घर में पितरों और कार्यालय में हिंदी का श्राद्ध साथ-साथ चलता है

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: हिंदी दिवस पर विशेष : लो फिर हिंदी दिवस आ गया। कार्यालयों का ऑन ड्यूटी सेकुलर त्योहार। दफ्तर-दफ्तर हिंदी के बैनर सजने लगे। अपुन जबरदस्त हिंदीवाले हैं। अपना एक अदद हिंदी पखवाड़े या एक माह से कुछ नहीं होता। वक्त ने अपुन की तो पूरी जिंदगी की ही हिंदी कर डाली है। पर सभी हमारी तरह फिदायीन हिंदी प्रेमी थोड़े ही हैं।

गैर बरसाती मौसम में कोने में रखे फालतू छाते की तरह साल भर हिंदीवाला-हिंदीवाला के ताने सुननेवाला एक अदद हिंदी अधिकारी नामक निरीह प्राणी हिंदी पखवाड़े के आते ही अचानक महत्वपूर्ण हो जाता है। उसकी चाल की अकड़ और आवाज़ की पकड़, चुनाव जीते हुए नेता की तरह हो जाती है। हो भी क्यों नहीं यही तो वह मौसम होता है जब खुद बड़े बाबू हिंदी अधिकारी को अपने पास बुलवाकर पहली बार अंग्रेजी न बोलकर टूटी-फूटी हिंदी में बात करते हैं। और फिर ऐसी खिसयानी हंसी हंसते हैं मानो किसी पार्टी में कोई कुर्सी पर बैठने को हो और एन वक्त पर पीछे से कोई कुर्सी खींच दे। हिंदी बोलते समय वैसे हर बड़े अफसर को यही लगता है कि पीछे से कोई उसकी कुर्सी खींच रहा है।

हिंदी अधिकारी महोदय राजभाषा के विकास के लिए हिंदुस्तान में रहकर भी हिंदी में काम करनेवाले दफ्तर के वीरबांकुरे कर्मचारियों की लिस्ट बड़े बाबू को थमाता है। उसका चेहरा इस वक्त इतनी हाई क्वालिटी की निरीहता से लैस हो जाता है मानो वह हिंदी सेवकों की लिस्ट न देकर राष्ट्रपति को फांसी की सजा माफ करवाने कोई याचिका पेश कर रहा हो। बड़ा बाबू लिस्ट पढ़कर हंसता है और फिर अपने चंद और चंट चहेतों का हिंदी के लिए किया गया अमूल्य बलिदान हिंदी अधिकारी को याद दिलाता है। हिंदी अधिकारी भारी मन से उनके नाम भी लिस्ट में दर्ज कर लेता है और फिर हिनहिनाते हुए बडे़ बाबू की मनभावन नयनाभिराम कान्वेंट कल्चर में पली-पकी पीए के नाम को जोड़ने की मीठी-सी जिद कर बच्चे-सा मचल जाता है। साहब और हिंदी अधिकारी दोनों बुक्काफाड़ हंसी हंसते है, जैसी कि किसी अश्लील चुटकुले को सुनकर शरीफ लोग हंसा करते है। और इस तरह हंसी-हंसी में कार्यालय के भूगोल में एक और हिंदी लेखिका का इतिहास लिख दिया जाता है।

हिंदी पखवाड़े के दौरान कार्यलयों का माहौल होलीवाली अनौपचारिक मस्ती से भरा-भरा हो जाता है। हिंदी भाषा है ही प्रेम की भाषा। प्रशासन की भाषा तो अंग्रेजी है। जैसे वसंत आने पर प्रेमी-प्रेमिका बौरा जाते हैं ठीक वैसे ही हिंदी पखवाड़े में कर्मचारी कवि-कवयित्रियां भी बौरा जाते हैं। रिटायरमेंट की कब्र में पैर लटकाए विभागीय खूंसट इश्क की ठरकिया शायरी की अपने छात्र जीवन की लुंजपुंज डायरी लेकर काव्य प्रतियोगिता में पहुंचकर दफ्तर की ब्यूटीक्वीन को रिझाने की मुंहतोड़ड कवायद करते हैं। कुछ एक मदमस्त रोमियों के तो जोश में मुंह से उछलकर दांत-बत्तीसी कार्यालय-कामिनी की गोद में जाकर हंसने लगती है।

बड़े बाबू इस अद्भुत पराक्रम से प्रभावित होकर कार्यालयीन कामकाज में हिंदी के प्रोत्साहन के लिए निर्धारित विशेष पुरस्कार हिंदी के इस वयोवृद्ध सेवी को तथा कार्यकुशलता का सर्वोच्च पुरस्कार दंतहरणी अपनी कॉन्वेंट-कामिनी पीए को तालियों की गड़गड़ाहट के साथ प्रदान करते हैं। कार्यक्रम की गरिमा देख स्वयं हिंदी भी उन्मुक्त हृदय से हंसने लगती है। कैसा मनोरम संयोग है कि पूर्वजों के श्राद्ध और हिंदी पखवाड़ा दोनों ही साथ-साथ आते हैं। घर में पितरों का और दफ्तर में हिंदी का श्राद्ध साथ-साथ चलता है। हिंदी लेखक-संपादक-कवि दफ्तर-दफ्तर हिंदी की सेवा करके भरपेट दक्षिणा कमा रहे हैं। कमाएं भी क्यों नहीं। हिंदी सेवी होते ही सिर्फ हिंदी में हैं। बांग्ला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगु किसी और भाषा में सेवी नहीं होते। क्योंकि ये अपनी भाषा को विकलांग नहीं मानते। मुझे छोड़कर हिंदी में हर ऐरा-गैरा हिंदी सेवी है। मैं कतई हिंदी सेवी नहीं हूं क्योंकि मैं ऐरा-गैरा नहीं हूं। कुदरत के पास भी पता नहीं कौन-सा पैमाना है जिसकी पैमाइश की बदौलत बरसात में कुकुरमुत्ते और हिंदी पखवाड़े में हिंदीसेवी समान संख्या में ही उगते हैं।

इस हास्य-व्यंग्य के लेखक जाने-माने पत्रकार पंडित सुरेश नीरव हैं.


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