न्यूज चैनलों का भाषा प्रयोग

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: तकनीकी विस्तार ने हिन्दी की सीमा तोड़ी : पत्रकारिता में जिस तरह कन्टेंट को ही किंग माना जाता है। ठीक उसी तरह टीवी में विजुअल को कभी भाषा की दरकार होती नहीं है। लेकिन जब दौर चौबीस घंटे और सातों दिन न्यूज चैनल चलने का हो तो सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि आखिर भाषा हो कैसी? क्योंकि भाषा अगर तकनीक के पीछे चली तो फिर सरोकार खत्म होता दिखेगा और अगर भाषा तकनीक से इतनी आगे निकल गयी कि उसके सरोकार तकनीक को ही खारिज करते दिखे तो फिर खबरें किसी अखबार या साहित्य के लपेटे में आते दिखेंगे।

असल में टीवी एक ऐसा सशक्त माध्यम है जो हर आम-ओ-खास से उसकी जरुरत के मुताबिक ना सिर्फ सरोकार बनाता है बल्कि हर वर्ग और हर उम्र के लोगों को एक साथ जोड़ता भी है। यानी किसी भी एक महत्वपूर्ण मुद्दे से लेकर हर खबरों को बताते वक्त सबसे महत्वपूर्ण एंकर-रिपोर्टर की भाषा भी हो जाती है और दिखाये जा रहे विजुअल को बोल देते शब्दों का चयन भी हो जाता है। इसलिये पहला सवाल तो संवाद के लिये यही खड़ा होता है कि अगर आत्मीय तरीके से लोगों के जहन को छूते शब्दो का प्रयोग न हुआ तो फिर टीवी देखने वालो में उब तुरंत हो सकती है। इसलिये मुद्दो पर सरोकार के शब्द का मतलब सरलता से मुद्दे को भी आसानी से देखने वालों के जेहन में उतारना भी हो सकता है और कठिन से कठिन मुद्दे को सरल भाषा में समझाने का हुनर भी हो सकता है।

खबरों के लिहाज से न्यूज चैनल अगर सशक्त माध्यम है तो खबरों को बताना लोकप्रिय होने का सबसे सशक्त तरीका भी है। इसलिये न्यूज चैनलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाषा को लेकर ही है, जो फिट ना हुई तो फिर अलोकप्रिय होना भी तुरंत चैनल से लेकर एंकर-रिपोर्टर तक के साथ जुड़ सकता है। और यही से भाषा की वह मशक्कत शुरू होती है जो किसी भी विषय पर सबकुछ जानने के बाद उसे देखने वालों के अनुकूल परोसने की क्षमता बताती है। मसलन यह कहना कि साहित्यिक भाषा बेहद कठिन होती है या फिर अखबारी भाषा न्यूज चैनल में फिट बैठ नहीं सकती, इससे इतर न्यूज चैनलों में भाषा को लेकर यह समझना ज्यादा जरुरी है कि शब्दों के साथ स्क्रीन पर जब तस्वीरें भी चल रही है तो फिर भाषा का मतलब तस्वीरों की कहानी कहना भर नहीं है। बल्कि तस्वीरों के पीछे की कहानी या कहानी कहती तस्वीरों के आगे की कहानी कहने वाली भाषा कैसी भी हो, अगर वह खबर है तो खुद-ब-खुद उसे बताने के तरीके सरल होंगे।

हो सकता है यह चलताऊ भाषा हो। हो सकता है यह हिंग्लिश हो। हो सकता है आज की पीढ़ी की व्याकरण का मर्सिया गाने वाली भाषा हो। लेकिन यह सभी मान्य तभी होगी जब वह खबर हो और उसके आगे-पीछे खबर की समूची कहानी कहने वाली मीठी सरल हिन्दी हो। इस मीठेपन में न्यूक्लियर समझौते पर अमेरिकी धंधे से लेकर राहुल की कलावती के संवेदनशील सियासत की समझ भी होनी चाहिये और अन्ना हजारे के आंदोलन पर संसदीय सियासत के भ्रष्ट्राचार से लेकर अन्नागीरी का तत्व भी समझ में आना चाहिये। इस कैनवास का मतलब ही है कि हिन्दी जो साहित्य के पन्नों में लिपटकर कर पत्रकारीय समझ को चिढ़ाती रही या फिर अंग्रेजी का वह तबका जो हिन्दी को अपने चकाचौंघ में काले धब्बे की तरह देखता रहा, उसे भी हिन्दी न्यूज चैनलों ने अपने माध्यम से पहले जोड़ा फिर भाषा को स्वीकार्य बनाया और धीरे-धीरे वह बाजार में बिकने भी लगी। इसका एक मतलब यह भी है कि हिन्दी चैनलो ने उस मर्म को पकडा, जिसमें गांव के जुड़ाव को छोड़ने का दर्द हर शहरी पाले हुये है। तो क्या इससे हिन्दी बढ़ने लगी। फैलने लगी। उसे मान्यता मिलने लगी। लेकिन यह समझ पूरी तरह तकनीक के विकास पर टिकी है क्योंकि तकनीक का विस्तार ना तो पत्रकारिता का विस्तार है ना ही भाषा का।

