हिन्‍दी को बिन्‍दी नहीं, सर्वस्‍व बनाइये

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वीरेंद्र जैन ने हिन्‍दी पर जो सवालात उठाये हैं, मैं पूरी तरह सहमत हूं और जानता हूं कि हिंग्लिश के चक्‍कर में हिन्‍दी के साथ व्‍यभिचार तूफानी तर्ज पर जारी है। यही हालत रही तो वह दिन दूर नहीं कि यह केवल बिन्‍दी के तौर पर जिन्‍दा रहेगी। कहने की जरूरत नहीं कि हिन्‍दी समाचार संस्‍थानों के पत्रकारों ने ही यह हालत पैदा कर दी है।

पर हैरत की बात है कि पत्रकारों ने इसे सुधारने के बजाय जैसे कसम ही खा रखी है कि चाहे कुछ भी हो जाए, हम नहीं सुधरेंगे। मसलन वीरेंद्र जैन ने जितनी संजीदगी से इस प्रकरण पर अपने आहत हृदय का खुलासा किया है, उस पर पत्रकारों की राय देखने से ही उनके इस सरोकारों का खुलासा हो जाता है। जिस जमीन पर हम खड़े हैं, जो स्‍वयं को व्‍यक्‍त करने के लिए हमारे पास एकलौता औजार-असलहा भाषा ही है, इसके बावजूद उस पर हम पत्रकार ही टिप्‍पणी करने से बचते रहे। मुझे तो लगता है कि ज्‍यादातर ने केवल हेडिंग देखकर ही अगली खबर की ओर टिक कर दिया होगा। जिन्‍होंने पढ़ने की कोशिश की भी होगी, वे आधे-चौथाई पर ही उबासी लेने लगे होंगे। वीरेंद्र जैन के पत्र पर किन्‍हीं श्रीकांत सौरभ की टिप्‍पणी तो शर्मनाक ही है। वे कमेंट करते हैं कि:- बकवास, समयखोर व घटिया लेख, कुछ अपवादों के साथ क्लिष्‍ट हिन्‍दी का समर्थन। हालांकि क्रांति किशोर मिश्र वीरेंद्र जैन के पुरजोर समर्थन में दिखायी पड़ते हैं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि श्रीकांत सौरभ को शायद अपने नाम का मतलब तक पता नहीं होगा।

जरा सोचिये कि एक शख्‍स पत्रकारिता में भाषा के साथ हो रहे हिंसक अन्‍याय और व्‍यवहार पर चिंता व्‍यक्‍त कर रहा है और हम उसकी निंदा कर रहे हैं। यह तो आत्‍मघाती ही हुआ ना। न खुद समझो और किसी को समझने भी न दो, या उसे समझने देने में व्‍यवधान उत्‍पन्‍न करो। इसके पीछे तर्क यह है कि हिन्‍दी को आम आदमी की भाषा बनाया जाए ताकि वह हर खबर को समझ सके। यह तो वही बात हुई जैसे योजना आयोग गांव में 26 रुपये और शहर में 32 रुपये कमाने वाले को गरीब मानने को तैयार नहीं। तो यह है हमारी हिन्‍दी पत्रकारिता। हम न केवल हिन्‍दी व्‍याकरण को क्लिष्‍ट करार दे रहे हैं, बल्कि इस तरह उसे घटिया और बवास तक बताते फिर रहे हैं। वह भी पूरे गर्व और आत्‍मविश्‍वास के साथ। ठीक है, काट डालिये वह डाल, जिस पर आप खुद बैठे हैं। लेकिन आपकी यह हरकत आप पर नहीं, बल्कि पत्रकारिता की पूरी अगली बिरादरी को किस कदर अपंग बना देगी, इस पर भी सोच लीजिएगा।

खास बात तो यह कि यह बात वही लोग कहते हैं जो अंग्रेजी अखबारों की प्रशंसा उनकी भाषा, गुणवत्‍ता और उसके व्‍याकरणीय प्रयोगों और श्रेष्‍ठता का गुणगान करते नहीं थकते। खुद हिन्‍दी के बड़े पत्रकारों को मैंने देखा है जो अपने बच्‍चों या परिचितों में अंग्रेजी का फ्लो और शुद्धता बढ़ाने के लिए उन्‍हें स्‍टेट्समैन, हिन्‍दू, इंडियन एक्‍सप्रेस जैसे अखबारों को नियमित और गंभीरता से पढ़ने की सलाह देते हैं। लेकिन जब हिन्‍दी में खबर लिखने की बात आती है तो उनका रवैया आत्‍मघाती हो जाता है। समाचार और उसके वाक्‍य विन्‍यास की उन्‍हें तनिक भी चिंता नहीं होती। वे यह भी नहीं सोचते कि आखिरकार इस तरह वे अपने ही पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार रहे हैं। अंग्रेजी को श्रेष्‍ठ और हिन्‍दी को कमतर आंकने की ही तो यह प्रवृत्ति है। जाहिर है कि इसी हालत के बने रहने पर आने वाले दिनों में हम शायद कहीं के भी न रहें। पाठक को हम अपने नजरिये से देख रहे हैं, बिना यह जाने-समझे कि पाठक क्‍या चाहता है। क्‍या पाठक आपकी वैचारिक विष्‍ठा का सम्‍मान कर रहा है। हर्गिज नहीं। वह भी बेहतरी चाहता है, लेकिन आप अपने आत्‍मरति जैसे सुख को ही सत्‍य माने बैठे हैं। उससे रंचमात्र भी डिगने को तैयार नहीं।

