कवि जी का जीवन चरित्र और प्रेस नोट

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इस क्षण भंगुर जीवन में सैकड़ों प्रेसनोट पढ़े। कई लिखे। छपवाये, मगर पिछले दिनों एक ऐसे प्रेस नोट से पाला पड़ा कि समस्त प्रकार के विचार मन में आ गये। मैं ने अखबारों की नौकरी तो नहीं की मगर प्रेसनोट वाले नेताओं, अफसरों, उ़द्योगपतियों के बारे में जानकारी खूब हो गई। अक्सर प्रेसनोट लेकर अखबारों के दफ्तरों में दौड़ पड़ने वालों से भी मुलाकातें हो ही जाती है।

सच पूछो तो बहुत सारे नेता तो केवल प्रेसनोट के बल पर ही बड़े नेता बन गये। उन्हें जनता से कोई लेना देना नहीं। इसी प्रकार बड़े अफसर अपना फोटो और अपने समाचारों का प्रेसनोट नहीं छपने पर जनसम्पर्क कर्मी का जो हाल करते है वो भी किसी से छुपा नहीं। डेस्क पर बैठे उपसम्पादक को अक्सर प्रेसनोट के पीछे बहुत कुछ भुगतना पड़ता है। लेकिन मैं तो एक प्रेसनोट का किस्सा सुनाता हूं।

हुआ यों कि एक वरिष्‍ठ बुजुर्ग कवि मित्र को वृद्धावस्था में एक पुरस्कार मिल गया। शाल, फूलमाला की व्यवस्था उन्हीं के धन से की गई थी। वे चाहते थे कि इस कार्यक्रम का प्रेसनोट बनाकर सचित्र छपने हेतु भेज दिया जाये। मुझे अनुज शिष्‍य मान कर उन्होंने यह प्रेसनोट लिखने-छपाने का आग्रह किया। मैं इन दिनों फालतू आदमी हूं सो तुरन्त हां कर दी। मैंने अपने हिसाब से वरिष्‍ठ कवि महोदय का जीवन-चरित्र लिखा फोटो चिपकाया, प्रेसनोट की छाया प्रतियां बनवाई, सुविधा के लिए एक अग्रेपण पत्र भी लिखा और लिफाफे बनाकर सिन्दबाद की यात्रा पर चल दिया।

एक प्रमुख अखबार में कुछ परिचय निकालने की गरज से मैंने एक वरिष्‍ठ सेवा निवृत्त सम्पादक से डेस्क पर फोन करवा दिया, मगर डेस्क के उपसम्पादक व्यस्त थे, मैं सुरक्षा कर्मी को प्रेसनोट दे आया। मगर नोट का एक अक्षर भी नहीं छपा। दूसरे दिन मैंने फिर तकादा किया। उपसम्पादक से बात हुई। बोले समाचार-सम्पादक से पूछो। समाचार सम्पादक ने मेरी और कोई ध्यान नहीं दिया। वे ‘कुत्ते ने कड़ाही चाटी’ नाम के सचित्र समाचार का पेज बनाने में व्यस्त थे। वे और पेजमेकर ने मिलकर कुत्ते के समाचार पर ही ध्यान दिया।

मैंने तीसरे दिन भी प्रयास किया, क्योंकि वरिष्‍ठ कवि महोदय अपना फोटो-समाचार देखने को लालायित थे। इस बार मैंने एक अन्य समाचार पत्र में प्रयास किये। सम्पादकजी बड़े भले आदमी थे, बोले यार इस में समाचारत्व कहां है। मैंने उन्हें समझाया कि एक बुजुर्ग कवि से सम्बन्धित मामला है, वे बोले इन कवि-कलाकारों के पास कोई काम-धाम तो होता नहीं। बस सम्पादक के पीछे पड़े रहते है। ये कहकर वे कम्प्यूटर पर सच का सामना के फोटो देखने में व्यस्त हो गये। मैं उपेक्षित, अपमानित सा लौट आया।

मैं प्रेसनोट की गति को सदगति में बदलना चाहता था अतः मैं एक अन्य अखबार में प्रेसनोट देने गया। वहां स्थिति अच्छी थी, प्रेसनोट को पूरे ध्यान से पढ़ने के बाद मुझे एक प्रश्‍नोत्तरी दी गई, जिसका जवाब देना था। मेरे जवाब से असंतुष्‍ट समाचार सम्पादक ने प्रेसनोट को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। मैं सोचने लगा इस पत्रकारिता जगत में जहां पर रोज समाचार-रोपण हो रहा है, जहां पर रोज प्रथम पृष्‍ठ पर सचित्र प्रकाशन के पैकेज खरीदे और बेचे जा रहे हैं, वहां पर बेचारे कवि के अभिनन्दन के चार लाइनों के प्रेसनोट की कौन चिन्ता करता। सम्पादक, संवाददाता, मालिकों के पास अन्य सैकड़ों जरूरी काम हैं, लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी परिचित सेवानिवृत्त सम्पादक और मैंने मिलकर फिर प्रेसनोट में दिनांक बदली और छपाने चल पड़ा। विचार आया कि में जिन्दगी में सैकड़ों प्रेसनोट छपा डाले, एक कवि पर चार लाइन नहीं छपा पाया तो धिक्कार है।

भगवान रूपी सम्पादक ने मेरी सुन ली। इस बार प्रेसनोट को इन्टरनेट ई-मेल से भेजने का निश्‍चय किया गया, और प्रेसनोट इन्टरनेट पर जारी हो गया। मेरी खुशी का पारावार नहीं रहा। मगर सर जी असली समस्या ये है कि प्रेसनोट के प्रकाशन की गुणवत्ता क्या है? नेताजी के प्रेसनोट और एक बूढे़ कवि के प्रेसनोट के प्रकाशन के पीछे कौन सी बाजारू शक्तियां काम कर रही हैं। सोचे और समझें। यदि संभव हो तो बदलती पत्रकारिता, बदलती राजनीति और बदलती बाजारू शक्तियों पर विचार करें।

बात एक मामूली प्रेसनोट की नहीं है। सर जी ये जीवन की बदलती परिस्थितियों पर विचार करने की जद्दोजहद है। आखिर एक प्रेसनोट के छपने, छपाने नहीं छपने या सायास छपने के अन्दर की बात क्या है। क्या यह सम्भव नहीं कि मीडिया केवल गुणवत्ता पर ध्यान दे, लेकिन गुणवत्ता के तो पैकेज मिल रहे हैं। क्या किया जा सकता है। समरथ को नहीं दोष गुसाईं।

व्‍यंग्‍य लेखक यशवंत कोठारी जयपुर के निवासी हैं.


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