच है कि भविष्य दलित मीडिया का ही है, क्योंकि सच को कहने का साहस दलितों में ही है।

लेखक संजय कुमार पटना में इलेक्‍ट्रानिक मीडिया से जुड़े हुए हैं.


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Comments (27)Add Comment
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written by SHIV KUMAR, October 11, 2014
aap itna likhe ki logo ke dilo par chha jaye
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written by Dr komal shukla presidant press club janjgir champa chhattisgarh , May 08, 2012
ye yogyata ka mamla hai aap arakshan khoj rhe ho
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written by ALOK KUMAR, March 19, 2012
वाह भाई संजय जी क्या खूब कही दलितों का हो आपना मीडिया वैसे दलितों के लिए क्या क्या आपना होना चहिये जहाज ट्रेन बस मोटर साईकिल
न्यू पेपर सड़क पानी बिजली राशन कपडे मोबइल टीवी .जूते चप्पल .संजय जी एक बात बताइए दलित के नाम पर माया मुखमंत्री बन गई
बाबु राम कुशवाहा घोटाला कर गये नसीमुद्दीन के खिलाफ जाँच चल रही है स्वमी प्रसाद मौर्य पोलिंग बूथ पर गाड से लड़ गए .जाने भी दो
हिंदुस्तान को दलिस्तान बना देना चाहिये न
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written by Ravi Kumar Singh, November 13, 2011
sanjay ji aap bilkuk sach kaha raha ha. dalit mai hi saach khana ki baat hai
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written by दलितार्थ दोलन , September 13, 2011
बहोत बढ़िया भाई..
दलितस्तान बना लेते हैं। सब कुछ अपना ही होगा। हवा-पानी-सड़क-मकान-स्कूल-आफिस-टीवी-चैनल-पेपर सब कुछ दलित।
दलितलैंड। smilies/cheesy.gifsmilies/cheesy.gifsmilies/kiss.gifsmilies/tongue.gif
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written by Dr. Maher Uddin Khan, September 12, 2011
priya sanjay aap ki mang ek dum uchit hai beshak kuch logon ko is se jalan ho rahi hai . bharat ki isi dalit virodhi mansikta ke chalte desh sadiyon ghulam raha magar ye log nahi sudhre na sudhrenge. isi mansikta ke chalte aaj media main daliton ka pratishat lag bhag shoony hai.
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written by dalit, September 11, 2011
Lekhak bilkul sahi likhte hain, Daliton ke liye na kewal media alag se ho balki daliton ke liye alag school, college to shayad kuchh ban hi rahe hain aur bhi bane. Daliton ke liye alag hi trains hon, kewal alag compartment se bas kaam na chalega. Alag railway bhi banana pade to bhi koi galat nahin. Alag police to hai hi, alag court, judge, alag municipal, alag post office, alag road, alag park, alag kitaben, alag restaurant, alag shahar, gaon hi hon jahan kewal dalit hi aa ja saken aur kisi ka adhikar na ho tabhi daliton ke saath sahi nyay hoga. Hazaron barson ke shoshan aur atyachar ka badla sab kuchh alag banane se hi hoga. Daliton ko baaki sare samaj se kat kar apna hi apne liye sab bana lena chahiye aur sarkaron se banwa lena chahiye. Lekhak mahoday ke vicharon ke liye dhanyavad. Doosaron ke saath daliton ko rakhne se unka shoshan rukne wala nahin.
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written by rahul kumar, September 11, 2011
sanjay ji aapne bahut achha likha iske liye thank u. rahul kumar reporter aligarh 9058747532
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written by amitvirat, September 11, 2011
inhein vichark lekhak patrakar kehne ka to koi auchitya nahin hai, lekin agar maan bu lein to ye poori taher se vicharon ka divaliya ho gaya. jaati dharm, kshetra ke bare mein chodo Hindustan ke baare mein socho bhai to is desh ka bahut bhala ho jayega.
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written by AnilSingh, September 11, 2011
Daliton ka vote chipkane ke liye Congress ne Ambedkar, Jagjeevan Ram, BSP ne Kanshiram, Mayavati aur anya partiyon ne bhi kai netaon ko lassa ke roop me upyog kiya, lekin kya hua hamare gaon ka Baudha baba, uske baad unka beta maheshh khet hi jotate rahe. Ab Mahesh ka beta bhi majdoori he karega, Kahne ka matalab hai ki Daliton ka Akhbar nikal ke Bhi Aprtayksh roop se daliton ka hi shoshan hoga.Jaat ke naam per saare dalit Akhbar kharidenge aur maja lootenge Mutthibhar log.
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written by subhamsagar, September 11, 2011
sir aap kis channel me aap par agli kya karbahi hogi jarur bataiyen....
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written by gaurav garg, September 10, 2011
sakeena jee, kahi sanjay ne pura matter kisi se compose to nahi karaya. ramvilash ya maya se wah kyo nahi milte? shayad uska arman pura ho jaye. 9896594794
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written by raghwendra, September 10, 2011