असल में भाषा का मतलब जीवन से है सरोकार से है। इसका बाजारीकरण इसके जरीये विज्ञापन कर कोई भी उत्पाद बेच सकता है लेकिन इसका पत्रकारीकऱण संस्कृति और सरोकार का परिचायक है। लेकिन इस दौर का संकट बाजार और पत्रकारिकता के बीच मोटी लकीर खिंच मुनाफा बनाने-कमाने का खेल कहीं ज्यादा है। इसलिये भाषा भी बंट सी गई है। हर चैनल की बाजार को लेकर अपनी समझ है और भाषा उसी बाजारुनुरुप विस्तार पर ही जा टिकी है। जो सीधे दिमाग पर उन्हीं शब्दों के जरिये संवाद बनाना चाहती है जो चलताऊ है। संसद नहीं पार्लियामेंट। मंत्री नहीं मिनिस्टर। प्रधानमंत्री कार्यालय नहीं पीएमओ। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद नहीं एनएसी। भाजपा नहीं बीजेपी। परिवार नहीं फैमिली। बलात्कार नहीं रेप। हमला नहीं अटैक। फेरहिस्त कितनी भी लंबी हो सकती है लेकिन समझना यह भी होगा न्यूज चैनलों की प्राथमिकता खबर है। और खबर किसी भी भाषा में आये अगर वह कंटेंट के लिहाज से मजबूत है या फिर कम शब्दों में बडे़ कैनवास की क्षमता को घेरने का माद्दा रखती है तो फिर न्यूज चैनल के लिये सबसे उपयोगी है। क्योंकि टीवी स्क्रीन पर शब्दों का उभरना शब्द की ताकत का भी परिचायक होता है। और किसी खबर को बताते शब्दों के प्रयोग किस्सागोई का हिस्सा भी हो सकते है। और यह सब एकरसता ना आने के लिये तो होते ही हैं साथ ही न्यूज चैनल में भाषा की अंदरुनी लड़ाई विजुअल को लेकर भी लगातार चल रही होती है।

खास कर तस्वीरें जब खुद बोल रही हो तो फिर भाषा कौन सी मायने रखेगी। इसलिये न्यूज चैनलों की होड़ का सच यह भी है कि जब ब्रेकिंग न्यूज होती है तो जो पहले तस्वीर दिखाता है दर्शक उसी के साथ जुड़ जाता है। अंग्रेजी ना जानने वाला दर्शक भी अंग्रेजी चैनल पर ब्रेकिंग तस्वीरों को देखकर सनसनी महसूस करता है और हिन्दी ना समझ पाने वाला दर्शक भी हिन्दी चैनलों में पहली तस्वीर देखने के लिये रोमांचित होता है। असल में हिन्दी के विस्तार का यह अनूठा माध्यम है और सर्वे रिपोर्ट बताती है कि देश में 80 फीसदी से ज्यादा दर्शकों के लिये ब्रेकिंग खबर के वक्त यह मायने नहीं रखता कि चैनल हिन्दी है या अंग्रेजी।

लेकिन भाषा को लेकर जो रिपोर्टिंग उस वक्त मौके से रिपोर्टर करता है या एंकर स्टूडियो से कहानी बताता है और स्क्रीन पर उस वक्त ग्राफिक्स के तौर पर जो शब्द स्क्रीन पर उभरते हैं, उस भाषा के सरोकार हर तबके के साथ कैसे संबंध बनाते है यह जरुर मायने रखता है। शायद इसीलिये न्यूज चैनलों के इस दौर में हिन्दी समेत देश की हर क्षेत्रीय भाषा को पहचान मिली है। और इसकी बड़ी वजह हिन्दी पट्टी के राजनीतिक-आर्थिक सरोकार का अलग-अलग भाषा वाले क्षेत्रो से जुड़ना भी है। बेल्लारी का खेल तमिल चैनलों के जरिये देखने में कोई हर्ज नहीं। जगन रेड्डी की सियासत को तेलगु चैनल के जरीये समझने में कोई हर्ज नहीं । राज ठाकरे का मराठी मानुष मराठी चैनलों से समझा जा सकता है और मोदी का करंट गुजराती चैनलों से। यानी विजुअल अगर भाषा की सीमा को तोड़ रहे हैं तो समझना यह भी चाहिये कि न्यूज चैनल का विस्तार भाषा में भी विस्तार ला रहा है और शायद इसीलिये हिन्दी सिर्फ हिन्दी पट्टी की पहचान भर नहीं है बल्कि यह राष्ट्रीय न्यूज चैनल की तरह राष्ट्रीय पहचान की है। चाहे उसका आधार तकनीकी विस्तार है।

लेखक पुण्‍य प्रसून वाजपेयी वरिष्‍ठ पत्रकार तथा जी न्‍यूज के संपादक हैं. यह लेख उनके ब्‍लॉग पुण्‍य प्रसून वाजपेयी से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.


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