धर्म बिकता है बोलो खरीदोगे?

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महंगाई की मुंहबोली बहन है घूसखोरी। महंगाई बढ़ती है, तो उसकी ‘बहन’ भी कुलांचे मारने लगती है। महंगाई की आग में सब जल रहा है, लेकिन आदिवासियों में इसकी तपिश कुछ ज्यादा ही तेज है। वनवासियों को अपनी जान बचाने के लिए धर्म को बेचना पड़ रहा है। दो वक्त की रोटी के लिए देश के कई इलाकों में पिछले कई सालों से आदिवासियों ने तेजी से धर्म बदलने की कोशिश की है। ईसाई संगठनों को ये जनजातियां बतौर घूस अपना धर्म ‘गिरवी’ रखने को बाध्य हैं।

मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के अधिकतर आदिवासियों ने तो पहले ही अपना धर्म बदल लिया था। जो बचे हैं, वे भी महंगाई की मार से धर्म बदलने को मजबूर हैं। गोपालपुरा का ‘झीतरा’ अब ‘थॉमस’ बन गया है। झीतरा पहले भूखों मर रहा था, थॉमस बनने के बाद अब उसे दो जून की रोटी मिल रही है। यह भोजन उसे कब तक मिलेगा, नहीं कह सकते, लेकिन उसे उम्मीद है कि मिशनरी उसे आगे भी जिंदा रखेगी। बीमार झीतरा के बच्चों को अब दवाएं भी मिल रही हैं। दवा और अनाज के बदले उसे कुछ नकदी भी मिली। झीतरा डंके की चोट पर कहता है, ‘ये धर्म क्या होता है। जो धर्म हमें जिंदा रखे, वही सही है। धर्म बदलने के बाद भी हमारी जाति, तो बदली नहीं, केवल धर्म बदल गया।’

इसी जिले के भगौर की टिहिया अब मरियम बन गई है। ऐसा नहीं है कि टिहिया कोई पहली आदिवासी महिला है, जिसने धर्म परिवर्तन किया है। पिछले कुछ सालों में हजारों महिलाओं ने धर्म परिवर्तन किया है, लेकिन टिहिया का किस्सा कुछ अलग ही है। टिहिया एक पखवाड़े से बीमार थी। न घर में खाने को अनाज, न शरीर ढकने को कपड़े और न ही दवा-दारू के लिए पैसे। रहवास के तौर पर जो झोपड़ीनुमा आवास था, वह भी आंधी में बिखर गया। टिहिया सड़क पर आ गई। सरकार और नेताओं के यहां गुहार लगाई, लेकिन कुछ नहीं मिला। टिहिया ईसाई संगठनों से मिली, उसके दिन बहुर गए।

टिहिया के साथ ही भगौर की अन्य भील महिलाएं हकरी, मदली, थावरी, सबीना, टिटिक और तेजली अपने बाल-बच्चों के साथ क्रमश: इस्टेलना, मदेलना, टेरेसा, डॉली, रोचली और मीटिल्डा बन गईं। तेजली कहती है कि हमने उनकी मदद की, तो उसने हमें जिंदा बचा लिया। हम जिंदा बचेंगे, तभी धर्म की बात होगी। महंगाई से तो जीना मुहाल है। सरकार कहती है कि सब कुछ ठीक है, लेकिन हमारे पास तो कुछ भी नहीं।

झाबुआ के 80 फीसदी आदिवासी ईसाई बन गए हैं। यह बदलाव विगत 30 सालों में हुए हैं। बाकी जो लोग बचे हैं, वे हिंदू-ईसाइयों के बीच जूझ रहे हैं। यहां गरीबी इतनी है कि दो रुपये की तंगी भी उनके जीवन को झकझोर देती है। न खाने को अनाज, न पीने को पानी। शिक्षा के नाम पर स्कूल हैं, लेकिन टीचर नहीं और जहां टीचर आते हैं, वहां न बच्चे हैं और न ही भवन। सरकार कहती है कि झाबुआ में लोगों के इलाज के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं दी गई हैं, लेकिन यह सुविधा कहां है, इसे आप देख नहीं सकते। ताल ठोक कर विकास का दावा करने वाली शिवराज सिंह सरकार आज तक इन आदिवासियों को कुछ नहीं दे पाई है। इनके बच्चे आज भी नंग-धड़ंग ही रहते हैं।

नग्न वक्ष और लाज बचाने के लायक कमर में लिपटी अंगोछी के साथ उनकी महिलाएं व जवान लड़कियां जंगल और खेत-खलिहानों में काम करती नजर आती हैं। सरकार की ग्रामीण विकास योजना किसी स्वप्न से कम नहीं। कथित सभ्य समाज में सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों से भी बदतर है, इन आदिवासियों का जीवन। इन्हें सभ्य समाज ने इंसान की गरिमा और मर्यादा नहीं दी है। इनके साथ आज तक दोपाया जानवरों-सा सुलूक किया जाता है। सभ्य समाज, पुलिस और नेताओं के लिए वे आज भी ‘शिकार’ हैं। सभी उनका शिकार करते हैं। पुलिस वाले उनकी बहू-बेटियों की इज्जत लूटते हैं और सरकारी लोग उनके नाम पर आए फंड को। आदिवासी जब इसका विरोध करते हैं, तो उन पर गोलियां चलती हैं या फिर नक्सली बनाकर उन्हें जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है।

