भारतीय मीडिया और विकिलीक्स

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एक प्रशिक्षु जर्नलिस्ट को भी जो पहला पाठ पढ़ाया जाता है वह यह कि अपने तथ्यों को जनता के बीच देने के पहले क्रॉस चेक करे। भारतीय दण्ड संहिता(आई.पी.सी) की धारा 499 में यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि आरोप लगाने वाला व उसे प्रकाशित करने वाला समान रूप से दोषी होता है।

भारतीय मीडिया ने जिस तरह पिछले कुछ दिनों से विकिलीक्स की रिपोर्ट को सत्य के रूप में दिखाना शुरू किया है वह उसके मानसिक दिवालिएपन का नमूना है। 150 साल पुरानी प्रिंट मीडिया भी वही गलती कर रही है जो कि 15 साल पुरानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। किसी अमेरिकन दूतावास के व्यक्तिगत ऑब्जर्वेशन को गॉस्पेल ट्रूथ मानकर आरोप इस तरह परोसे जा रहे हैं, जिससे लगता है कि भारतीय मीडिया स्वयं पंगु हो गई हो।

उदाहरण के तौर पर विकिलीक्स के खुलासे के रूप में बताया गया कि मायावती ने प्राइवेट जेट प्लेन से अपनी पसंद की कंपनी के चप्पल मुंबई से मंगवाए। खुलासे में न तो यह बताया गया कि मायावती ने जेट प्लेन कब खरीदा? एयर ट्रैफिक कन्ट्रोल ने कब इस तरह के जेट प्लेन को उड़ने की इजाज़त दी और वह फ्लाइट नंबर क्या था? हम सब जानते हैं कि ब्रांडेड चप्पलें आज के दौर में लखनऊ और दिल्ली में भी उसी तरह उपलब्ध हैं जिस तरह मुंबई में। हम यह भी जानते हैं कि एक मुख्यमंत्री के लिए चप्पल मंगवाने का काम किसी छोटे सरकारी अधिकारी को दिया जा सकता है, ऐसे में इसके लिए हवाई जहाज़ भेजने की ज़रूरत नहीं होती। हम यह भी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार के कुछ विभागों के कार्यालय वहां पर हैं जो बड़ी आसानी से यह कार्य कर सकते हैं।

एक और उदाहरण लें। अमेरिकी दूतावास को भेजे गए केबल में बताया गया है कि मायावती प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं और वह इगोमेनिएक (पागलपन की हद तक अहंकारी) हैं। क्या यह तथ्य जानने के लिए हमें किसी सात समुंदर पार से आए गोरे की ज़रूरत होगी? क्या मायावती के दो दशक के राजनीतिक जीवन के बाद भी हमें यह सब अमेरिकी केबल से पता चल पाएगा? साथ ही इस ख़बर को देने बाद भारतीय मीडिया का दायित्व था कि वह पता करे कि मायावती के पास प्राइवेट जेट प्लेन कहां से आया और किस दिन चप्पल की खरीददारी के लिए यह प्लेन गया था? लेकिन हर अख़बार और चैनल में ज़बरदस्त कवरेज के बाद भी भारतीय मीडिया यह दायित्व निभाना भूल गया।

यहां हम यह भी बताना चाहते हैं कि दूतावासों का सूचना-तंत्र (या खुफिया नेटवर्क) कितना कमज़ोर है। दूतावासों की अधिकांश सूचनाएं या तो स्थानीय ख़बरों के आधार पर होती हैं या फिर राजनीतिक दल के नेताओं के साथ खाने या चाय पर हुई गप्पबाज़ी पर आधारित होती हैं। कभी-कभी कुछ चुनिंदा पत्रकारों को भी बुलाया जाता है। इनमें वह पत्रकार ज़्यादा होते हैं जो मेन लाइन जर्नलिज़्म छोड़कर संपादक बन चुके होते हैं या वह जो प्रेस क्लब गॉशिप को (जो दो पैग पीने के बाद बुलंदपरवाज़ी के रूप में तब्दील हो चुकी होती है) सत्य की तरह दूतावासों को अनौपचारिक बातचीत में परोसते हैं। अमेरिकी दूतावास के पॉलिटिकल विंग में एक भारतीय हैं जो कि इस तरह के कुछ नेताओं और पत्रकारों से संबंध में रहते हैं।