दलितों के नाम पर दलाली करने का काम कोई पहली बार नहीं किया जा रहा, कई लोग पहले भी अपनी दुकान मे दलितों को बेचते रहे हैं, कुछ बेच कर मंत्री बने, कुछ मुख्य मंत्री तो कुछ दुकानदार बने पर दलित दलित ही रह गये. . . .
लेखक ने भी अपनी कुछ वस्तुओं का विगयापन कर लिया है, इससे दलितों का कितना भला होगा, देखते हैं . . . . . .
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written by jatin, September 10, 2011
aap log ek kaam kyo nahi karte ek alag desh hi kyo nahi mang lete hai tab shyad aap ki saari samshya hal ho jayegi
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written by mera v naam sanjay kr, September 10, 2011
aur eshme vigyapan kaun dega......
aap kitne dalit maginz ko subscribe karte ho paisa dekar,,,,
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written by Dr M.S. Parihar, September 10, 2011
आदरणीय संजयजी, आपके विचार पढकर अच्‍छा लगा कि देश में दलितों का मीडिया होना चाहिए। लेकिन मेरे मन में एक विचार पनप रहा है कि क्‍या आजादी के बाद देश के दलित एकजुट हुए। क्‍या दलितों में ऊंचे और नीचे दलित नहीं है। मैं अधिक तो नहीं जानता लेकिन आगरा में जाटव, वाल्‍मीकि और कोरी समाज के लोगों में न तो वैचारिक तालमेल है और न ही सामाजिक संबंध। दलितों के मध्‍य ही भयंकर खाई है। दलितों में भी आपसी छूआछूत की भावना है। मुझे नहीं पता कि आजादी के बाद कितने दलितों ने वाल्‍मीकि लडकियों अथवा लडकों से शादी की है। संजयजी, पहले दलित तो एक हो जायें तभी दलित मीडिया की बात करना उचित होगा। हर दलित जाति का एक मसीहा है, ऐसे परिवेश में दलित मीडिया की कल्‍पना दिवास्‍वप्‍न तो नहीं है।
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written by raju, September 10, 2011
हद हो गयी, आखिर आप दलित कहते किसको हो ये तो बताएं, फालतू बाते लिखकर क्यों समय खराब कर रहे हो आप, आप क्या न्यूज बनायेंगे जब आपको सोच ही इंतनी संकीर्ण है.
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written by जे.पी. शर्मा, September 10, 2011
लेखक को प्रशान्त जी की राय मान लेनी चाहिए । दूसरे ग्रह पर ले जाओ सबको, लेखक महोदय ।
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written by ek patrakar, September 10, 2011
prashant theek kah rahe hain. dalito ke liy alag doctor / haopitol ho, jaha keval dalit hi ilaj kara sake aur dalit hi doctor seva de sake. iske alava dalito ki alag gali, mohalla, alg mall, alag rail-bus, alag chaddi alag kandom hona chahiye, vartmaan ke kandom hinduvadi ho sakate hain.....
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written by Vijay Mishra, September 10, 2011
prasant ji mai aapki bat se puri tarah sahmat hu sayad sanjay ji dusare baba sahab banna chahte hai ager esha hai to kair jane diziye koi bat adat ho gai hai roz eshe lekh padane ki ....
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written by pradeep choudhary, September 10, 2011
मान्यबर अभी आपकी मांग अधूरी है, आपको अलग से दलिस्तान की मांग और करनी चाहिये थी, आप जैसे लोगों ने देश का वंटाधार कर रखा है।
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written by neeraj, September 10, 2011
obc ko bhi alga media ki jarurat hai, phir brahman ko bhi ek alag media ki jarurat hogi. sab to bat diye ab kya media ko bhi jat ke adhar par batoge.are bhai aap yhe kahte ki gsribo le liye alag media ho to sayad pachne wali bat hoti
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written by Rajendra kumar gautam, September 10, 2011
Dear sanjay, May be you are right. but media is doing his job honestly regarding dalit harrasment.
rajendra kumar gautam
daily news activist
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written by Tarkeshwar Mishra, September 10, 2011
हम तो अब तक यही सुनते आये थे कि दुनिया के सभी पत्रकारों की एक ही बिरादरी है. पत्रकारों को भी धर्म और जाति में बाँटने का ये आह्वान किसी पत्रकार का तो नहीं हो सकता है. भाई आप यू पी में चुनाव तो नहीं लड़ने वाले हैं?
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written by patrakaar, September 10, 2011
A nonsense article written by a TRULY nonsense destructive minded writer . People ( of all community), should not care and encourage these types of DIVIDE AND RULE articles or thoughts.
This nonsense writer seems to be a politician rather than a journalist .
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written by प्रशान्त, September 10, 2011
बिल्कुल, दलितों के लिये अलग जिला-प्रदेश-स्कूल-अस्पताल-किताबें-सड़कें-गलियां भी होना चाहिये. इसमें क्या बुराई है. अलग मीडिया, अलग संगीत-गीत-कला-टेक्नोलाजी-दवाई-बीमारी-धरती-आसमान-हवा-पानी होना चाहिये. मैं आपके साथ हूं.
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written by सकीना, September 10, 2011
खूब लिखते हैं आप भी.. कम लिखिए.. ज्यादा सटीक लिखिए.. लोग समझ जाएंगे कि आप चाहते क्या हैं।

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