महंगाई और आर्थिक संकट से जूझ रहे आदिवासियों की टोली अक्सर सरकारी अमलों के पास जाती है, लेकिन उसे आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिलता। झाबुआ में ईसाई बन चुके सभी आदिवासियों के हालात सुधर गए हों, ऐसा भी नहीं है। गोपालपुरा के पीटर का कहना है कि ‘रोटी के लिए उसने धर्म बदला। उसके दो बेटे और बेटियों ने भी धर्म परिवर्तन किया था। शुरू में कुछ दिनों तक उन्हें मदद मिली, बाद में बंद हो गई। हम मेहनत कर रहे हैं, लेकिन पेट नहीं भरता। अब मेरे दोनों बेटे फिर हिंदू धर्म में जी रहे हैं।’

झाबुआ में 45 से ज्यादा चर्च काम कर रहे हैं। इस छोटे जिले में 45 चर्च का होना किसी आश्चर्य से कम नहीं। इनमें 15 चर्च तो काफी बड़े और पुराने हैं। गोपालपुरा का चर्च 100 साल पुराना है। कहते हैं, इसी जगह से धर्मांतरण का खेल सबसे ज्यादा होता है। महंगाई के आगोश में केवल झाबुआ के आदिवासी ही नहीं फंसे हैं। आइए, आपको ले चलते हैं इसी सूबे के बालाघाट रेंज में। पिछले महीने बालाघाट के लांजी प्रखंड के कई गांवों का दौरा करने के बाद पता चला कि जंगल और पहाड़ का जीवन कितना कठिन है। खासकर, आदिवासियों को किस तरह से हमारे नेताओं और सरकारी अमलों ने मरने को छोड़ दिया है।

पहाड़ और जंगलों में रहने वाले इन जनजातियों के बीच कोई सरकारी महकमा नहीं पहुंचता। चाहकर भी वहां पहुंचना मौत को दावत देने जैसा है। इसी इलाके में बैगा जनजातियों की आबादी बसती है। प्रागैतिहासिक कालीन यह जनजाति समाप्ति के कगार पर है। इसे बचाने के लिए केंद्र से लेकर राज्य सरकार करोड़ों-अरबों की राशि खर्च करने का दावा कर रही है। इस दावे का अपना एक अंक गणित हो सकता है, लेकिन जब यहां कोई सरकारी कर्मचारी पहुंचता ही नहीं, तब योजना चलाने की बात कैसे की जा सकती है? बैगा आज भी नंग-धड़ंग हालत में खुले आकाश के नीचे जीने को अभिशप्त हैं। बालाघाट के इस दुर्गम इलाके में भले ही सरकार के लोग नहीं पहुंचते, लेकिन ईसाई संगठनों की यहां पहुंच है।

शिक्षा, स्वास्थ्य के नाम पर यहां जो भी अल्प सुविधाएं लोगों को मिलती हैं, वह इन्हीं संगठनों के जरिए ही मयस्सर हैं। लांजी के पूर्व विधायक किशोर समरित कहते हैं कि ‘इन दुर्गम इलाकों में अगर धर्म बदल कर लोग जान बचा रहे हैं, तो इसमें धर्म के ठेकेदारों को बोलने का कोई हक नहीं है। जान बचेगी, तभी कोई धर्म की माला जपेगा। भूखे रहकर जाति-धर्म की बात बेमानी है।’ गुजरात के अहवा डांग जिले के हालात भी बेहतर नहीं हैं। गुजरात का यह जिला आदिवासी बहुल है और बदलते हालात में यहां की अधिकतर आबादी धर्मांतरण कर चुकी है। यहां के प्राय: हर घर में आपको लकड़ी से बने क्रॉस के चिह्न और लकड़ी के ही गिरजाघर देखने को मिल जाएंगे। इन आदिवासियों के लिए सरकार कई तरह के फंड देने की भी बात करती है, लेकिन इनकी क्या स्थिति है, वहां जाकर ही आप जान सकते हैं। एक तो गरीबी, ऊपर से फंड की लूट और सबसे इतर, महंगाई ने आदिवासियों का जीना मुहाल कर दिया है।

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के निवासी हैं. पटना-दिल्ली समेत कई जगहों पर कई मीडिया हाउसों के साथ कार्यरत रहे. इन दिनों हमवतन से जुड़े हुए हैं. मिशनरी पत्रकारिता के पक्षधर अखिलेश अखिल से संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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