आप समझ सकते हैं कि अमेरिकी दूतावास द्वारा अपनी सरकार को भेजे गए केबल कितने सतही होते होंगे जिसे भारतीय मीडिया अकाट्य साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। फिर हम यह मान सकते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को परिपक्व होने में अभी समय लगेगा क्योंकि उसकी उम्र लगभग 16 साल है। लेकिन प्रिंट मीडिया में यह दीवालियापन क्यों? क्या हमे आज भी, हमारा नेता भ्रष्ट है, कौन नेता नैतिक रूप से महत्वाकांक्षी है और किस नेता का राष्ट्र के प्रति क्या रुख है यह जानने के लिए हमें सात समुंदर पार से आए किसी ऐसे गोरे के विचार पर भरोसा करना होगा जो हर तीन साल बाद ट्रांसफर होता है?

यह सही है कि तर्क में जब हमारी अपनी विश्वसनीयता खत्म होने लगती है तब हम आप्त वचन का सहारा लेते हैं जैसे गीता, कुरान, बाइबिल या किसी बड़े विद्वान का कथन। जिस तरह से अमेरिकी केबल को विकिलीक्स के माध्यम से भारतीय मीडिया ने दिखाया उससे दो सवाल उभरते हैं। पहला, क्या भारतीय मीडिया की अपनी विश्वसनीयता खत्म हो गयी है या दूसरा क्या विकिलीक्स और अमेरिकन केबल को हमने जाने-अनजाने में आप्त वचन बना दिया है? यह दोनो ही स्थितियां ख़तरनाक हैं और भारतीय पत्रकारिता की गरिमा के खिलाफ हैं।

एक तीसरा पहलू इस तस्वीर का यह है कि एक सशक्त भारतीय मीडिया अपने डेढ़ सौ से ज़्यादा न्यूज़ चैनलों, कुछ हज़ार अखबारों और लाख से ऊपर के फील्ड स्टाफ के बावजूद पांच साल बाद भी नही पता कर पाता है कि मायावती के पास जेट प्लेन है। जो बात दिग्विजय सिंह अमेरिकी दूतावास को अपने नेता सोनिया गांधी के बारे में बताते हैं वह मीडिया से अनौपचारिक बातचीत में क्यों नहीं बताते?

अपराध शास्त्र में ओपिनियन (व्यक्तिगत राय) को अवमानना का आधार नहीं बनाया जाता क्योंकि इसमें तर्कवाक्य को गलत ठहराने का कोई आधार नहीं बन पाता। दूसरा इसी वजह से अ ने ब से बातचीत में स के बारे में अपनी कोई राय दी तो स मानहानि का मुकदमा तब तक नहीं कर सकता जब तक ब यह ना कहे कि अ ने मुझसे यह कहा था।

कुछ दिन पहले के खुलासे में भी राहुल गांधी ने टिमोथी से क्या कहा; उसकी संदर्भिता क्या थी या उसे अमेरिकी राजदूत टिमोथी ने किस परिप्रेक्ष्य में लिया; इसे जाने बिना मीडिया इसे गॉस्पेल ट्रुथ की तरह जनता के बीच नहीं लाना चाहिए। मीडिया में परोसे गए सत्य का वज़न कई बार इस बात से भी निर्धारित होता है कि उस खबर का प्लेसमेंट कहां है; कितनी बार है और कितनी पुरज़ोरी से रखा गया है; विकिलीक्स के तथाकथित ख़ुलासे को आप्त वचन के रूप में परोसना भारतीय मीडिया की गरिमा को ठेस पहुंचाता है।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है. इस लेख का कुछ अंश हिंदुस्‍तान में भी प्रकाशित हो चुका है.


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