हिन्‍दी पत्रकारिता में तो व्‍याकरण और वर्तनी का तो अब मतलब ही समाप्‍त हो चुका है। आम तौर पर खबरें उपहास जैसी लगती हैं। न सोच, न विन्‍यास और न ही कुछ नया करने का हौसला। हौसला है भी तो अनर्थ ही करने का। नजीर के लिए एक हेडिंग पर गौर फरमाइये:- टूल्‍सों की चोरी में तीन धराये।

एक नजर खबरों पर भी :- बीती शाम हुई इस घटना के बारे में बताया जाता है कि मृतक रामकुमार अपनी दूकान बंद करके ज्‍यों ही घर की ओर रवाना हुआ, सामने से मोटरसाइकिल पर सवार दो लोगों ने उस पर गोलियां बरसा दीं और तेजी से भाग निकले। चीख-पुकार सुनकर आसपास के लोग घटनास्‍थल पर पहुंचे तो देखा मृतक रामकुमार सड़क पर खून से लथपथ छटपटा रहा है। फौरन उसे अस्‍पताल ले जाया गया जहां डाक्‍टरों ने मृतक को मृत घोषित कर दिया।

और खबर :- बाराबंकी में हुई इस कार्यशाला में वक्‍ताओं ने इस बात पर गहरा रोष व्‍यक्‍त किया कि आखिर महिलाएं ही क्‍यों बियाती है।

:- यूपी के अफसरों और विधायकों की विधवाओं के लिए बनेगा गेस्‍ट हाउस

:- महिलाओं को देखते ही उत्‍तेजित हो जाता है सांड़।

यह है खबरें और उनका स्‍तर। अर्थ का अनर्थ इसे ही तो कहेंगे। पहली में टूल के बहुवचन को भी सुपरलेटिव बना डाला।

दूसरी में मृतक पर ही सारा जोर रहा।

तीसरी में बिना बात को समझे हुए ही अनर्थ किया गया। वक्‍ताओं ने कहा कुछ होगा, संवाददाता ने समझा कुछ और संपादक ने उसे यथाशीघ्र निपटा दिया।

चौथी में सुविधाओं को विधवाओं में तब्‍दील कर दिया गया जबकि चौथी में न्‍यूज सेंस का कमाल हो गया। केवल चटखारा लेने के लिए।

कहने का अभिप्राय यह कि यह बदहाली है हमारे अपने असलहे की। कम से कम हम यह तो देखें कि ऐसी ही लापरवाही हमें कितना भोथरा बना रही है।

बस, एक बात वीरेंद्र जैन से। आपने भी एक ब्‍लंडर कर ही दिया। आपने लिखा है कि सवारी। दरअसल, सवारी तो वाहन को कहते हैं, न कि वाहन पर सवार व्‍यक्तियों को। उसके लिए तो सवार शब्‍द है। हां, वर्तनी की अशुद्धियां आपने भी की हैं, लेकिन वर्तनी की अशुद्धियों को बड़े आलेखों में सीधे अपराध नहीं कहा जा सकता। इसे तो इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में ही गलत ठहराया जा सकता है। मसलन साधना टीवी के संपादक एनके सिंह ने अपने यहां चल रहे स्‍क्रोल पर ऐसी ही अनर्थ वर्तनी अशुद्धि पर तत्‍काल आपत्ति की थी।

खैर, आपका मकसद बड़ा है। साधुवाद। आपका यह प्रयास हम सबका मार्गदर्शन ही करेगा।

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के जाने-माने और बेबाक पत्रकार हैं. कई अखबारों और न्यूज चैनलों में काम करने के बाद इन दिनों आजाद पत्रकारिता कर रहे हैं.उनसे संपर्क 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

वीरेंद्र जैन के लेख का पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करें - नभाटा संपादकीय स्टाफ को वीरेंद्र जैन ने भेजा ज्ञानवर्द्धक पत्र (पार्ट एक)

हर पत्रकार को पढ़ना चाहिए वीरेंद्र जैन का लिखा यह पत्र


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Comments (2)Add Comment
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written by श्रीकांत सौरभ, September 27, 2011
कुमार सौवीर जी,नमस्कार ! चूंकि आप पत्रकारिता में मुझसे वरिष्ठ हैं इसलिए मेरे कमेंट पर आपकी आलोचना सिरोधार्य है . लेकिन दुख भी है कि आपने मेरे भाव को न समझ इसे नकारात्मक तौर पर ले लिया . हालांकि मैं हिन्दी का विद्वान नहीं हूं, लेकिन इस भाषा में लेखन की बेहतरी के लिए दूसरों की तरह मुझमें भी एक छटपटाहट है . इसका अंदाजा भड़ास पर छपे मेरे आलेखों 'लिखो ऐसा कि रिक्शाचालक भी समझ जाए' और 'नियत' नहीं 'नीयत' होगा सुदर्शन न्यूजवालों से लग जाएगा . जहां तक मुझे अपने नाम की जानकारी है इसमें 'श्रीकांत' में 'श्री' हिन्दू धर्म में शुभ व पवित्र माना जाता है . जबकि 'सौरभ' का आशय फूल के सुगंध से है . इसके अलावा मेरे नाम का दूसरा मायने निकलता हो तो आपसे विनम्र निवेदन है कि इसे कमेंट बाक्स में डालने की कृपा प्रदान करेंगे . संपर्क- 9473361087
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written by Joy B, September 26, 2011
Lage raho Jaani........

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